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*सीबीआई ने किया स्वास्थ्य मंत्रालय, राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के अधिकारियों और निजी मेडिकल कॉलेजों के गठजोड़ का पर्दाफाश*

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14 अफसरों समेत 34 के खिलाफ दर्ज की FIR

देश के कई राज्यों में CBI की छापेमारी के बाद मेडिकल कॉलेजों की मान्यता प्राप्त करने को लेकर बड़े घोटाले सामने आ रहे हैं। रायपुर के एक निजी मेडिकल कॉलेज के कर्ता-धर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद कई और डॉक्टरों और मेडिकल कॉलेजों के संचालकों के खिलाफ कार्यवाही के आसार बढ़ गए हैं। सूत्र तस्दीक़ करते हैं कि छत्तीसगढ़ के ज्यादातर निजी मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी नहीं के बराबर है। यहाँ दाखिले के नाम पर छात्रों से डेढ़ करोड़ से ज्यादा की रकम वसूली जाती है। वैसे तो निजी मेडिकल कॉलेजों में सीट बेचे जाने का खेल कई सालों से सुर्खियों में रहा है, इस पर अब तक प्रभावी अंकुश नहीं लग पाया है। सूत्र यह भी तस्दीक़ करते हैं कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और MCI जैसे संस्थान भी डोनेशन प्रथा पर स्थायी रुख लगाने के मामले में नाकामयाब रहे हैं। देश भर के कई निजी मेडिकल कॉलेजों की मान्यता और दाखिले को लेकर तिकड़मों का दौर आज भी यथावत बताया जाता है। हालांकि CBI की छापेमारी के बाद इस बड़े रैकेट के फिर से उजागर होने के आसार बढ़ गए हैं।

सीबीआई ने स्वास्थ्य मंत्रालय, राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के अधिकारियों और निजी मेडिकल कॉलेजों के गठजोड़ का पर्दाफाश किया। आरोप है कि रिश्वत लेकर मेडिकल कॉलेजों को फायदा पहुंचाया जा रहा था। सीबीआई ने 34 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जिनमें कई अधिकारी और डॉक्टर शामिल हैं।

नई दिल्ली: सीबीआई ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय , राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के अधिकारियों, बिचौलियों और निजी मेडिकल कॉलेजों के प्रतिनिधियों के एक नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है, जो भ्रष्टाचार और मेडिकल कॉलेजों को नियंत्रित करने वाले नियामक ढांचे में हेरफेर सहित कई घोर कृत्यों में कथित तौर पर शामिल थे।

एजेंसी ने प्राथमिकी में 34 लोगों के नाम दर्ज किए हैं, जिनमें स्वास्थ्य मंत्रालय के आठ अधिकारी, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण का एक अधिकारी और राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) के निरीक्षण दल से जुड़े पांच डॉक्टर शामिल हैं।

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के चेयरमैन डी पी सिंह, गीतांजलि यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार मयूर रावल, रावतपुरा इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च के चेयरमैन रविशंकर जी महाराज और इंडेक्स मेडिकल कॉलेज के चेयरमैन सुरेश सिंह भदौरिया का नाम भी प्राथमिकी में शामिल है।

अधिकारियों के अनुसार, सीबीआई ने हाल ही में इस मामले में आठ लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें एनएमसी टीम के तीन डॉक्टर भी शामिल हैं, जिन्हें नया रायपुर स्थित रावतपुरा इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च को अनुकूल रिपोर्ट देने के लिए 55 लाख रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

सीबीआई की प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि इस गठजोड़ की जड़ें केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में हैं, जहां आठ आरोपी अधिकारियों ने बड़ी रिश्वत के बदले में बिचौलियों के एक नेटवर्क के माध्यम से अनधिकृत पहुंच, अवैध नकल और अत्यधिक गोपनीय फाइलों और संवेदनशील सूचनाओं को मेडिकल कॉलेजों के प्रतिनिधियों तक पहुंचाने की काफी सोची-समझी योजना चलाई।

