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मुख्यमंत्री के बाल सखा रामपाल सिंह ने सबसे ज्यादा तबादले के लिए सिफारिश पत्र लिखें

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भोपाल। प्रदेश की राजनीति में एक लम्बे समय से तबादला उद्योग चलने का प्रचलन है और इसका कभी पखवाड़ा तो कभी मासिक अभियान चलता है, लेकिन इस बार जो कुछ हुआ वह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की कार्यशैली के चलते अजब व गजब तरीके को अपनाया गया, क्योंकि इस तबादला उद्योग की घोषणा एक से ३१ जुलाई तक चलने की की गई थी लेकिन मुख्यमंत्री के श्रीमुख से की गई घोषणा के दौरान पहले कमलनाथ की १५ महीने की कांग्रेस की सरकार और फिर कोरोना संक्रमण के दौर में कोई विकास कार्य न होने और जिस वर्ष २०२१-२२ के एतिहासिक बजट की घोषणा का ढिंढोरा शिवराज व उनके मंत्रियों द्वारा किया गया था ऐतिहासिक बजट के चार महीनों के बजट की बाट तो कोरोना महाकाल में खर्च हो गई और इस दौरान वह अधिकारी जिन्होंने कमलनाथ की सरकार में चले तबादला उद्योग और बड़े-बड़े कांग्रेसी नेताओं द्वारा खोले गये काउंटरों से मुंहमांगी रकम पाकर प्रसादी प्राप्त कर मनचाही पदस्थापना पाई थी लेकिन पदस्थापना जिस उद्देश्य से पाई थी उस उद्देश्य की पूर्ति कमलनाथ सरकार की हवा हवाई नीतियों के चलते पूर्ति नहीं हो पाई और २३ मार्च को कांग्रेस की कमलनाथ की सरकार गिरने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों के उधार के सिंदूर से सुहागन बने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सरकार के कार्यकाल में भी सिवाए कोरोना के कोई विकास कार्य नहीं हुआ, जिसकी वजह से हैरान-परेशान और कमलनाथ सरकार में मुंहमांगी रकम देकर तबादला पाने वाले अधिकारियों की कमर टूट गई

