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नागरिक एकता और सक्रियता ही समाधान है… अरबपतियों और सांप्रदायिक राजनीतिज्ञों की तानाशाही

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प्रो. आनंद कुमार

1. यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि देश की दशा और दिशा के मूल्यांकन और आगे का रास्ता अपनाने के लिए सरोकारी व्यक्तियों के बीच चारो तरफ महत्वपूर्ण संवाद हो रहे है. इस प्रक्रिया की जरूरत पर बल देते हुए यह याद दिलाने की जरुरत है कि हम किसी एक व्यक्ति, गिरोह, दल या गठबंधन से ही त्रस्त नहीं हैं बल्कि ‘उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण’ के भयंकर नतीजों का सामना रहे हैं. हमारी मुख्य समस्याओं का बीजारोपण और अंकुरण पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में हुआ है. आजकल के सताधीशों द्वारा इसे जादा खाद-पानी दिया जा रहा है और जादा जहरीले फल सामने आ रहे हैं.

2. लेकिन इसको समझने में देर क्यों हुयी है? इसके तीन कारण तो स्पष्ट हैं. एक तो १९९० -२०१० के बीस बरसों में हमारे मध्यम वर्ग का तात्कालिक विस्तार हुआ और उसे भोगवाद के वैश्विक मायामृग ने देशहित से दूर भटका दिया. लेकिन वैश्विक पूंजीवाद की नाव की आर्थिक राष्ट्रीयता से टकराहट के कारण मध्यम वर्ग को अपनी भौगोलिक सीमाओं में बने रहने की विवशता की समझ हो रही है. इसीलिए ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ से लेकर ‘धार्मिक एकरूपता’ जैसे नारों से नया सामाजिक आधार बनाने की प्रवृत्ति को बल देने में जुट गया है.

3. दूसरे, भारत में संसदवाद और चुनाववाद की आड़ में ‘अस्मिता’ की राजनीति के बहाने नागरिक हितों की बजाय जाति-गठबन्धनों और धार्मिक भेदभाव की धुंध को बढ़ाया गया है. १९७४ से ही बताये जा रहे जरुरी चुनाव सुधार और राजनीतिक दल-व्यवस्था में सुधार को न करने के पाप ने इस भयानक रोग को फैला दिया है. बिना बुनियादी सुधारों के हम एक बीमार लोकतंत्र की भ्रष्ट चुनाव व्यवस्था और अलोकतांत्रिक दलीय व्यवस्था के साथ जीने के अभ्यस्त हो रहे हैं.
अब बिना चुनाव सुधार और राजनीतिक दलों के सुधार के हम इस दलदल में लम्बे समय के लिए फंसे रहने को अभिशप्त राष्ट्र और समाज हो गए हैं. इसे हमारे पिछले पांच सौ साल के इतिहास की बुरी यादों और भारत-विभाजन के ज़िंदा सवाल से बल मिल रहा है. इसीलिए हिन्दुस्तान के बुनियादी मुद्दों को ‘पाकिस्तान-रमजान-कब्रिस्तान- मुसलमान’ के शोर में दबाने में सफलता पाए राजनीतिक गिरोह को सत्ताच्युत करने के लिए तात्कालिक दलीय गठ्बधनों से जादा हमारी ऐतिहासिक स्मृतियों, सामजिक व्याकरण और आर्थिक दिशा के बारे में नयी राष्ट्रीय सहमति की रचना की जरूरत है.

४. तीसरे, चीन से दुनिया भर में फैले कोरोना संकट ने हमारे बाज़ार केन्द्रित पूंजी-संचय के आर्थिक आधार की कच्ची नींव का सच दिखाया है. उत्पादन, प्रबंधन और खपत के लिए नगरों और उद्योगों की गाँवों पर निर्भरता का उपेक्षित सच ‘नयी आर्थिक नीतियों’ के क्षणभंगुर परिणामों से मोह ख़तम कर चुका है. यह साफ़ कहने का समय आ गया है कि भारत के टिकाऊ नव-निर्माण का रास्ता देश के साढे पांच लाख गाँवों और सात सौ जिलों से गुजरता है. इन तीन पाठों के प्रकाश में नयी राह अपनाने की जरूरत है. सब मिलकर ‘दवाई – कमाई – पढ़ाई – सफाई’ के संकट से जूझ रहे लिए करोड़ों स्त्री-पुरुषों के सहयोगी बनने की राह अपनाएंगे. इन सवालों पर आगे आने के लिए जेलों में बिना मुकदमों के गिरफ्तार हजारों लोकतंत्र रक्षक देशवासियों की ‘रिहाई’ में भी मददगार बनेंगे.

