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चरण पूज्यनीय नहीं होते आचरण पूज्य होता है : आचार्य विमदसागर मुनिमहाराज

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इंदौर। चरण पूज्यनीय नहीं होते आचरण पूज्य होता है, चर्म की पूजा नहीं होती चरित्र की पूजा होती है, हम रूप की पूजा नहीं करते हम गुणों की पूजा करते हैं। हम इस तन से न तप  करना चाहते हैं और न इस शरीर को कष्ट देना चाहते हैं। शरीर से पुण्य कम और पाप ज्यादा करते हैं और चाहते हैं सब कुछ अच्छा मिले, हमें कभी रोना न पडें। धन हो, संपत्ति हो, बड़ा सा मकान हो, गाड़ी हो पर पुण्य नहीं होगा तो सब कुछ अच्छा कैसे मिलेगा।

यह शरीर धर्म के काम नहीं आया तो किसी काम में आने वाला नहीं है। इस मनुष्य पर्याय में धर्म नहीं किया पुण्य का अर्जन नहीं किया तो किस पर्याय में प्राप्त करोगे। रोग बीमारी ने घेर लिया तो सोचो आप क्या कर सकते हो। अब चलो सीढ़ियां कितनी बार चढ़ सकते हो, मंदिर जाओ कितनी बार जा सकते हो, बैठे बैठे रोते रहोगे कि कोई भगवान के दर्शन करादें।  संघस्थ ब्र. सरिता दीदी ने विद्वत्-परिषद् के महामंत्री डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज‘ कि इंदौर के छावनी मंदिर परिसर में प्रवासरत श्रमणाचार्यश्री विमदसागर मुनिमहाराज ने एक धर्मसभा को संबोधित करते हुए ये उपदेश दिये। उन्होंने आगे कहा कि जन्मदाता तो माता-पिता हैं पर धर्मदाता तो गुरु हैं गुरु के सान्निध्य में ही आचरण पूज्य होता है तो चरण भी पूज्य हो जाते हैं इसलिए जब तक जीवित हो तब तक कुछ ना कुछ अच्छा कर लो, अच्छा करोगे तो आपको भी अच्छा ही अच्छा मिलेगा। भौतिकता का ऐसा समय है कि बच्चों में संस्कार नहीं हैं टीवी, कंप्यूटर, लैपटॉप ने और विद्यालय, महाविद्यालय की पढ़ाई ने बच्चों को व्यस्त कर दिया है।

धर्म क्या है बच्चे क्या जाने। व्हाट्सएप देखने वाला भगवान को क्या देखेगा जो भगवान की पूजा नहीं करते जिनके पास गुरु की सेवा के लिए समय नहीं है तो वह माता-पिता के लिए भी सेवा का क्या समय देंगे। जिन्होंने गुरु का कमंडल नहीं पकड़ा वह अपने माता पिता का बुढ़ापे में क्या हाथ पकड़ेंगे। आप कहते हैं बच्चे मानते नहीं, सुनते नहीं हैं, आप भी तो विचार करो आप कितनी भगवान की मान रहे हैं, आप कितनी गुरु वाणी को सुन रहे हैं, आप अपने माता पिता की कितनी सेवा कर रहे हैं। ध्यान रखो अगर बच्चों का जीवन खराब होता है तो आपका जीवन भी खराब होता है। अगर बचपन से ही बच्चों को कमंडल पकड़ना नहीं सिखाया तो वह आपका हाथ भी नहीं पकड़ेंगे। जब बच्चा बिगड़ जाए तो गुरु से कहते हैं आशीर्वाद दो बच्चा हमारी मानता नहीं है। अरे! बचपन से ही आशीर्वाद दिलाते रहते तो बच्चा बिगड़ता ही नहीं। इसलिए शरीर की सेवा नहीं करो, गुरु की सेवा करो। चारित्र धारण करने वालों की सेवा करो स्वयं भी चरित्रवान बन जाओगे पूज्य बन जाओगे।
डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, 

Ramswaroop Mantri

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