उन्हें अभी कुछ ऐसा नजर नहीं आ रहा कि कोरोना के अलावा कोई विकास कार्य चलेगा यही वह वजह है जो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह द्वारा एक से ३१ जुलाई तक तबादला उद्योग शुरू करने की घोषणा के दौरान अधिकांश विभाग के अधिकारियों द्वारा तबादला उद्योग में रुचि नहीं ली गई जिससे जहां भ्रष्ट राजनेता, सत्ता के दलाल और तबादला उद्योग के कारोबारी काफी परेशान रहे तो वही जिन मंत्रियों के यहां इस तबादला उद्योग के दौरान भीड़ लगा करती थी, यही नहीं इस प्रदेश की जनता ने जब दिग्विजय सिंह के शासनकाल में छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश संयुक्त मध्यप्रदेश हुआ करता था उस दौरान राजधानी के तमाम होटलों में तबादला उद्योग से जुड़े दलालों की भीड़ जुटी रहती थी वह दौर भी देखा था? लेकिन इस बार शिवराज के तबादला उद्योग में अधिकारियों की रूचि नहीं होने के कारण मुख्यमंत्री ३१ जुलाई से सात अगस्त तक इस तबादला उद्योग को बढ़ाने की घोषणा की गई, मजे की बात तो यह है कि इस तबादला उद्योग में जहां अधिकारियों की रूचि दिखाई नहीं दी तो इसी दौर में मुख्यमंत्री के बाल सखा रामपाल सिंह से जुड़े राजनेता व उनके संगी साथ ही नहीं बल्कि क्षेत्र के लोग भी उनकी झूठ बोलने की आदत से भली-भांति परिचित हैं और वह यह भी जानते हैं कि जब रामपाल सिंह मंत्री हुआ करते थे तब वह भले ही अपने बंगले में सो रहे हों लेकिन उनके निवास पर जब भी फोन लगाया जाता था तो एक ही जवाब होता था कि मंत्री जी क्षेत्र के प्रवास पर हैं लेकिन जो रामपाल सिंह की इस तरह की आदत से परिचित हैं, उन्हें जब फोन लगाते थे तो उनको भी वही रटा-रटाया जवाब मिलता था कि साहब क्षेत्र में हैं वह शाम को आएंगे, एक बार तो रामपाल सिंह के साथ बड़ी दिलचस्प घटना घटित हुई कि राजधानी के मीडिया से जुड़े एक रिपोर्टर ने जब उनको फोन लगाया तो उनका बंगले से आदत के अनुसार एक ही जवाब मिला कि वह क्षेत्रीय भ्रमण पर हैं लेकिन जब वह मीडिया कर्मी रामपाल सिंह से फोन पर बात कर रहा था तो उसी दौरान उनके ही निवास के पास कांग्रेस कार्यालय में ढोल ढमाके और फटाकेबाजी हो रही थी जिसकी आवाज उनके फोन पर सुनाई दे रही थी जब उस मीडिया कर्मी ने कहा कि क्या जहां आप भ्रमण पर हैं वहां कांग्रेस कार्यालय में बज रहे ढोल-ढमाके और फूट रहे पटाखों की आवाज पहुंच रही है मीडिया कर्मी की यह बात सुनकर रामपाल घबरा गये और बोले नहीं यार तुम आ जो हम बंगले पर ही हैं? ऐसे एक नहीं अनेकों उदाहरण मुख्यमंत्री शिवराज के बाल सखा रामपाल के मंत्री बनने के दौरान कई राजनेताओं, मीडियाकर्मी और क्षेत्र के मतदाताओं के साथ इस तरह की उनके स्टाफ और रामपाल के झूठ बोलने की घटनायें घटित हो चुकी हैं अब वही रामपाल जब मंत्री नहीं बन पाये तो आज वह मुख्यमंत्री द्वारा चल रहे तबादला उद्योग में भी सबसे ज्यादा फर्जी अनुशंसाएं करने के नाम पर चर्चित हुए हैं, हालांकि इस संबंध में क्षेत्र के लोगों और रामपाल से जुड़े लोगों का यह भी कहना है कि यह हो सकता है कि रामपाल सिंह ने ही सिफारिशें की हों लेकिन किसी राजनीतिक मजबूरीवश इन्हें फर्जी बता रहे हों उनके विधानसभा क्षेत्र से जुड़े लोगों के द्वारा राजधानी में स्थिति टाइपिंग की दुकानों के दुकानदारों पर यदि भरोसा करें तो सबसे अधिक नोटशीटें व सिफारिशी पत्र रामपाल सिंह के नाम से ही ज्यादा टाइप किये जाते थे? जब ऐसी स्थिति है तो लोगों को यह भी शंका हो रही है कि अपनी आदत के अनुसार कहीं रामपाल ने अपने द्वारा हस्ताक्षर किये गये सिफारिशी पत्रों को ही फर्जी बताकर कहीं कुछ खेल तो नहीं खेला गया? कुल मिलाकर तबादला उद्योग के इस दौर में अकेले रामपाल ही नहीं बल्कि कई सत्ता के दलालों के द्वारा सांसदों और राजनेताओं के नाम पर फर्जी सिफारिशी पत्र उजागर होने की घटना स्वयं मुख्यमंत्री कार्यालय से उजागर हुई है पता नहीं इस खुलासे के पीछे के क्या कारण हैं, लेकिन फिलहाल मुख्यमंत्री निवास से उजागर हुए इस फर्जीवाड़े की जांच क्राइम ब्रांच करने में जुट गई है, यह सभी जानते हैं कि इस शिवराज सिंह की शासन की कार्यशैली के चलते एक नहीं अनेकों लोग ऐसे भी मिल जाएंगे जो उनके शासनकाल में सक्रिय सत्ता की अदृश्य देवी के अपने आपको अंध भक्त बताते हैं, कहीं इन्हीं सभी अंध भक्तों के कारनामे भी इस फर्जीवाड़े से जुड़े न हों अब क्राइम ब्रांच की जांच के बाद यह खुलासा हो पाएगा कि इस तरह के सिफारिशी फर्जी पत्रों का फर्जीवाड़ा किसने किया है लेकिन जहां तक बात रामपाल सिंह की है तो उनकी कार्यशैली के बारे में यह बात जगजाहिर है कि वह झूठ ज्यादा बोलते हैं और इसी झूठ के चलते एक बार उनके मतदाताओं ने उन्हें पराजय का स्वाद भी चखाया था? यही नहीं क्षेत्र में चुनाव के समय गंगाजली उठाकर लोगों की समस्या का समाधान करने वाले रामपाल सिंह जीतने के बाद उस गांव में जाने की रास्ता तक भूल जाते है? इसी तरह का एक मामला गैरतगंज के पास उस गांव में हुआ था जहां के निवासी वर्षों से पानी की समस्या से जूझ रहे थे जिसके कारण उस गांव के लोगों को कोई भी अपनी लड़की नहीं देता था और पानी की इस समस्या की वजह से जिन युवकों की शादी हो गई थी वह उस गांव को छोड़ चुके थे इससे पीडि़त ग्रामीणों ने रामपाल सिंह को घेर लिया था और तब तक बैठाया था जब तक पीएचई और प्रशासन के अधिकारियों ने वहां पहुंचकर समस्या के समाधान का आश्वासन नहीं दिया था, तभी रामपाल को वहां से ग्रामीणों ने जाने दिया था ऐसी एक नहीं अनेकों घटनाओं का जिक्र रामपाल से जुड़े लोग चटकारे लेकर करते नजर आते हैं अब वही रामपाल सिंह इस तबादला उद्योग में सबसे ज्यादा सिफारशी पत्रों में लेकर घिरे हुए हैं।

Ramswaroop Mantri

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