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श्रीलंका की जमीन पर समुद्र में नया शहर बसा रहा चीन

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कोलंबो

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो के मशहूर गाले फेस बीच से कुछ दूर बड़ी-बड़ी मशीनें काम में जुटी हैं। पहले यहां समुद्र था, जिसका 665 एकड़ एरिया रेत और मिट्टी डालकर पीछे खिसका दिया गया। यहां कोलंबो पोर्ट सिटी बन रही है। 1 अरब 40 करोड़ अमेरिकी डॉलर में तैयार हो रहे इस शहर का पूरा खर्च चीन उठा रहा है। बदले में उसे यहां की 43% जमीन 99 साल के लिए लीज पर मिलेगी।

इकोनॉमिक क्राइसिस से जूझते हुए श्रीलंका को एक साल से ज्यादा वक्त हो चुका है। पैसों की कमी से सरकार ने वेलफेयर स्कीम्स बंद कर दीं। सभी बड़े प्रोजेक्ट रोक दिए गए, लेकिन पोर्ट सिटी का काम नहीं रुका। श्रीलंका की सरकार भले इस प्रोजेक्ट को ‘कोलंबो पोर्ट सिटी’ कह रही है, लेकिन इसका विरोध करने वाले इसे ‘चाइना पोर्ट सिटी’ कहते हैं।

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो के समुद्र तट पर बन रही पोर्ट सिटी। ये जगह गाले फेस बीच के सामने है, जहां से 2022 में श्रीलंका सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ था।

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो के समुद्र तट पर बन रही पोर्ट सिटी। ये जगह गाले फेस बीच के सामने है, जहां से 2022 में श्रीलंका सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ था।

श्रीलंका के आर्थिक संकट पर रिपोर्ट करने के दौरान हम पोर्ट सिटी तक पहुंचे। देखा कि अंदर श्रीलंका के साथ चीन के झंडे लहरा रहे हैं। यही लोगों के डर की वजह भी है। उन्हें लगता है कि चीन को नियमों से परे जाकर ये सिटी बनाने की परमिशन दी गई है। यहां उसी के नियम चलेंगे और इसी तरह चीन देश पर कब्जा कर रहा है।

ये डर कितना सही है, पोर्ट सिटी से श्रीलंका और चीन को क्या फायदा होगा और भारत के लिहाज से ये डेवलपमेंट कैसा है, पढ़िए ये रिपोर्ट…

साइट पर एयरपोर्ट जैसी सिक्योरिटी, अंदर चीनी अधिकारी और बौद्ध टेंपल
पोर्ट सिटी में बिना परमिशन मीडिया की एंट्री बैन है। हमें डर था कि चीनी प्रोजेक्ट में शायद हमें एंट्री न मिले, इसलिए हम आईकार्ड छिपाकर अंदर पहुंचे। श्रीलंका के प्रेसिडेंट ऑफिस के ठीक सामने इसका एंट्रेंस गेट है। गेट पर करीब 5 मिनट की पूछताछ के बाद हमें अंदर जाने की परमिशन मिल गई। ये इजाजत सिर्फ बीच तक जाने की थी। पोर्ट सिटी में अंदर हर तरफ रेत दिखाई देती है, पहले यहां समुद्र था, जिसे रेत और मिट्टी से पाट दिया गया।

एयरपोर्ट जैसे सख्त सिक्योरिटी चेक के बाद हम आगे बढ़े। सामने रेत का बड़ा मैदान और बड़ी-बड़ी मशीनें दिखीं। आगे जाने के लिए 300 मीटर का एक ब्रिज है। अलग-अलग हिस्सों में ऐसे 6 ब्रिज बन रहे हैं। कुछ जगहों पर स्लैब लेवल तक बिल्डिंग्स का काम हो चुका है।

चीनी इंजीनियर्स की देखरेख में ये पूरा काम चल रहा है। पोर्ट सिटी में मौजूद लगभग सभी गाड़ियां चीन से आई हैं। हालांकि लेबर सस्ता होने से लोकल लोगों से कंस्ट्रक्शन का काम करवाया जा रहा है।

पोर्ट सिटी में कई हाई सिक्योरिटी जोन बने हैं, जिनमें बाहरी लोगों की एंट्री पर रोक है।

पोर्ट सिटी में कई हाई सिक्योरिटी जोन बने हैं, जिनमें बाहरी लोगों की एंट्री पर रोक है।

पोर्ट सिटी में चारों तरफ चीन के झंडे लगे हैं। कुछ जगह श्रीलंका के झंडे भी हैं। ज्यादातर कंस्ट्रक्शन 30 से 40 फीट ऊंची लोहे की चादरों से ढंके एरिया में हो रहा है। बाहर से वहां देख पाना मुश्किल है।

पोर्ट सिटी के अंदर हमें एक अंडर कंस्ट्रक्शन बौद्ध मंदिर दिखा। यहां टेम्परेरी मोबाइल फोन के टावर भी लगे हैं।

पोर्ट सिटी के अंदर हमें एक अंडर कंस्ट्रक्शन बौद्ध मंदिर दिखा। यहां टेम्परेरी मोबाइल फोन के टावर भी लगे हैं।

अधिकारी बोले- चीन आपके लिए प्रॉब्लम होगा, हमारे लिए नहीं है
पोर्ट सिटी में करीब आधा घंटा रुकने के बाद हम हार्बर पोर्ट ट्रस्ट के एक अधिकारी से मिले। उन्होंने पहले ही कह दिया कि भारत-चीन और श्रीलंका के रिश्तों पर कोई भी इंडियन मीडिया से बात नहीं करेगा।

नाम जाहिर न करते हुए अधिकारी ने बताया कि चीन भले ही भारत के लिए प्रॉब्लम है, लेकिन श्रीलंका के लिए खतरा नहीं है। श्रीलंका दोनों देशों के करीब है। इकोनॉमिक क्राइसिस में दोनों देशों ने हमारी मदद की है। इसलिए श्रीलंका को चीन से तब तक दिक्कत नहीं है, जब तक वो उसके सामरिक हितों को नुकसान नहीं पहुंचाता। फिलहाल वो ऐसा नहीं कर रहा है।

देखने में श्रीलंकाई प्रोजेक्ट, लेकिन कब्जा चीन का
हार्बर पोर्ट के अधिकारी ने बताया कि चीन पूरे प्रोजेक्ट को बहुत समझदारी से बना रहा है। ये बाहर से देखने में श्रीलंकाई सरकार का प्रोजेक्ट लगता है, लेकिन असल में ये ऑटोनॉमस देश जैसा है। यानी यहां न श्रीलंका का सिस्टम चलेगा, न ही नियम-कानून। पुलिस बिना इजाजत कोलंबो पोर्ट सिटी में नहीं जा सकेगी। हालांकि अभी इसका फाइनल ड्राफ्ट बन रहा है। ड्राफ्ट बनने पर चीजें क्लियर होंगी।

हमने अधिकारी से पूछा कि क्या सिटी में जाने के लिए पासपोर्ट और वीजा लेना होगा? जवाब में वे कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है। यहां आने के लिए पासपोर्ट या वीजा नहीं चाहिए, लेकिन बिना टिकट लिए कोई नहीं जा सकता। हालांकि ये टिकट तभी काम करेगा, जब आपके पास प्रॉपर परमिशन होगी और यहां का एडमिनिस्ट्रेशन आपको इजाजत देगा।’

कोलंबो का ये हिस्सा 99 साल तक चीन के पास रहेगा
अधिकारी ने आगे बताया कि इस जगह पर 99 साल तक चीन का कब्जा रहेगा। हालांकि फाइनल ड्राफ्ट में श्रीलंका सरकार अपने कुछ क्लॉज डालने की कोशिश कर रही है, लेकिन चीन इसके विरोध में है।

अधिकारी के मुताबिक, श्रीलंका सरकार पूरी तरह से इस शहर का नियंत्रण चीन को नहीं देना चाहती है। अभी नियम ऐसे हैं कि चीन यहां अपने हिसाब से कोई भी कंस्ट्रक्शन कर सकेगा, उसमें बदलाव कर सकेगा और उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकेगा।