5. यह निर्विवाद सत्य है कि हमारा देश एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है. लेकिन फुटकरिया प्रतिरोध के अलावा किसी तरफ से नीति आधारित कार्यक्रमों से लैस लोकतान्त्रिक राजनैतिक विकल्प की दावेदारी नहीं है. देश के पास १९७३-७४ वाले जयप्रकाश नारायण नहीं हैं. कांग्रेस के पास १९६३-६५ वाले लालबहादुर शास्त्री या फिर १९६९-७१ की इंदिरा गांधी नहीं हैं. समाजवादियों के पास १९६३-६७ वाले लोहिया नहीं हैं. वामपंथियों के पास १९७२-७७ वाले ज्योति बसु, नम्बूदरीपाद, इन्द्रजीत गुप्ता और त्रिदिब चौधरी नहीं हैं. क्षेत्रीय दलों के पास १९७४ -७७ वाले बीजू पटनायक, एन. टी. रामाराव, चौधरी देवीलाल, और गोलप बरबोरा नहीं हैं.
इस तरह हमारे मौजूदा संकट के कई चेहरे हैं.

6. फिर भी क) गहरा आर्थिक गतिरोध, ख) सामाजिक बिखराव, ग) राजनीतिक टकराहटें, घ) चीन से लेकर पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल के साथ सीमाओं की सुरक्षा का संकट, और च) विद्यार्थियों-नौजवानो से लेकर किसानों तक चौतरफा असंतोष इसके पांच बहुचर्चित लक्षण हैं. बैंक और नियोजन व्यवस्था से लेकर सेनासंगठन और शिक्षा और शोध के केंद्रों को अस्त-व्यस्त करने के बाद प्रधानमन्त्री किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए हैं. दिल्ली से लेकर नागपुर और लखनऊ तक बेहतर विकल्प की तलाश की अफवाह का बाज़ार गरम है. गृहमंत्री नागरिकता रजिस्टर और नागरिकता कानून से खिलवाड़ के बाद पस्त हैं. वित्तमंत्री और रेलमंत्री पूंजीपतियों की मान-मनुव्वल में व्यस्त हैं. विदेशमंत्री और रक्षामंत्री एक दूसरे की समझदारी के प्रति आशंकित हैं. कृषिमंत्री और व्यापार मंत्री एक दूसरे की आड़ ले चुके हैं. शिक्षा मंत्रालय में ६ साल में तीन मंत्रियों को लाया-हटाया गया और दिल्ली विश्वविद्यालय समेत केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को ‘राग-दरबारी’ न गाने के कारण अपमानित-लांछित किया जा चुका है.

7. इस संकट से देश में बेचैनी का ज्वार आ गया है. मनचले अरबपतियों के दबाव और राष्ट्रहितकारी दूरदृष्टि के अभाव में केंद्र में सत्ताधारी गठबंधन बिखर रहा है. पहले महाराष्ट्र में शिवसेना छिटकी. फिर पंजाब में अकाली दल हटा. असम का गठबंधन टूट गया है. बिहार का जनता दल (यू) से गठबंधन मरणासन्न है. उत्तराखंड में तो खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के उलझने से मुख्यमंत्री को हटाना पड़ा. लेकिन इससे विकल्प निर्माण की प्रक्रिया को बल नहीं मिल रहा है.

