इंदौर। प्रदेश की राजनीति बीते चार सालों में ऐसे-ऐसे परिवर्तनों से गुजर रही है कि सियासी मौसम का हाल बताने वाले विश्लेषक भी हैरान हैं। पड़ोसी राज्यों की जातिवादी राजनीति से दूर प्रदेश की राजनीति स्थानीय मुद्दों पर ही केंद्रित रहती थी। किंतु मालवा-निमाड़ के आदिवासी मतदाता बहुल जिले में जिस तरह जाति की सियासत पैर पसार रही है, उससे भाजपा-कांग्रेस दोनों परेशान हैं। इन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति के लिए नौ व अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 21 विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी माहौल जाति के रंग में रंगने लगा है। यहां उग आए छोटे संगठन मोल-भाव कर रहे हैं। यह देख राजनीतिक दल भी नई धारा के साथ बहने की तैयारी में हैं। जाति की इस सियासत से इंदौर भी अछूता नहीं। विश्वविद्यालय व निजी कालेजों के अजा, अजजा विद्यार्थी भी इसके केंद्र में हैं।

शिक्षा के मंदिरों में ही दम तोड़ रही “शिक्षा”
हम बड़े गर्व से लोगों को बताते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने जिस गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण की थी, वह महर्षि सांदीपनि आश्रम आज का एजुकेशन हब कहलाने वाले इंदौर के समीप ही है। लेकिन यह गर्वोक्ति तब खोखली लगती है, जब शिक्षा के ऐसे ही किसी मंदिर में पूर्व छात्र अपनी शिक्षक को जिंदा जला देता है। कुछ माह पहले ही एक अन्य शिक्षक पर हमला करने वाला वह पूर्व छात्र दोबारा ज्वलनशील पदार्थ लेकर कालेज पहुंचा और प्राचार्य को जलाकर भाग गया। न प्रबंधन ने चिंता की कि उसे पहली ही घटना के बाद दंडित किया जाता, न ही पुलिस ने उसकी प्रवृत्ति को गंभीरता से लिया। इस वारदात के बाद ‘धन मशीन’ बन चुके शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी और जवाबदेही भी तय होना अब आवश्यक है।




