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*सांप्रदायिकता और सियासत*

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             ~ सुधा सिंह 

     सांप्रदायिकता (communalism) एक ख़ास विचारधारा है जो यह मानती है कि भारतीय समाज धार्मिक समुदायों के बीच बँटा हुआ समाज है जिनके आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक हित अलग और परस्पर विरोधी भी हैं। यह विचारधारा राजनीति , अर्थनीति व समाज को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखती समझती हैं और इसके इर्द गिर्द ही अपनी राजनीति का संगठन करती हैं।

      सांप्रदायिक राजनीति इतिहास और संस्कृति की व्याख्या धार्मिक समुदायों के टकराव के रूप में पेश करती है ।

सांप्रदायिक विचारधारा की धुरी पर सांप्रदायिक राजनैतिक पार्टी गठित व संचालित होती है। उसकी एकमात्र प्रतिबद्धता समाज और राज्य का संप्रदायीकरण होता है और इसलिए वह किसी ख़ास सामाजिक आर्थिक नीति या कार्यक्रम के साथ प्रतिबद्ध नहीं रहती।

     वह राजनैतिक ज़रूरत के लिए अपनी  सामाजिक आर्थिक नीतियाँ व कार्यक्रम कभी भी बदल सकती है और ठीक विरोधी नीति या कार्यक्रम भी अपना सकती है।

ज़रूरी नहीं है कि सांप्रदायिक पार्टी रूढ़िवादी हो क्यों कि आर्थिक सामाजिक ढाँचे के महत्वपूर्ण अवययों को बचाना उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता का अंग नहीं रहता। मगर अमूमन सांप्रदायिक पार्टी दक्षिणपंथी होती है क्यों कि अर्थ व्यवस्था की शोषक  शक्तियों को ताक़त दिए बग़ैर वह समाज और राज्य का संप्रदायीकरण नहीं कर सकती।

      मुस्लिम लीग ,जनसंघ /भाजपा , शिवसेना , हिन्दू महा सभा , अकालीदल आजाद भारत की मुख्य सांप्रदायिक पार्टियाँ हैं। ग़ैर सांप्रदायिक पार्टियाँ ,जो धर्मनिरपेक्षता का दावा करती हैं , भी अकसर अल्पकालीन राजनैतिक फ़ायदे के लिए सांप्रदायिक तत्वों  के साथ समझौता करती हैं या राजनीति में धर्म के उपयोग की इजाज़त देती हैं।

      सबसे पहले कांगरेस ने पिछली सदी के छठवीं दहाई में केरल में मुस्लिम लीग से चुनावी समझौता किया। उनके बाद छठवें दशक में ही कम्युनिस्ट पार्टियों ने केरल में मुस्लिम लीग के साथ और पंजाब में अकाली दल के साथ समझौता किया।

     कांगरेस और कम्युनिस्टों ने अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता को बहुसंख्यक सांप्रदायिकता से कम नुक़सानदेह माना। समाजवादियों ने छठवें दशक में ,जेपी ने सातवें दशक में और वीपी सिंह  ने आठवें दशक के उत्तरार्ध में ग़ैर कॉंग्रेसवाद के तहत बहुसंख्यक सांप्रदायिक पार्टी जनसंघ /भाजपा से समझौते किए।

सियासी फ़ायदे के लिए कभी कभी धरिमनिरपेक्षता का ढिंढोरा पीटने वाले राजनेता और उनकी पार्टियाँ भी धार्मिक भावनाओं को संतुष्ट करती हैं ।राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में मुस्लिम सांप्रदायिक ताक़तों के आगे समर्पण तथा बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर हिन्दू सांप्रदायिक भावनाओं का तुष्टीकरण किया था।

     वी पी सिंह ने लाल क़िले की दीवार से इसलाम के पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिन पर छुट्टी का ऐलान करके मुस्लिम सांप्रदायिक भावनाओं को उभारने की कोशिश की थी।

     ग़ैर सांप्रदायिक पार्टियों द्वारा धार्मिक भावनाओं के तुष्टीकरण ,राजनैतिक प्रकृया में धर्म की यत्किंचित मिलावट और सांप्रदायिक पार्टियों के साथ राजनैतिक समझौतों के बावजूद उनमें और सांप्रदायिक पार्टियों के बीच गहरा अन्तर है जिसे रेखांकित करना ज़रूरी है।

      सांप्रदायिक पार्टी का ढाँचा ही सांप्रदायिक विचारधारा की बुनियाद पर खड़ा होता है और वे अपनी पैदाइश के समय से ही लगातार सांप्रदायिक विभाजन की लहर पैदा करती हैं जबकि ग़ैर सांप्रदायिक पार्टियाँ और उनके नेता खुद सांप्रदायिक नहीं होते ,न ही सांप्रदायिक विचारधारा से उनका कोई लेना देना होता है ;वे सिर्फ राजनैतिक फ़ायदे के लिए सांप्रदायिकता का सहारा लेने की गुनहगार होती हैं।

Ramswaroop Mantri

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