8. कांग्रेस मुख्य और एकमात्र राष्ट्रव्यापी दल होने का बावजूद दिशाहीन है. मां – बेटे और भाई-बहन के बीच की घटती निकटता और बढती दूरी के किस्सों के बीच शिखर-राजनीति के कम से कम २३ दिग्गजों को संदेह के घेरे में मान लिया गया है.मध्यप्रदेश में चुनाव जीतने के बाद भी कांग्रेसजन देखते देखते सरकार से हटाये गए. हरियाणा में अंदरूनी विवाद के कारण पराजय का शिकार हुए और अब पराजित कांग्रेस के भीतर से ही एक क्षेत्रीय दल भी पैदा हो गया है. बंगाल में वामपंथी मोर्चे के साथ गठबंधन किया है और केरल के चुनाव में वामपंथी गठबंधन के खिलाफ गठबंधन बनाकर चुनाव के मैदान में हैं. बाकी दलों ने एकाध परिवारों, एकाध जातियों और भाषाई समुदायों की पूंछ पकड़ने में ही भलाई मान ली है.

9. इधर दुनिया देख रही है कि दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र, सबसे युवा देश, दूसरी सबसे बड़ी मानव संसाधन लैस आर्थिकी और तीसरी बड़ी अर्थ-व्यवस्था और तीसरी बड़ी सेना के दावों के बीच समग्र मानवीय विकास अर्थात स्वास्थ्य-शिक्षा-आजीविका की दृष्टि से १९३ देशों में बाजार-आधारित वैश्वीकरण के तीन दशकों के बाद भी भारत अभी तक १२९ स्थान पर ही पहुँच पाया है. यह बहुचर्चित रहा है कि चीन हमसे ३९ सीढ़ी ऊपर ९० स्थान पर है. लेकिन अब बांग्लादेश भी हमसे आगे निकल गया है.
हमारे सत्ता-प्रतिष्ठान के तुगलकी तौर-तरीकों को देखते हुए दुनिया हमने अब लोकतान्त्रिक देशों की बिरादरी में मानने से इनकार करने लगी है. वैसे भी ‘सूचना क्रान्ति’ के युग में मीडिया की आज़ादी की दृष्टि से हम दुनिया में ११६वा देश हैं. बच्चों की ज़रूरतों को पूरा करने के मामले में हमारा देश ११३ वीं सीढ़ी पर है तभी देश में कम से कम पांच करोड़ बच्चे विद्यालयों में विद्यार्थी होने की बजाय खेतों-कारखानों में श्रमिक बने हुए हैं. स्त्रियों के साथ हिन्सा और भेदभाव के पैमाने पर ११२ वीं सीढ़ी पर हैं. न्यायमूर्ति वर्मा समिति की स्पष्ट सिफारिशों के बावजूद स्त्री- सशक्तिकरण के लिए निर्णयप्रक्रिया में हिस्सेदारी की जरूरत उपेक्षित है. भूख की व्यापकता के पैमाने पर भारत ९४ स्थान पर और भ्रष्टाचार के फैलाव में हम ८०वें स्थान पर पहुँच गए हैं. पर्यावरण वैज्ञानिकों और जन आन्दोलनों की उपेक्षा बढ़ने से जल-जंगल-जमीन-जैव विविधता की सुरक्षा के मोर्चे पर हमारे देश का दुनिया में १६८वा स्थान हो गया है.

10. इसमें कोई बहस की गुंजाइश नहीं है कि देश को तीन दशकों से जारी ‘नयी आर्थिक नीतियों’ की आड़ में वैश्विक वित्तीय पूंजी के स्वामियों की मनमर्जी पर छोड़ने का सिलसिला बढ़ गया है. इसके दुष्परिणामों से परेशान जनसाधारण के आक्रोश से बचने के लिए सांप्रदायिक आधार पर बाँट कर चुनावी शतरंज की चालबाजियों के जरिये वित्तीय पूंजी का राज चलाने का दुस्साहस हो रहा है. हमारा देश १. न्यायपूर्ण नव-निर्माण, २. सुशासन, ३. सहभागी लोकतंत्र, ४. पर्यावरण संवर्धन, ५. बंधुत्व आधारित नागरिकता, ६. लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण और ७. स्वच्छ राजनीतिक व्यवस्था के संविधान-सम्मत लक्ष्यों से भटकाया जा चुका है. देश के नए सत्ताधीशों की मेहरबानी से आज देश में सिवाय लोकतंत्र की अनिवार्यता के किसी सवाल पर कोई राष्ट्रीय सहमति नहीं बची है.