इसमें आरोप लगाया गया है कि अधिकारियों ने बिचौलियों के साथ मिलीभगत करके एनएमसी द्वारा आयोजित वैधानिक निरीक्षण प्रक्रिया में हेरफेर किया तथा आधिकारिक सूचना से काफी पहले ही संबंधित चिकित्सा संस्थानों को निरीक्षण कार्यक्रम और नामित मूल्यांकनकर्ताओं की पहचान बता दी।

सीबीआई ने प्राथमिकी में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से पूनम मीणा, धर्मवीर, पीयूष माल्यान, अनूप जायसवाल, राहुल श्रीवास्तव, दीपक, मनीषा और चंदन कुमार को आरोपी बनाया है। उन्होंने कथित तौर पर फाइलों को ढूंढ़कर वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की गई टिप्पणियों की तस्वीरें खींच लीं।

सीबीआई के अनुसार, मंत्रालय में चिकित्सा संस्थानों की नियामक स्थिति और आंतरिक प्रक्रिया से संबंधित इस महत्वपूर्ण जानकारी ने कॉलेजों को अत्यधिक लाभ पहुंचाया, जिससे उन्हें निरीक्षण प्रक्रिया में व्यापक धोखाधड़ी करने का अवसर मिला।

प्राथमिकी के अनुसार, इस तरह पहले ही मिली जानकारी से मेडिकल कॉलेजों को धोखाधड़ी करने का समय मिल गया, जिसमें अनुकूल निरीक्षण रिपोर्ट हासिल करने के लिए मूल्यांकनकर्ताओं को रिश्वत देना, गैर-मौजूद या प्रतिनिधि संकाय की तैनाती, काल्पनिक रोगियों को भर्ती करना और बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली के साथ छेड़छाड़ करना शामिल है।

एजेंसी ने उल्लेख किया है कि एनएमसी की विभिन्न टीम, बिचौलियों और मेडिकल कॉलेजों के प्रतिनिधियों के बीच लाखों रुपये की रिश्वत का लेन-देन हवाला के जरिए किया जा रहा है और इसका इस्तेमाल मंदिर निर्माण के नाम सहित कई उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है।

उधर CBI की छापेमारी से कई निजी मेडिकल कॉलेजों की मान्यता ही नहीं बल्कि दाखिले की प्रक्रिया पर भी सवालिया निशान लगने लगे हैं। छत्तीसगढ़ के चार बड़े निजी मेडिकल कॉलेजों के दर्जनों छात्र साफ कर रहे हैं कि उनके संस्थानों से फैकल्टी नदारद है; ज्यादातर महत्वपूर्ण विभागों में डॉक्टरों की कमी और प्राध्यापकों का भी टोटा है। पीड़ित छात्र अपनी पढ़ाई-लिखाई को लेकर चिंतित नज़र आते हैं; उनके मुताबिक ऐसे मेडिकल संस्थानों ने मान्यता प्राप्त करने के लिए वही नुस्खा आज़माया था, जिसके चलते रावतपुरा मेडिकल संस्थान विवादों में आया है।

पीड़ित मेडिकल छात्र प्रथम और द्वितीय सेमेस्टर के बताए जाते हैं। उनके मुताबिक प्रदेश में ज्यादातर निजी मेडिकल कॉलेजों के पास स्वयं का फैकल्टी स्टाफ नहीं है, कागज़ी खानापूर्ति कर MCI और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग जैसे संस्थानों की आँखों में धूल झोंखी जाती है। जूनियर डॉक्टरों के संगठनों के प्रतिनिधि अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर तस्दीक करते हैं कि किराए की डॉक्टरों को उपलब्ध कराकर ज्यादा तर निजी मेडिकल कॉलेजों ने मान्यता तो हासिल कर ली है, एडमिशन भी करा लिए हैं लेकिन फैकल्टी गायब है; जैसे-तैसे यहाँ काम चलाया जा रहा है इसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई-लिखाई पर पड़ रहा है। इधर CBI की छापेमारी से कई बड़े निजी मेडिकल संस्थानों की मान्यता पर भी सवाल उठने लगे हैं।

एजेंसियों की कार्रवाई के बाद राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की सफाई भी सामने आई है। उसने बयान जारी कर कहा है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो ने मई महीने में एक रिपोर्ट में कहा था कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग में मूल्यांकनकर्ता के रूप में काम कर रहे एक वरिष्ठ डॉक्टर को कर्नाटक के एक निजी मेडिकल कॉलेज के संबंध में सकारात्मक मूल्यांकन रिपोर्ट के बदले में कथित तौर पर 10 लाख रुपये की रिश्वत लेने के तुरंत बाद गिरफ्तार किया गया था।

CBI ने कुछ मूल्यांकनकर्ताओं, कॉलेज के अधिकारियों और अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर अब मामले को विवेचना में लिया है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए CBI की जारी जांच और अंतिम फैसला आने तक उक्त मूल्यांकनकर्ता को ब्लैकलिस्ट में डाल दिया है। उसके मुताबिक एक अनुकरणीय कार्रवाई के रूप में यह निर्णय लिया गया है। आयोग के मुताबिक स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में उक्त कॉलेज की मौजूदा सीटों की संख्या का मूल्यांकन वर्ष 2025‑26 के लिए नवीनीकरण नहीं किया जाएगा।

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग देश भर के विभिन्न सरकारी मेडिकल कॉलेजों से वरिष्ठ संकाय सदस्यों को नियुक्त करता है, जो आयोग की ओर से चिकित्सा संस्थानों में समय-समय पर निरीक्षण करने के लिए स्वेच्छा से काम करते हैं। इस प्रकार, मूल्यांकनकर्ताओं को आयोग द्वारा नियोजित नहीं किया जाता है, बल्कि देश भर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से एकत्र किया जाता है और चयन प्रक्रिया के माध्यम से निरीक्षण के लिए नियुक्त किया जाता है।

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने यह भी दावा किया है कि उसने अपने सभी कार्यों में अत्यधिक ईमानदारी बनाए रखने और सभी स्तरों पर पारदर्शिता बनाए रखने की प्रतिबद्धता बनाई रखी है। आयोग में भ्रष्टाचार के प्रति कोई सहिष्णुता की नीति नहीं है और किसी भी व्यक्ति या चिकित्सा संस्थान द्वारा की गई ऐसी किसी भी अप्रिय घटना से आयोग NMC अधिनियम और उसके तहत बनाए गए विनियमों के प्रासंगिक दंड प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई करेगा।

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के मुताबिक अधिनियम के प्रासंगिक दंड प्रावधानों के तहत, आयोग उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ ऐसी राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के मुताबिक अधिनियम के प्रासंगिक दंड प्रावधानों के तहत, आयोग उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ ऐसी कार्रवाई कर सकता है जैसा उपयुक्त समझा जाएगा। इसमें आर्थिक जुर्माना लगाना, उस शैक्षणिक वर्ष या इतने वर्षों के लिए किसी भी नई योजना के लिए आवेदन पर कार्रवाई रोकना, अगले या बाद के शैक्षणिक वर्षों में चिकित्सा संस्थान द्वारा प्रवेश दिए जाने वाले छात्रों की संख्या में कटौती करना, अगले या बाद के शैक्षणिक वर्षों में एक या अधिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश रोकना, सरकारी कर्मचारी आचरण नियमों के तहत संबंधित मूल्यांकनकर्ता के खिलाफ सक्षम प्राधिकारी को कार्रवाई की सिफारिश करना और आयोग के आचार एवं चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड से संबंधित कार्यवाही शामिल हैं। इसके साथ ही NMC ने कर्नाटक संस्थान में शैक्षणिक वर्ष 2025‑26 के लिए स्नातकोत्तर सीटों के नवीनीकरण पर रोक लगा दी है। इसके अलावा, नए पाठ्यक्रम शुरू करने या छात्र संख्या बढ़ाने के लिए कॉलेज द्वारा प्रस्तुत किसी भी आवेदन को रोक दिया गया है।

NMC ने अपने आदेश में सीधे तौर पर SRIMSR का नाम नहीं लिया है, लेकिन वरिष्ठ CBI अधिकारियों ने पुष्टि की कि रायपुर स्थित चिकित्सा संस्थान उन प्रमुख स्थानों में से एक था, जहाँ 1 जुलाई को छह राज्यों में 40 से अधिक परिसरों में अखिल भारतीय अभियान के तहत छापेमारी की गई थी। CBI की गिरफ्तारी के बाद तीन चिकित्सा मूल्यांकनकर्ता, SRIMSR के एक वरिष्ठ पदाधिकारी और निरीक्षण हेरफेर से जुड़े दो बिचौलियों से पूछताछ जारी है। NMC ने कहा, “आयोग ने मामले को बहुत गंभीरता से लिया है,” और दोहराया कि निरीक्षण प्रणाली को दोषमुक्त किया जाना चाहिए। इसके लिए स्पष्ट किया गया है कि मूल्यांकनकर्ता पूर्णकालिक NMC कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि प्रतिष्ठित सरकारी चिकित्सा संस्थानों में सेवारत वरिष्ठ संकाय से यादृच्छिक रूप से चुने गए हैं। CBI सूत्रों के मुताबिक रावतपुरा मेडिकल संस्थान मामले में अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी भी सुनिश्चित की जाएगी।

NMC अधिनियम के तहत, आयोग को मौद्रिक दंड लगाने, प्रवेश से इनकार करने, सीट अनुमोदन को निलंबित करने और सरकारी सेवक आचरण नियम या नैतिकता एवं चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही की सिफारिश करने का अधिकार है। CBI सूत्रों ने कहा कि आगे और गिरफ्तारियाँ होने की संभावना है। जांच के गहराने के साथ ही SRIMSR, रायपुर पूरी तरह से जांच के दायरे में है।

इंडेक्स कॉलेज के चेयरमैन सुरेश भदौरिया का काला सच, देशभर के कॉलेजों को दिलाई मान्यता, जहां मिल रही फर्जी डिग्रियां

मेडिकल कॉलेज की मान्यता घोटाले में 35 आरोपियों के खिलाफ सीबीआई ने कार्रवाई की है, जिसमें इंडेक्स मेडिकल कॉलेज के चेयरमैन सुरेश भदौरिया भी शामिल हैं जो फिलहाल फरार हैं। इस घोटाले में रावतपुरा सरकार उर्फ रविशंकर महाराज समेत कुल 35 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। इन आरोपियों में इंडेक्स मेडिकल कॉलेज, इंदौर के चेयरमैन सुरेश भदौरिया का नाम भी शामिल है, जो आरोपी नंबर 25 है। फिलहाल भदौरिया सीबीआई की गिरफ्त से बाहर है और फरार बताया जा रहा है।

‘एजुकेशनल रैकेट’ कैसे करता था काम?

सीबीआई की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के चंदन कुमार (जिनके खिलाफ भी इस मामले में एफआईआर दर्ज की गई है) और मध्य प्रदेश स्थित इंडेक्स ग्रुप के चेयरमैन सुरेश भदौरिया के बीच गहरी मिलीभगत थी।

सूत्रों के मुताबिक, चंदन कुमार सुरेश भदौरिया को मान्यता से जुड़ी तमाम गोपनीय जानकारियां भेजते थे। इनमें निरीक्षण टीम की संरचना, सदस्यों की सूची, दौरे की तिथियां और संबंधित रिपोर्टों की जानकारी शामिल होती थी। इन्हीं सूचनाओं के आधार पर भदौरिया सौदे तय किया करते थे।

