शशिकांत गुप्ते
वे सभी एक हो रहें हैं। जो सन 2014 के बाद राजनैतिक पटल पर गायब थे। गायब थे नहीं,सन 2014 के बाद अलोकतांत्रिक सोच ने प्रचारित किया था कि,देश विपक्षहीन है?
लोकतंत्र में विपक्ष के साथ चौथे स्तंभ की भी अहम भूमिका होती है। इन दिनों चौथे स्तंभ पर पक्षपात होने का आरोप लगना दुर्भाग्यपूर्ण है?
लोकतंत्र में चौथा स्तंभ विपक्ष की भूमिका बखूबी निभा सकता है,और स्वतंत्रता संग्राम क्रांतिकारियों के साथ ही तात्कालिक चौथे स्तंभ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई भी है।
समाचार माध्यमों को व्यवस्था से मतलब ही सत्ता से प्रश्न पूछने चाहिए? इसे संयोग नहीं दुर्भाग्य ही कहा जाए कुछ चुनिंदा माध्यम विपक्ष से सिर्फ सवाल ही नहीं पूछते हैं,बल्कि देश की तमाम समस्याओं के लिए विपक्ष पर दोष मढ़ने का प्रयास करते हैं।
देश के एक आम व्यक्ति मतलब एक बटा एक सौ चालीस करोड़ की एहसियत से विचार किया जाए तो, महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होगा की आने वाले चुनाव में कौन जीतेगा? आम व्यक्ति के सामने तो व्यवहारिक प्रश्न हैं? महंगाई,बेरोजगारी,भुखमरी, कुपोषण, देय शक्ति में शिक्षा की फीस,महंगी चिकत्सा,निष्पक्ष कानून, जांच एजेंसियों का दुरुपयोग,वाणी की स्वतंत्रता पर अप्रत्यक्ष अंकुश न होना आदि मूलभूत सवाल हैं?
उपर्युक्त समस्याओं का हल सिर्फ सत्ता परिवर्तन से नहीं होगा,जब तक व्यवस्था परिवर्तन ना हो?
सन 1980 में पुनः सत्ता परिवर्तन के बाद प्रख्यात लेखक स्व.खुशवंत सिंह ने अपने लेख में लिखा था,डिब्बे के अंदर माला एक सा है सिर्फ लेबल अलग हैं।
साहित्यकार,चिंतक,विचारक, विश्लेषक,आमजन के मानस
में चेतना जागृत करने वाले सभी हमेशा व्यवस्था परिवर्तन के पक्षधर होते हैं,सिर्फ सत्ता परिवर्तन के कतई नहीं?
इस संदर्भ में एक हक़ीक़त
स्मरण होता है,एक बार संभवतः सन1954 में स्वतंत्रता दिवस पर तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरूजी झंडा वंदन करने सीढ़िया चढ़ थे,नेहरूजी का पांव फिसल गया,नेहरूजी के पीछे राष्ट्र कवि दिनकर थे,दिनकरजी ने नेहरूजी को संभाल लिया,नेहरूजी ने कहा धन्यवाद।
दिनकर जी कहा राजनीति जब भी फिसले गी साहित्यकार इसी तरह संभालेगा
इन दिनों विचारकों और प्रचारकों में अंतर को समझना जरूरी है।
कुछ लोग जो स्वयं को तटस्थ समझते उन्हे भी अपनी उदासीनता को त्यागना पड़ेगा।
ऐसे लोगों लिए शायर अनवर मसूद यह शेर सटीक है।
इस वक़्त वहाँ कौन धुआँ देखने जाए
अख़बार में पढ़ लेंगे कहाँ आग लगी थी
साथ ही सजग प्रहरियों के लिए निम्न में शेर अहम संदेश है।
शायर गुलज़ार का यह शेर प्रस्तुत है
नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब(भंवर) में हूँ
और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं
शशिकांत गुप्ते इंदौर