11. फिर भी इस सरकार ने जनहित की दिशा में नीति-सुधार की बजाय पुलिस के बल पर लोकतंत्र का दम घोंटने का दुस्साहस दिखाया है. कई हज़ार किसान भारत की खेती को मनपसंद पूंजीपतियों को सौंपने के कानूनों के खिलाफ देश की राजधानी की सरहदों पर शांतिपूर्ण धरना दे रहे हैं और सरकार पर कोई असर नहीं है. इससे मजबूर होकर किसानों की संयुक्त संघर्ष समिति ने ‘भारतीय जनता पार्टी हराओ !’ का झंडा उठाकर चुनाव अभियान में प्रवेश किया है.
उधर देश के मजदूरों के १० राष्ट्रीय संगठनों द्वारा एक संयुक्त संघर्ष समिति बना ली गयी है. इसकी तरफ से देशी-विदेशी उद्योगपतियों के दबाव में भारत के सार्वजनिक उद्योगों के निजीकरण और श्रमजीवियों के हितों के खिलाफ किये गए कानूनी बदलावों को रोकने के लिए तीन बरस से लोकतांत्रिक तरीके से एकजुट विरोध जारी है. लेकिन केन्द्रीय सरकार रेल और बीमा कंपनी से लेकर हवाई अड्डों और बंदरगाहों को मनपसंद पूंजीपतियों को सौपने और श्रमजीवियों के लोकतांत्रिक अधिकारों को रौंदने पर तुली हुई है. श्रमिक संगठनों से बातचीत करने का श्रममंत्री को अवकाश नहीं मिला है.
देश के कालेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा के व्यावसायीकरण, शिक्षित बेरोजगारी और विश्वविद्यालयों में सरकारी पार्टी के खुले हस्तक्षेप के खिलाफ विद्यार्थियों और शिक्षकों में गहरा रोष है. फिर भी शिक्षकेंद्रों की स्वायत्तता को रौंदना जारी है. देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों को पुलिस के निशाने पर ले लिया गया है.
हमारी सरकार विरोध को देशद्रोह करार देते हुए चौतरफा पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बेसिर-पैर के आरोपों में गिरफ्तार कर रही है. २१ बरस की पर्यावरण रक्षिका दिशा रवि से लेकर ८२ बरस के वयोवृद्ध कवि वारवरा राव तक को गिरफ्तार करना हर स्वतंत्रताप्रेमी के लिए चिंता का विषय बना.

12. लेकिन इस संकट में भी सबको नुक्सान नहीं हो रहा है. केन्द्रीय सरकार के संरक्षण में फल-फूल रहे नवोदित अडाणी समूह की कुल संपत्ति में मात्र २०२०-२१ में १६ अरब से अधिक की बढ़ोतरी हुई है. दूसरे चहेते अरबपति मुकेश अम्बानी ने भी अपनी सम्पदा में इसी एक बरस में आठ अरब की बढ़ोतरी कर ली है. अडाणी टोटल गैस लिमिटेड में ९६%, अडाणी एन्तेर्प्राइजेज में ९०%, अडाणी ट्रांसमिशन लिमिटेड में ७९ प्रतिशत और अडाणी पावर लिमिटेड तथा अडाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनोमिक जोंस लिमिटेड में ५२ प्रतिशत की बढ़ोतरी का समाचार है. अडाणी ग्रीन एनेर्जी लिमिटेड विगत वर्ष ५०० प्रतिशत बढ़ी थी. अब अडाणी समूह को कृषि उत्पादन और अन्न व्यापार में कब्ज़ा दिलाने के लिए केन्द्रीय सरकार खुले आम तीन नए कानून बना चुकी है.  राजनीतिक स्तर पर भारतीय जनता पार्टी का साम-दाम-दंड-भेद के जरिये वर्चस्व बनाया जा रहा है. दल-बदल, खरीद-बिक्री, और जांच संस्थाओं का दुरुपयोग इसके तीन बड़े अस्त्र हैं. इस दुष्कर्म में इसने अपने पूर्ववर्ती शासक दल को बहुत पीछे छोड़ दिया है.

