अग्नि आलोक
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*मुख्यमंत्री के 2 साल औऱ जंसमपर्क के कारनामे बे मिसाल ..?*

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*घोषणा वीर के बाद घोषणा तीर?*

मुख्यमंत्री डॉ. साहब के शब्द आज भी हवा में तैरते हैं“अब कोई भी सरकारी कर्मचारी रिटायरमेंट के बाद एक्सटेंशन नहीं पाएगा… डेपुटेशन पर गए अधिकारी रिटायरमेंट से छह महीने पहले अपने मूल विभाग में लौट आएँगे।” यह सिर्फ घोषणा नहीं थी, शासन के भीतर अनुशासन की नई लकीर खींचने का संदेश था। लेकिन आज, 13 दिसम्बर को जब वे अपने दो वर्ष पूरे कर रहे हैं, उसी वक्त उनका सबसे संवेदनशील और रणनीतिक विभाग जनसम्पर्क एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ ये घोषणाएँ दीवारों पर चिपके पुराने पोस्टर की तरह दिखती हैं धुंधले, बिसरे हुए और बेमानी।

जनसम्पर्क विभाग वह जगह है जहाँ से सरकार की नीतियों का चेहरा जनता तक पहुँचता है, पर विभाग की अपनी अंदरूनी तस्वीर किसी टूटे हुए शीशे की तरह है जितना देखो उतना जख्म नज़र आता है। हाल यह है कि एक रिटायर्ड अधिकारी को ऐसी कुर्सी पर बैठा दिया गया है, जिस पर विभाग की नींव और गोपनीयता टिकी होती है। विडंबना यह कि जनसम्पर्क से रिटायर्ड होने के बाद उन्हें माध्यम में दो साल का एक्सटेंशन दिया गया, यानी मूल विभाग उनका माध्यम है, पर गोपनीय काम जनसम्पर्क का कर रहे हैं। यह वह स्थिति है जिसे शासन की भाषा में “संस्थागत विचलन” कहा जाता है और राजनीति की भाषा में “नियमों का खुला मज़ाक।”

गोपनीय दस्तावेजों की सुरक्षा पर भारत सरकार का “Office Manual” साफ कहता है कि confidential और secret फाइलें केवल अधिकृत स्थाई कर्मचारियों की निगरानी में ही रह सकती हैं। ऐसी फाइलों की पहुँच सीमित होनी चाहिए, उनकी सुरक्षा लॉक-एंड-की के तहत होनी चाहिए और उन्हें किसी भी असंबंधित या अनधिकृत कर्मचारी खासकर संविदा, अस्थाई या रिटायर्ड व्यक्ति को नहीं सौंपा जा सकता। यह सिर्फ दिशा-निर्देश नहीं, सरकारी कामकाज का मूल आधार है। “Secretariat Office Manual” तो यहां तक कहता है कि confidential फाइलें न तो गलत हाथों में जानी चाहिएं और न ही कार्यालय से बाहर; यह “Official Secrets Act, 1923” के दायरे में अपराध माना जाता है।

यानी नियम साफ हैं गोपनीय काम केवल अधिकृत, जिम्मेदार और पदस्थ कर्मचारी ही कर सकते हैं। लेकिन जनसम्पर्क विभाग ने इन नियमों को ऐसे भुला दिया है जैसे कोई पुरानी फाइल अलमारी के पीछे गिर गई हो। गोपनीय पत्राचार से लेकर संवेदनशील आदेशों तक सब एक ऐसे व्यक्ति की मेज पर जा रहे हैं, जो न वर्तमान में पदस्थ है, न उस पद के योग्य, और न उस जिम्मेदारी के लिए अधिकृत। यह वही भूमिका है जहाँ सावधानी सबसे जरूरी होती है, पर यहाँ सावधानी छोड़कर निर्भरता को प्राथमिकता दे दी गई है।

सरकार चाहती है कि प्रदेश भ्रष्टाचार मुक्त बने यह संकल्प स्वच्छ प्रशासन की रीढ़ है पर विडंबना यह है कि मुख्यमंत्री के सबसे नज़दीक बैठा विभाग ही नियमों को सबसे तेज़ी से तोड़ रहा है। यह वैसा ही है जैसे किले की दीवार मजबूत हो, पर भीतर की ईंटें धूल बन चुकी हों। नियमों का उल्लंघन अगर नीचे से ऊपर तक शुरू होता है, तो शासन की विश्वसनीयता पर सीधा वार होता है। और यह वार जनता नहीं करती वह तो सिर्फ परिणाम भुगतती है यह वार विभाग खुद करता है, अपने ही हाथों से।

गोपनीय कामों को रिटायर्ड या डेपुटेशन से बाहर कर्मियों के हाथ में देना न सिर्फ “Office Manual” का उल्लंघन है, बल्कि “Official Secrets Act, 1923” के तहत जोखिम पैदा करता है। अगर कोई संवेदनशील दस्तावेज गलत हाथों में गया, जानकारी लीक हुई, या निर्णय प्रभावित हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी? विभाग की? सरकार की? या उस कुर्सी की जहाँ नियमों का गला घोंटकर फाइलें रखी गईं?

सवाल बड़ा है और जवाब उससे भी बड़ा क्या मुख्यमंत्री के आदेश भाषणों में ज़िंदा हैं या विभागों के दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ देते हैं? क्योंकि जनसम्पर्क विभाग की कहानी इससे कहीं गहरी है। यहाँ समस्या सिर्फ एक रिटायर्ड अधिकारी की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जहाँ “काम किसे देना है” ये निर्णय क्षमता से नहीं, सहूलियत से तय होता है। जहाँ नियम किताबों में बंद रहते हैं और विभाग मनमानी के सहारे चलते हैं।

जब विभाग की नसें किसी बाहर बैठे हाथ की पकड़ में हों, तो पूरे शरीर पर असर पड़ता है। और जब जनसम्पर्क जैसा विभाग नियमों और गोपनीयता की नींव खो दे, तो शासन की विश्वसनीयता भी कमजोर हो जाती है। ऊपर चमकती सरकारी इमारत और भीतर दीमक लगी संरचना यही इस गाथा का असली चित्र है।

और सबसे चिंताजनक बात यह कि कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जनसम्पर्क की यह गाथा अभी कई परतों को खोलना बाकी है। यह तो सिर्फ शुरुआत है पर असली सवाल यह है कि क्या इस शुरुआत को मुख्यमंत्री सुनेंगे?

Ramswaroop Mantri

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