सतपुङा और विंधयांचल से गुजरने वाली नर्मदा के बीच अपभ्रंश, जिसे सिस्समोलाॅजी की भाषा में फॉल्ट कहा जाता है।नर्मदा घाटी के फॉल्ट जोन और इंडियन प्लेट्स के लगातार मूवमेंट के कारण दरार बढने से भूकंप के खतरे को बढा दिया है।
इसके अलावा नर्मदा घाटी में बने बांधो के कारण दरारों में पानी भर रहा है।इससे चट्टानों का संतुलन प्रभावित होने की आशंका है।बीते तीन साल में नर्मदा और सोन नदी घाटी जिलों में धरती के नीचे 37 बार भूकंप आ चुका है।हालांकि इसकी तीव्रता 1.8 से 4.6 रिक्टर स्केल के बीच रहा है।अमरकंटक से अलिराजपुर के बीच आने वाले जिन 15 जिलों को संवेदनशील माना जा रहा है ,उनमें इंदौर और जबलपुर सहित डिंडोरी, मंडला,सिवनी,छिन्दवाङा, बालाघाट, नरसिंहपुर, देवास, धार,खरगौन बङवानी भी शामिल है।जबलपुर भूकंपीय क्षेत्र- 3 में आता है, इसलिए यहां ज्यादा खतरा है।ज्ञात हो कि 22 मई 1997 को जबलपुर में आए भूकंप में 41 लोगों की मौत हुई थी।तब रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 5.8 मापी गई थी।प्रदेश में भूकंपीय क्षेत्र- 3 में बसा बङी आबादी वाला महानगर जबलपुर ही है।नर्मदा घाटी के जिन 15 जिलों को संवेदनशील माना गया है, वहां विकास कार्यो के लिए कितने कहां- कहां कितनी तीव्रता के विस्फोट किये गए हैं, उसकी निगरानी आवश्यक है।चुटका परियोजना के निर्माण में भी भारी तीव्रता का विस्फोट किया जाएगा।जिसके कारण भूगर्भीय हलचल से इंकार नहीं किया जा सकता है।
आपदा प्रबंधन संस्थान, भोपाल की एक रिपोर्ट के अनुसार मंडला जिले की टिकरिया (नारायणगंज) भूकंप संवेदी क्षेत्रों की सूची में दर्शाया गया है।अतः नर्मदा किनारे प्रस्तावित चुटका परणाणु परियोजना को लगाने पर पुनर्विचार करना चाहिए।
राज कुमार सिन्हा बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ





