अफ्रीका के 78 बंदरगाहों पर चीन का कब्जा, हिंद महासागर में बढ़ा रहा सैन्य ताकत.
बीजिंग: दुनिया के नक्शे पर चीन एक ऐसी बिसात बिछा रहा है, जिसने रक्षा विशेषज्ञों और वैश्विक महाशक्तियों की चिंता बढ़ा दी है. ‘द टेलीग्राफ’ की ओर से जारी सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि पिछले एक दशक में चीन ने अफ्रीका के चारों ओर रणनीतिक बंदरगाहों का घेरा तैयार कर लिया है. नाइजीरिया के लेक्की (Lekki) से लेकर केन्या के मोम्बासा तक, इन बंदरगाहों का निर्माण इस तरह किया गया है कि वे न केवल व्यापारिक माल ढो सकें, बल्कि चीन की विशाल नौसेना के युद्धपोतों को भी पनाह दे सकें. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह विस्तार स्वेज नहर जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों के पास एक ऐसा नेटवर्क खड़ा कर रहा है, जो युद्ध की स्थिति में चीन को अजेय बना सकता है.चीन ने अफ्रीका के चारों ओर रणनीतिक बंदरगाहों का एक ऐसा जाल बिछा दिया है जो भविष्य में उसके युद्धपोतों के लिए नेवल बेस का काम करेंगे. सैटेलाइट इमेज से खुलासा हुआ है कि नाइजीरिया से लेकर केन्या तक, चीन ने बंदरगाहों को इस तरह बनाया है कि वहां भारी युद्धपोत आसानी से लंगर डाल सकें. यह न केवल व्यापारिक बढ़त है, बल्कि अमेरिका और पश्चिम को रणनीतिक रूप से घेरने की एक बड़ी सैन्य साजिश भी है.
ड्रैगन की चाल: व्यापार के बहाने युद्ध की तैयारी?
चीन की रणनीति बहुत गहरी है. वह जिन बंदरगाहों को ‘सिविलियन पोर्ट’ कहकर बना रहा है, उनमें गुप्त रूप से सैन्य सुविधाएं विकसित की जा रही हैं. लेक्की और मोम्बासा जैसे बंदरगाहों की गहराई और उनके बुनियादी ढांचे को चीनी युद्धपोतों के वजन और आकार के हिसाब से डिजाइन किया गया है. रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (RUSI) के विश्लेषकों का कहना है कि चीन ने बहुत चतुराई से इन्हें ‘ड्यूल यूज’ (Dual Use) के लिए बनाया है. शांति के समय में यहां से तांबा और कोबाल्ट जैसे खनिज चीन भेजे जाते हैं, लेकिन संकट के समय में ये विध्वंसक (Destroyers) जहाजों और रिफ्यूलिंग टैंकर्स के लिए लॉजिस्टिक हब बन जाएंगे. चीन पहले ही जिबूती में अपना नेवल बेस बना चुका है, जो स्वेज नहर के प्रवेश द्वार पर उसकी पकड़ मजबूत करता है.
खनिजों पर कब्जा और ‘सैंक्शन-प्रूफ’ सप्लाई चेन
- चीन की इस घेराबंदी के पीछे भविष्य की आर्थिक सुरक्षा भी है. अफ्रीका के ये बंदरगाह सीधे तौर पर उन खदानों से जुड़े हैं जहां से आधुनिक तकनीक के लिए जरूरी कॉपर और कोबाल्ट निकलता है. फाइटर जेट्स से लेकर स्मार्टफोन तक, बिना इन खनिजों के कुछ भी बनाना मुमकिन नहीं है. चीन ने इन खदानों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए अरबों डॉलर खर्च करके रेलवे और सड़क प्रोजेक्ट्स बनाए हैं.
- विश्लेषकों का मानना है कि चीन एक ऐसी सप्लाई लाइन तैयार कर रहा है जिस पर पश्चिमी देशों का कोई नियंत्रण न हो. अगर भविष्य में ताइवान को लेकर अमेरिका या पश्चिम के साथ टकराव होता है और चीन पर प्रतिबंध लगते हैं, तो भी उसकी अर्थव्यवस्था इन ‘सैंक्शन-प्रूफ’ रास्तों से चलती रहेगी.
78 बंदरगाह और 32 देश: ड्रैगन की वैश्विक पहुंच
पेंटागन से जुड़े थिंक टैंक के आंकड़ों के अनुसार, चीन की सरकारी कंपनियां वर्तमान में अफ्रीका के 32 देशों में 78 बंदरगाहों पर बिल्डर, फाइनेंसर या ऑपरेटर के रूप में काम कर रही हैं. यह मौजूदगी लैटिन अमेरिका या एशिया की तुलना में कहीं अधिक सघन है. नाइजीरिया का लेक्की पोर्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां चीन ने 660 मिलियन पाउंड का निवेश किया है.
साल 2025 के शुरुआती नौ महीनों में ही इस बंदरगाह ने 9 अरब डॉलर का कार्गो हैंडल किया है. अंगोला, नामीबिया, सेशेल्स और तंजानिया जैसे देशों में भी चीन अपनी जड़ें जमा चुका है. इन पोर्ट्स के ऑपरेटर होने के नाते चीनी एजेंसियां संवेदनशील कार्गो और अन्य देशों के जहाजों की आवाजाही पर भी नजर रख सकती हैं.
अमेरिका और भारत के लिए क्या है इसके मायने?
चीन की इस बढ़ती ताकत ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को चौकन्ना कर रखा है. ट्रंप जहां ‘गनबोट डिप्लोमेसी’ (Gunboat Diplomacy) के जरिए अमेरिका की नौसेना का विस्तार करने की बात कर रहे हैं, वहीं चीन पहले से ही दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना के साथ समंदर में मौजूद है. भारत के लिए भी यह एक गंभीर सुरक्षा संकट है.
हिंद महासागर में चीन की इस तरह की घेराबंदी भारत के व्यापारिक हितों और क्षेत्रीय सुरक्षा को सीधी चुनौती देती है. चीन के युद्धपोत पहले से ही केप टाउन और हिंद महासागर के अन्य हिस्सों में युद्धाभ्यास कर रहे हैं. अगर चीन इन बंदरगाहों को पूरी तरह सैन्य बेस में बदल देता है, तो अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा और संप्रभुता के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा.