चीन को दिक्कत न आए इसलिए संसद में पास करवाया बिल
अधिकारी ने बताया कि इस काम में कोई रुकावट न आए, इसलिए तब के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने 8 अप्रैल 2021 को पोर्ट सिटी बिल संसद में पेश किया था। इसके खिलाफ श्रीलंका की सुप्रीम कोर्ट में 19 याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें कहा गया कि ये बिल श्रीलंका की संप्रभुता में दखल देता है। बिल रद्द करने की मांग की गई।

अदालत ने 3 महीने की सुनवाई के बाद फैसला संसद के समर्थन में दे दिया और बिल आसानी से पास हो गया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जनमत संग्रह और बिल में संशोधन का सुझाव दिया था।

सरकार ने कहा- 2 लाख नौकरियां आएंगीं, श्रीलंका दुबई-हॉन्गकॉन्ग की तरह बनेगा
तब प्रधानमंत्री रहे महिंदा राजपक्षे ने संसद को बताया कि पोर्ट सिटी से पहले 5 साल में 2 लाख नौकरियां पैदा होंगी। इससे डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट बढ़ेगा और श्रीलंका को फायदा होगा। उसी वक्त कोलंबो पोर्ट सिटी के डायरेक्टर यामुन जयरत्ने ने कहा था कि ये साउथ एशिया का फाइनेंशियल हब बनेगा। श्रीलंका भी दुबई और हॉन्गकॉन्ग की तरह बेहतरीन सर्विस दे सकेगा।

8 अप्रैल को पोर्ट सिटी बिल सदन में पास हुआ और 24 मई को सरकार ने पोर्ट सिटी के कंस्ट्रक्शन का ठेका चीनी कंपनी को दे दिया।पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट चीनी इंजीनियर्स की देखरेख में तैयार हो रहा है। हालांकि कंस्ट्रक्शन के काम में लोकल लोग लगाए गए हैं।

जनमत संग्रह की जगह संशोधन करके बिल पास कराया
अधिकारी कहते हैं, ‘2021 में श्रीलंका में गोटबाया राजपक्षे राष्ट्रपति और उनके भाई महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री थे। उनके पास संसद में बहुमत था, इसलिए बिल पास होने में देर नहीं लगी। पक्ष में 149 और विरोध में 58 वोट पड़े।’

‘सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि संशोधन और जनमत संग्रह दोनों पर विपक्ष का भी समर्थन लिया जाए। राजपक्षे सरकार इतनी शातिर निकली कि उसने जनमत संग्रह कराने की मांग पर विचार करने की बजाय, बिल में बस मामूली संशोधन किए। फिर संसद में बहुमत के बल पर इसे पास करा लिया।’

फोटो 16 सितंबर, 2014 की है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के श्रीलंका दौरे का आखिरी दिन था। जिनपिंग और श्रीलंकाई राष्ट्रपति रहे महिंदा राजपक्षे की मौजूदगी में चीनी कंपनी और श्रीलंका की पोर्ट एंड शिपिंग मिनिस्ट्री ने प्रोजेक्ट के लिए एग्रीमेंट किया था।

फोटो 16 सितंबर, 2014 की है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के श्रीलंका दौरे का आखिरी दिन था। जिनपिंग और श्रीलंकाई राष्ट्रपति रहे महिंदा राजपक्षे की मौजूदगी में चीनी कंपनी और श्रीलंका की पोर्ट एंड शिपिंग मिनिस्ट्री ने प्रोजेक्ट के लिए एग्रीमेंट किया था।

श्रीलंका के लिए गेमचेंजर, लेकिन भारत के लिए खतरा
महिंदा राजपक्षे ने पोर्ट सिटी बनाने का जिम्मा चीन की बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी यानी CHEC को दिया था। कंपनी इसे दक्षिण एशिया के सबसे बड़े बिजनेस सेंटर की तरह बना रही है। एक्सपर्ट कहते हैं कि आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका के लिए ‘कोलंबो पोर्ट सिटी’ प्रोजेक्ट गेम चेंजर हो सकता है।