फर्जी हाजिरी के लिए भदौरिया का क्लोन फिंगरप्रिंट स्कैम

सीबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, भदौरिया के इंडेक्स ग्रुप के तहत चिकित्सा, दंत चिकित्सा, नर्सिंग, फार्मेसी, पैरामेडिकल साइंसेज और प्रबंधन से जुड़े शैक्षणिक संस्थान संचालित किए जा रहे हैं, जो शैक्षणिक सत्र 2015-16 से मालवांचल विश्वविद्यालय से संबद्ध हैं।

भदौरिया मयंक वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष भी हैं, जो मालवांचल विश्वविद्यालय का संचालन करती है। उन्होंने इंडेक्स मेडिकल कॉलेज, अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र, इंदौर में डॉक्टरों और कर्मचारियों की नियुक्ति अस्थायी आधार पर की थी। हालांकि, कॉलेज की मान्यता प्राप्त करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की न्यूनतम मानक आवश्यकताओं (MSR) को पूरा दिखाने के लिए इन अस्थायी नियुक्तियों को गलत तरीके से स्थायी फैकल्टी के रूप में प्रस्तुत किया गया।

इस उद्देश्य के लिए, आधार सक्षम बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली (AEBAS) में हेरफेर करने हेतु इन व्यक्तियों के कृत्रिम क्लोन फिंगरप्रिंट तैयार किए गए, ताकि बायोमेट्रिक उपस्थिति को गलत तरीके से दर्शाया जा सके।

भदौरिया बना फर्जी डिग्री सप्लायर

सीबीआई ने अपनी जांच में यहीं तक सीमित न रहते हुए यह भी उजागर किया है कि भदौरिया अपने विश्वस्त सहयोगियों की मदद से मालवांचल विश्वविद्यालय और उससे संबद्ध संस्थानों के जरिए विभिन्न प्रकार की अवैध गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं।

इन अवैध गतिविधियों में अयोग्य उम्मीदवारों को फर्जी स्नातक, परास्नातक और पीएचडी की डिग्रियां जारी करना प्रमुख रूप से शामिल था। साथ ही, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार से जुड़े अधिकारी—राहुल श्रीवास्तव और चंदन कुमार—पर भी आरोप है कि उन्होंने रिश्वत के बदले विभिन्न मेडिकल कॉलेजों के निरीक्षण, नवीनीकरण और अनुमोदन (10A) से संबंधित प्रक्रियाओं में अनियमितताएं कीं।

ऐसे खुलीं घोटाले की परतें 

सीबीआई को मिली जानकारी के अनुसार, स्वास्थ्य मंत्रालय और राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) से जुड़े कुछ सरकारी अधिकारी और बिचौलिए आपसी मिलीभगत से भ्रष्टाचार में लिप्त थे। ये लोग देशभर के निजी मेडिकल कॉलेजों के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर अनैतिक गतिविधियों को अंजाम दे रहे थे। उन्होंने अपने पद और अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए जानबूझकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया।

इन व्यक्तियों पर यह भी आरोप है कि उन्होंने मंत्रालय के भीतर मेडिकल कॉलेजों की नियामकीय स्थिति और आंतरिक प्रक्रियाओं से जुड़ी गोपनीय फाइलों और संवेदनशील जानकारियों की अवैध रूप से पहुंच, नकल और वितरण में सहयोग किया। इसके साथ ही, उन्होंने आधिकारिक संचार जारी होने से पहले ही संबंधित मेडिकल संस्थानों को निरीक्षण की तारीखों और नामित मूल्यांकनकर्ताओं की जानकारी लीक कर दी, जिससे NMC द्वारा निर्धारित वैज्ञानिक निरीक्षण प्रक्रिया में गंभीर हस्तक्षेप और हेरफेरी की गई।

Ramswaroop Mantri

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