13. देशों के घटनाक्रम में संकटों का उत्पन्न होना एक अनहोनी नहीं कही जा सकती. लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की यह जिम्मेदारी होती है कि इन संकेतों को स्वीकारते हुए समस्या-समाधान के लिए संविधान सम्मत उपाय करे. आज अफ़सोस की बात है कि हमारे सत्ता-प्रतिष्ठान ने समाधान के उपायों की ओर ध्यान देने की बजाय देश की गंभीर चुनौतियों के लिए मूलत: अबतक के सत्तर सालों की सरकारों, विशेषकर श्री जवाहरलाल नेहरु की नीतियों को जिम्मेदार बताने तक ही अपनी भूमिका रखी है.

14. यह हास्यास्पद बचाव है. हम इस सच का क्या करें कि श्री नेहरु सत्तर साल की बजाय कुल १२ बरस तक वास्तव में सत्ता-सूत्रधार थे. क्योंकि १९४७ -१९५१ की शुरू की चार बरस की संक्रमण-अवधि में डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे विपरीत नीतियों वाले लोग भी उनके साथ सत्ता-संचालन में साझेदार थे. इसके समांतर यदि श्री अटलबिहारी वाजपेयी (१९९९-२००४) और श्री नरेंद्र मोदी (२०१४ – २०२१ (२०२४) का शासनकाल जोड़ा जाए तो इनकी ११ बरस की सत्ता-संचालन अवधि नेहरु-सरकार की १२ बरस की वास्तविक अवधि के निकट पहुँच जाता है.

15. इसीलिये मुख्य प्रश्नों के न सुलझने पर इधर एक बरस से फ़ैल रहे कोरोना महामारी और उससे जुडी अफरा-तफरी (‘लाक-डाउन’) को दोषी ठहराया जाता है. इसके जवाब में यह कैसे भुला दिया जाये कि कोरोना के संकट के पहले २०१८-१९ से ही भारत की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी थी.

16. फिर भी नेहरु की गलत नीतियों और कोरोना के दुष्प्रभाव – दोनों ही कारणों की भूमिका को इन्कारे बिना बावजूद जादातर लोगों का यह मानना है कि देश की वर्तमान समस्याओं के मूल में मौजूदा सरकार के तीन महादोष हैं – सत्ताधीशों द्वारा अपने चहेते मुट्ठीभर अरबपतियों की हितरक्षा की अर्थनीति (‘क्रोनी कैपिटलिज्म’), बहुमतवाद की राजनीति (‘मेजोरितेरियनिज्म’) और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की समाजनीति का गंठजोड़ है. इस गंठजोड़ ने लोकतंत्र के सभी छ: आधार स्तंभों को (अर्थात् १. विधायिका, २. कार्यपालिका, ३. न्यायपालिका, ४. मीडिया, ५. राजनीतिक दल व्यवस्था, और ६. नागरिक समाज ) कमजोर कर दिया है.

17. देश की संसद या विधान्मंदलों में होने वाले संवाद का कोई असर नहीं दीखता. विधायिका हाशिये पर धकेल दी गयी है. वैसे भी चुनाव प्रणाली की पवित्रता से भरोसा उठ चुका है. पहले से ही धनशक्ति, मीडिया और अपराधियों की बढती भूमिका की समस्या थी. इधर इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन का विवाद जुड़ गया है. चुनाव नतीजों से अलग गैर-सरकारी दलों के विधायकों की खुली खरीद की जा रही है.

18. कार्यपालिका में प्रधानमन्त्री कार्यालय सर्वेसर्वा बन चुका है. इससे जानकार लोग वर्तमान मोदी-शाह सरकार की आपातकाल की इन्दिरा-संजय सरकार से करने लगे हैं. आलोचकों की मनमानी गिरफ्तारी के दौर में कोई दूसरा दौर कैसे याद आएगा?