एक्सपर्ट्स ये भी मानते हैं कि ये प्रोजेक्ट चीन को श्रीलंका में पैर जमाने में मदद करेगा और सामरिक रूप से ये भारत के लिए मुश्किल खड़ी करेगा है। पोर्ट सिटी से भारत का रामेश्वरम सिर्फ 300 किलोमीटर दूर है।

पोर्ट सिटी पर चीन का कब्जा रहेगा, इसलिए वो यहां अपने डिफेंस ऑफिस बना सकता है। हालांकि श्रीलंका सरकार भारत को भरोसा देती रही है कि ये सिर्फ कॉमर्शियल प्रोजेक्ट है, जिसे बनाने का जिम्मा चीन को दिया गया है। इससे भारत की सुरक्षा को खतरा नहीं होगा।

हम्बनटोटा बंदरगाह बनाने वाली कंपनी को ही पोर्ट सिटी का ठेका
पोर्ट सिटी बना रही चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी चाइना कम्युनिकेशंस कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिडेट यानी CCCC का हिस्सा है। CCCC हॉन्गकॉन्ग और शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड है और 145 देशों में काम करती है। CCCC पोर्ट, सड़क और पुल डिजाइन करने और बनाने के अलावा ड्रेजिंग, कंटेनर क्रेन और भारी मशीनरी तैयार करने में ग्लोबल लीडर है।

ये कंपनी श्रीलंका में साउथ हाईवे, आउटर पेरिफेरल हाईवे, हम्बनटोटा बंदरगाह, मतला इंटरनेशनल एयरपोर्ट, कोलंबो साउथ कंटेनर टर्मिनल जैसे बड़े प्रोजेक्ट से जुड़ी है।

चीन श्रीलंका की पूरी इकोनॉमी कंट्रोल करना चाहता है…
पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट पर हमने श्रीलंका मामलों के एक्सपर्ट और सीनियर जनर्लिस्ट आर.के. राधाकृष्णन से बात की। भारत के नजरिए से इस प्रोजेक्ट को समझाते हुए राधाकृष्णन बताते हैं, ‘चीन श्रीलंका की इकोनॉमी पर पूरी तरह कब्जा करना चाहता है। वो ऐसे इलाके की तलाश में था, जिसमें गुजरात की तरह पोटेंशियल हो।’

‘अब वो कोलंबो के इस इलाके को हॉन्गकॉन्ग और मकाऊ जैसा डेवलप कर रहा है। यहां भी वही मॉडल होगा, जो हॉन्गकॉन्ग में है।’

भारत के पास मौका था, पर उसने विरोध नहीं किया
भारत सरकार का इस प्रोजेक्ट पर क्या रुख है? इसके जवाब में राधाकृष्णन कहते हैं, ‘ये प्रोजेक्ट UPA सरकार के वक्त लॉन्च हुआ था। सरकार ने इसका काफी विरोध भी किया था। श्रीलंका के मौजूदा राष्ट्रपति रानिल विक्रमासिंघे तब प्रधानमंत्री थे। उन्होंने भारत सरकार से कहा था कि वे इस प्रोजेक्ट पर रोक लगा देंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।’

‘प्रोजेक्ट को कुछ देर के लिए रोका गया, फिर शुरू कर दिया। भारत सरकार के पास इसके खिलाफ खड़े होने के कई मौके थे, लेकिन वो मजबूती से विरोध नहीं कर पाई। अभी ये प्रोजेक्ट पूरी तेजी से चल रहा है, पर मौजूदा सरकार भी कुछ नहीं कर रही है।’

श्रीलंका चीन के जितना करीब जाएगा, भारत से उतना दूर होगा…
चीन की मौजूदगी से भारत और श्रीलंका के रिश्तों पर क्या असर होगा? इस पर राधाकृष्णन कहते हैं, ‘इसी प्रोजेक्ट की बात नहीं है, जिस तरह श्रीलंका में चीन अपनी पकड़ बना रहा है, वो भारत के लिए बहुत चिंता की बात है। श्रीलंका के नॉर्थ और ईस्ट प्रोविंस में कभी LTTE का कब्जा था। यहीं सबसे ज्यादा तमिल लोग रहते हैं। चीन इस इलाके में पैर पसारना शुरू कर चुका है।’

