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राष्ट्रवाद पर हावी होता पूंजीवाद 

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भारत जैन

क्रिकेट की दुनिया में बहुत तेज़ी से बहुत गंभीर बदलाव हो रहे हैं । कुछ समय पहले तक क्रिकेटर अपने – अपने देश के लिए खेलने का दावा करते थे परन्तु अब पैसे के लिए देश को दरकिनार करने को तैयार हो गए हैं ।

न्यूज़ीलैंड के कई बड़े खिलाड़ियों जैसे ट्रेंट बोल्ट , काॅलिन ग्रैंडहोम , मार्टिन गप्टिल और जिम्मी नीशम ने अपने बोर्ड से कह दिया है कि यदि उन्हें किसी टी – 20 लीग में अधिक धन मिल रहा होगा तो वे देश की बजाय लीग में खेलना पसन्द करेंगे । 

द. अफ्रीका के भूतपूर्व कप्तान क्विंटन डी काॅक ने लीग क्रिकेट में खेलने का समय निकालने के लिए टेस्ट क्रिकेट से सन्यास ही ले लिया है । नेपाल जहाँ क्रिकेट का ढंग का एक मैदान भी नहीं है वहाँ के एक खिलाड़ी संदीप लमिछाने विश्व भर में लीग क्रिकेट खेल रहे हैं । 

अफ़गानिस्तान में कोई अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेला जाता पर अफ़गान खिलाड़ी हर जगह बड़े सम्मान से खिलाए जा रहे हैं और पैसे कमा रहे हैं  । क्रिकेट का पूरी तरह व्यवसायीकरण हो गया है । 

अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल – आई सी सी – ने व्यवसायिक लाभ को देखते हुए  इसी वर्ष जुलाई में अमेरिका में एक लीग की शुरूआत की अनुमति दे दी है । यही नहीं आगामी टी – 20 विश्व कप 2024 वेस्टइंडीज और अमेरिका में सांझा खेला जाएगा । उद्देश्य स्पष्ट है – विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से पैसा बटोरना । 

भारत के खिलाड़ियों को बाहर की लीग में खेलने की अनुमति नहीं है और शायद ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि उन्हें यहीं बहुत पैसा मिल रहा है । परन्तु व्यवसायीकरण का प्रभाव दिख रहा है । 

विराट कोहली और गौतम गंभीर ने  2011 विश्व कप फाइनल में तीसरे विकेट के लिए महत्वपूर्ण साझेदारी बना कर ही टीम को संकट की स्थिति से बाहर निकालकर टीम के जीतने की नींव रखी थी । पर 1 मई को आई पी एल के मैच में विराट कोहली बंगलौर की ओर से खेलते हुए और लखनऊ की टीम के मार्गदर्शक के रोल में लखनऊ के स्टेडियम में खेल के अन्त में भिड़ गये । कभी देश के लिए साथ खेले थे ये भूल गए क्योंकि अपनी टीम ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गई है जबकि न तो विराट बंगलोर के निवासी हैं और न ही गौतम गंभीर लखनऊ के – दोनों दिल्ली के हैं । राज्य और राष्ट्र से अधिक महत्त्वपूर्ण वो टीम हो गई है जो पैसे देती है ।

पूंजीवाद और राष्ट्रवाद की शुरूआत एक साथ ही  हुई थी पर अब रास्ते अलग हो रहे हैं । एक नये वेश में पूंजीवाद के आगमन की आहट है ।

Ramswaroop Mantri

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