विजय दलाल
*ईवीएम के दुरूपयोग से चुनावी राजनीति से विधानसभा और लोकसभा में वामदलों को बेदखल कर देश की राजनीति में प्रभावहीन करने के साफ संकेत!*
उपचुनाव के नतीजों के विश्लेषण से साफ जाहिर होता है जबकि सारे नतीजों का रुख भाजपा विरोधी है उत्तर प्रदेश के घोसी में सपा का सीट बरकरार रखना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि भाजपा के 10 % वोटों की कमी । बंगाल में टीएमसी ने भाजपा से धूपगुड़ी सीट छीन ली।
उत्तर पूर्व में मणिपुर आग में सुलग ही नहीं रहा है जनता ने बीजेपी विधायकों और सांसदों का जीना हराम कर रखा है।
ऐसे हालात में त्रिपुरा में भाजपा अपनी एक सीट बरकरार रखले और वामदल से एक सीट छीन ले। यह किसी भी हालत में समझ से बाहर है। ईवीएम से जीत की पुष्टि इस बात से भी होती है कि भाजपा के मुख्य निशाने पर केवल वामदल ही है चुनाव के नतीजों के बाद बाकी कुछ भी नहीं कहा केवल यही कहा कि *” त्रिपुरा में वामदल का अंत हुआ।”*
*असल में एक देश – एक चुनाव* के बहुउद्देशीय एजेंडा का एक काम ईवीएम का दुरूपयोग एक बार में एक साथ करने के प्रबंधन में भी आसानी रहती है। ताकि एक ही मशीन से विधानसभा और लोकसभा दोनों का काम एक साथ हो जाए।
तीन राज्य केरल, त्रिपुरा और बंगाल में वामपंथ का सफाया करना मुख्य लक्ष्य है।
केरल और बंगाल में जहां बीजेपी मैदान में कहीं नहीं है केरल में कांग्रेस को और बंगाल में टीएमसी को जिताएंगी। वामपंथी वोटों का प्रतिशत कम करने के लिए ईवीएम से केरल में कांग्रेस को वोट और बंगाल में बीजेपी खुद को वोट ट्रांसफर करेगी। बंगाल विधानसभा चुनाव और उसके बाद पंचायत चुनाव में पड़े वोट के प्रतिशत इस बात का इशारा करते हैं।
ये उपचुनावों का ट्रेंड जिसकी रिपोर्ट बीजेपी को पहले से मिल रही होगी।
यह रणनीति बनाना होगी ही कि यदि उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो वह ईवीएम के माध्यम से INDIA के भी उन दलों को जिताएं जिनका साथ लेकर बाद में वो सरकार बना सके। जब बीजेपी ईवीएम का उपयोग केवल अपनी जीत और अपना ही वोट बढ़ाने के लिए उपयोग नहीं करेगी और सत्ता हासिल कर लेगी तो फिर जनता और शंकित लोगों व दलों के सामने फिर स्थापित करने में कामयाब हो जाएगी कि ईवीएम का दुरूपयोग नहीं हुआ।
अब भी इस तरह की बातों और ईवीएम के दुरूपयोग से बचना हो तो चुनाव आयोग से तो कोई उम्मीद की ही नहीं जा सकती।
इस समय तो ईवीएम के दुरूपयोग से केवल सुप्रीम कोर्ट ही बचा सकता है वो भी वीवीपीएटी पर्ची की 100 % समानांतर गणना के पक्ष में फैसला देकर। जो चीफ़ जस्टिस चंद्रचूड़ के रहते ही संभव हो सकता है।