19. ‘ पूर्व न्यायमूर्ति/ नव मनोनीत सांसद रंजन गोगई प्रसंग’ और ‘प्रशान्त भूषण प्रसंग’ ने दुनिया भर में भारत की न्यायपालिका की बढती गिरावट को चर्चा का विषय बना दिया है. अब हमारी न्यायपालिका की अस्वस्थता कोई ‘राष्ट्रीय रहस्य’ नहीं है. सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीशों से लेकर सरोकारी वकीलों तक एक स्वर से बीमार बना दी गयी न्याय-व्यवस्था के सुधार के लिए जन-जागरण में जुटने को विवश हो गए हैं. बीमार न्यायपालिका समाज को स्वस्थ कैसे बना पायेगी? कानून का राज ख़तम होने पर असामाजिक तत्वों और भीड़ का दबदबा बढ़ना कौन रोकेगा?

20. मीडिया के क्षेत्र में मनपसंद पूंजीपतियों ने एकाधिकार बना लिया है. जादातर टी. वी. पत्रकार सत्ताप्रतिष्ठान की बुलबुल बन गए है. इसका असर अखबारों और सोशल मीडिया पर भयानक हो गया है. राजा का बाजा बनने की होड़ में समाज में विदेशी मिडिया, अर्ध-सत्य और अफवाहों का महत्त्व बढ गया है. मीडिया में सरकार की लगाम थामे कुछ पूंजीपतियों के निर्बाध वर्चस्व से देश में नीतियों के बारे में बहस बंद हो गयी है. लोकशिक्षण और असहमति के लिए मीडिया में स्थान के अभाव से लोकतंत्र की बुनियाद हिल गयी है.

21. राजनीतिक दल समूह संसदवाद की विवशताओं के कारण काले धन और वोट-बैंक के बीच आतंरिक जनतंत्र से अलग हो चुके हैं. फिर व्यक्तिपूजा का अविश्वनीय सिलसिला बन चुका है. विचारों का अवमूल्यन ही सत्ता की सीढ़ी बन गया है. इसलिए गैर-सरकारी दलों की अलग छबि नहीं दीखती. भरोसा नहीं बन पाता. नाग-नाथ और सांप नाथ के बीच क्या अंतर हो सकता है?

22. भारत समेत हर लोकतान्त्रिक देश में नागरिक समाज दलों के दायरे से अलग एक महत्वपूर्ण लेकिन अपरिभाषित और गतिशील पक्ष होता है. लेकिन यह दलों से असंबद्धता के बावजूद ‘अ-राजनीतिक’ नहीं होता. संविधान की रक्षा, राष्ट्रीय हितों की निगरानी, संस्थाओं की निर्मलता और राज्यसत्ता और लोकसत्ता के बीच संवाद इसकी राजनीतिक जिम्मेदारी की सूची में शामिल रहते हैं.  हमारे देश में १९७४ के सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन के बाद से इसका महत्त्व भी बढ़ता गया है. आज केन्द्रीय सरकार ने संवाद की बजाय विवाद और समस्या समाधान की बजाय प्रतिरोधियों के दमन का रास्ता अपना कर सभी विरोधी दलों को आत्मरक्षा के लिये विवश कर रखा है इसलिए दलों की निकटता के लिए भी नागरिक समाज की भूमिका की प्रासंगिकता बढ़ी है. हमारे लोकतंत्र के बाकी पांच स्तंभों की सुरक्षा भी इसीके हिस्से आ गयी है.
इसलिए विविध संवादों की जरूरत है. इससे नयी राष्ट्रीय सहमति की जरूरत पूरी होगी. विभिन्न अभियानों और आंदोलनों का संगम होगा. बिना नयी राष्ट्रीय सहमति के दवाई-कमाई-पढाई-सफाई-रिहाई के पंचमुखी नव-निर्माण की जरूरत पर कौन ध्यान देगा? इस दिशा में देश के नीति-निर्माताओं को गाँव-सभा से लोकसभा तक प्रेरित कौन करेगा? नए वाहकों और नए वाहनों का संयोजन और संरक्षण कौन करेगा? वित्ते पूंजी और साम्प्रदायिक शक्तियों के गंठजोड़ से आक्रांत देश के १३० करोड़ स्त्री-पुरुषों का; किसानों- श्रमजीवियों- व्यवसायियों- उद्योगपतियों; बच्चों-युवजनों-गृहस्थों-बुजुर्गों का संकटमोचन कौन बनेगा?

(लेखक प्रसिद्ध समाजशास्त्री, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रह चुके हैं. ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं)

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