‘वो श्रीलंका के हर राज्य में कुछ न कुछ बना रहा है। इनमें कॉमर्शियल और रेसिडेंशियल दोनों तरह के प्रोजेक्ट हैं। यही वजह है कि श्रीलंका के लोग भारत के मुकाबले चीन के ज्यादा करीब होते जा रहे हैं।’

चीन के लालच में फंसी श्रीलंकाई सरकार
राधाकृष्णन आगे कहते हैं, ‘चीन ने श्रीलंकाई सरकार को लालच दिया कि वो पोर्ट सिटी में श्रीलंका का पहला स्पेशल इकोनॉमिक जोन यानी SEZ बनाएगा। यहां हर देश की करेंसी में बिजनेस किया जा सकेगा। इसलिए पोर्ट सिटी के कंस्ट्रक्शन का ठेका चीनी कंपनी को दिया गया।’

‘पूर्वी अफ्रीका हो या पाकिस्तान, चीन हमेशा कर्ज देकर अपना विस्तार करता आया है। श्रीलंका पर तो उसकी पैनी नजर है। हम्बनटोटा को वो पहले ही 99 साल की लीज पर ले चुका है। कोलंबो पोर्ट सिटी के साथ भी 99 साल की लीज की शर्त है। कर्ज के जाल में श्रीलंका उलझ जाएगा और जैसे हम्बनटोटा को खोया, वैसा ही कोलंबो पोर्ट सिटी के साथ भी होगा।’

कम ब्याज पर लोन देकर पैठ बना रहा चीन
चीन के आने से श्रीलंका के लोग खास तौर पर बिजनेसमैन काफी संतुष्ट दिखते हैं। हमने भारत समेत कई देशों में चाय का बिजनेस करने वाले संजोय फर्नांडो से बात की। चीन के साथ रिश्तों पर सवाल किया तो उन्होंने बताया कि 1970 से पहले चीन यहां सिर्फ 10% फंडिंग किया करता था। 2016 में ये आंकड़ा 16% पहुंच गया। 2022 आते-आते इसमें 9% की ग्रोथ हुई। आज देश की इकोनॉमी में 25% की फंडिंग सिर्फ चीन की है।

फर्नांडो ने आगे बताया कि चीन आम लोगों के अलावा बिजनेसमैन को भी आर्थिक मदद दे रहा है। पहले चीन बाइलैट्रल फंडिंग करता था। अब उसने प्रोजेक्ट बेस्ड फंडिंग शुरू की है। चीन बहुत कम रेट ऑफ इंटरेस्ट लेता है। शुरू में ये सिर्फ 2 या 3% के बीच होता था। इसी तरीके से कॉमर्शियल फंडिंग भी बहुत कम इंटरेस्ट पर मिल रही है। कुछ जगहों पर चीन ने जीरो इंटरेस्ट रेट पर लोन देकर लोगों के मन में सॉफ्ट कॉर्नर बना लिया है।

चीन से लोन लेना आसान, लेकिन मुसीबत में साथ नहीं देगा…
चीन के साथ रिश्तों का बड़ा फायदा क्या होगा? फर्नांडो कहते हैं, ‘चीन आमतौर पर दूसरों की तुलना में बहुत आसानी से कर्ज देता है। उससे लोन लेने का बड़ा नुकसान समझिए। मई 2022 में हम IMF के पास गए, तो उन्होंने कहा कि हमें पहले बाइलैट्रल यानी चीन से बात करनी चाहिए।’

‘हमने चीन से अपनी रिक्वायरमेंट को रिस्ट्रक्चर करने के लिए कहा तो उसने मना कर दिया। इससे हमें IMF से सही वक्त पर लोन लेने में दिक्कत हुई। कह सकते हैं कि चीन से लोन लेना आसान है, लेकिन जब आप मुसीबत में होंगे, तो वो आपके साथ खड़ा नहीं होगा।’

