कानून पर केंद्र ने अपना रूख साफ कर दिया है. संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने साफ किया कि योजना MNREGA की जगह लागू होगी. उन्होंने कहा कि विपक्ष विरोध करता है तो करते रहे, अब कानून बन गया है तो इसे रिवर्स नहीं किया जाएगा.नई योजना में 125 दिन काम, केंद्र का ज्यादा नियंत्रण और फंडिंग में बदलाव है.
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MNREGA) की जगह केंद्र सरकार की नई ग्रामीण रोजगार संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने साफ कर दिया है कि केंद्र सरकार VB-G RAM G (विकसित भारत- ग्रामीण रोजगार और आजीविका मिशन) योजना पर कोई पीछे हटने वाली नहीं है. उन्होंने कहा, ‘एक बार कानून देश के सामने आ गया तो हमें उसका पालन करना पड़ता है… रिवर्स गियर लगाकर पुराने दौर में वापस नहीं जा सकते. ऐसा हो ही नहीं सकता.’ यह बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दल बजट सत्र में इस योजना पर सरकार को घेरने की तैयारी कर रहे हैं और विरोध तेज हो गया है.
VB-G RAM G योजना क्या है? यह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MNREGA) की जगह लेने वाली नई कानून है, जिसे पिछले महीने संसद की शीतकालीन सत्र में पास किया गया. MNREGA 2005 से चल रही थी, जो ग्रामीण गरीबों को 100 दिन का गारंटीड काम देती थी. नई योजना में काम के दिन बढ़ाकर 125 कर दिए गए हैं, लेकिन नाम बदलने (राम के नाम से जोड़ना) और कुछ प्रावधानों पर विपक्ष ने जमकर विरोध किया. विपक्ष का कहना है कि यह योजना ‘फ्यूडल’ है, गरीबों के लिए रोजगार की गारंटी खत्म कर देगी और राज्य सरकारों पर ज्यादा बोझ डालेगी.
भ्रष्टाचार का इलाज
सरकार का दावा है कि MNREGA में भ्रष्टाचार बहुत था, फंड का गलत इस्तेमाल होता था और काम की गुणवत्ता कम थी. इसलिए VB-G RAM G लाई गई, जो विकसित भारत@2047 के विजन से जुड़ी है. इसमें काम के दिन बढ़ने के साथ-साथ फोकस पानी की सुरक्षा, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर, आजीविका से जुड़ी संपत्तियां और जलवायु परिवर्तन से लड़ने पर है. सरकार कहती है कि यह योजना ज्यादा पारदर्शी और उत्पादक होगी.
अब देखिए मुख्य बदलाव क्या हैं, सरल भाषा में समझते हैं:-
- काम के दिन: MNREGA में 100 दिन थे, अब 125 दिन गारंटीड हैं. लेकिन शर्त है कि केंद्र सरकार द्वारा ‘ग्रामीण क्षेत्र’ घोषित जगहों पर ही लागू होगा.
- फंडिंग का तरीका: MNREGA में केंद्र 90% खर्च उठाता था. अब राज्य सरकारों को 40% देना होगा (पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए सिर्फ 10%). केंद्र हर साल नॉर्मेटिव आधार पर फंड तय करेगा, यानी राज्य कितना काम कर सकता है, यह केंद्र तय करेगा. यूनियन टेरिटरी को 100% फंड मिलेगा. सरकार का कहना है कि इससे राज्य ज्यादा जिम्मेदार बनेंगे, लेकिन विपक्ष कहता है कि इससे राज्य की कमजोर अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा और काम कम हो जाएगा. कांग्रेस ने इसे एंटी-पुअर कहा है.
- काम का प्रकार और नियंत्रण: पहले पंचायत स्थानीय जरूरत के हिसाब से काम तय करती थी. अब केंद्र मानक तय करेगा – जैसे निर्माण कार्य में सामग्री, डिजाइन आदि. काम को चार कैटेगरी में बांटा गया है: पानी सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण इंफ्रा, आजीविका संपत्तियां और क्लाइमेट रेजिलिएंस. विपक्ष का आरोप है कि इससे पंचायतों की स्वायत्तता कम हो गई और स्थानीय जरूरतें नजरअंदाज होंगी.
- केंद्र का ज्यादा नियंत्रण: केंद्र फंड रोक सकता है अगर गड़बड़ी पाई गई. यह “डिमांड बेस्ड” से नॉर्मेटिव हो गया है, यानी राज्य मांग नहीं कर सकते, केंद्र तय करेगा.