हालांकि फर्नांडो ने माना कि हम किसी भी हालत में भारत को नहीं छोड़ सकते। वो हमेशा हमारे करीब रहेगा।

प्रोजेक्ट स्मूथ चल सके इसलिए चीन, सरकार में बैठे लोगों को पैसे देता है…
पोर्ट सिटी पर विपक्ष का क्या रुख है, ये जानने हम समागी जना बालावेगाया पार्टी के मेंबर और कोलंबो वेस्ट के ऑर्गेनाइजर जयंद्र देवपुर से मिले। वे कहते हैं, ‘श्रीलंका की स्ट्रैटजिक लोकेशन की वजह से हमसे चीन के रिलेशन बहुत अच्छे हैं।’

‘चीन हमेशा यहां अहम भूमिका निभाता रहा है। वो सिर्फ अपने प्रोजेक्ट में ही नहीं, सरकार में बैठे लोगों में भी इन्वेस्ट करता है, ताकि अपने प्रोजेक्ट को स्मूथ तरीके से चला सके। पिछली और मौजूदा सरकार में बैठे लोगों में भी उसने बहुत इन्वेस्ट किया है।’

स्ट्रैटजिक लोकेशन की वजह से श्रीलंका को फायदा…
कोलंबो पोर्ट सिटी की फाउंडेशन टीम का हिस्सा रहे माइकल शांतिकुमार मानते हैं पोर्ट सिटी श्रीलंका के लिए शानदार प्रोजेक्ट होगा। वे कहते हैं, ‘ऐसे और प्रोजेक्ट देश में बनने चाहिए। हम हिंद महासागर में बहुत अच्छी लोकेशन पर हैं। टूरिस्ट को अट्रैक्ट करने के लिए ऐसे प्रोजेक्ट की जरूरत है।’

ये प्रोजेक्ट कैसे श्रीलंका की इकोनॉमी को इफेक्ट करेगा, इसका जवाब देते हुए माइकल ने कहा कि हॉन्गकॉन्ग, दुबई और सिंगापुर जैसे देश ऐसे प्रोजेक्ट से बहुत कुछ अचीव कर चुके हैं। सिर्फ दुबई में पिछले साल 56 बिलियन डॉलर का इन्वेस्टमेंट हुआ है। पोर्ट सिटी से हम भी दुनिया के नक्शे में जगह बना पाएंगे।

मछुआरों की रोजी-रोटी पर संकट
समुद्र में बन रहे इस प्रोजेक्ट के खिलाफ 2016 में बड़ा प्रदर्शन हुआ था। मछुआरों ने कई दिनों तक भूख हड़ताल की। सरकार ने जबरन उनका अनशन तुड़वाकर सभी को जेल में डाल दिया था।

कोलंबो के मछुआरे शुरुआत से पोर्ट सिटी के विरोध में हैं। उन्होंने 2016 में प्रदर्शन भी किया, जिसे सरकार ने ताकत से दबा दिया।

कोलंबो के मछुआरे शुरुआत से पोर्ट सिटी के विरोध में हैं। उन्होंने 2016 में प्रदर्शन भी किया, जिसे सरकार ने ताकत से दबा दिया।

ऑल सीलोन फिशर लोक ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष अनुरा रोशनथा फर्नांडो कहते हैं, ‘पोर्ट सिटी श्रीलंका के लोगों का नहीं, बल्कि महिंदा राजपक्षे और उनके परिवार का पैसा कमाने का जरिया है। ये चीन की तरफ से इस परिवार को दिया गिफ्ट है। राजपक्षे परिवार ने हमारी जमीनें चीन को बेच दीं।’

‘पोर्ट सिटी बनने से 175 मील कोस्टलाइन प्रभावित होगा। मछलियां तट से दूर हो जाएंगी। इससे आसपास के इलाके में मछलियों की ब्रीडिंग प्रभावित होगी। इससे मछुआरों की रोजीरोटी पर बड़ा संकट आने वाला है।’

Ramswaroop Mantri

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