ज्योतिषाचार्य पवन कुमार (वाराणसी)
_भौतिकवाद (materialism )को समझने के लिए भूत (matter )को समझना ज़रूरी है । जो कुछ इन्द्रिय गोचर अर्थात् मनुष्य के शरीर में स्थित इंद्रियाँ देख ,सुन व जान सकती हैं , वह सब भूत (भौतिक तत्व या matter )है ।यहाँ इन्द्रियों से तात्पर्य सिर्फ मनुष्य की जन्म जात् इन्द्रियों से ही नहीं ,अपितु उसके द्वारा आविष्कृत मशीनों यथा सूक्ष्मवीक्षण (microscope ), दूरवीक्षण (telescope ), ध्वनि विस्तारक (loud speaker )आदि से भी है जिनके द्वारा मनुष्य की इन्द्रियों की शक्ति करोड़ करोड़ गुना तक बढ़ जाती है।_
भूत का कुछ न कुछ आयतन (volume ) परिमाण (mass )और दबाव (pressure )ज़रूर होता है ।बाह्य जगत का ज्ञान परिमाण के गुण (रूप -रस -गंध ) में परिवर्तन, जो मस्तिष्क में घटित होता है ,के माध्यम से होता है।
गुण (quality ) का परिमाण (quantity ) में और परिमाण का गुण में परिवर्तन प्रकृति का आन्तरिक स्वभाव है।
भूत (matter )का एकमात्र गुण यह है कि वह हमारे प्रत्यक्षीकरण से बाहर अपनी सत्ता को इंद्रिय गोचर वास्तविकता के रूप में रखता है।
दार्शनिक भाषा में भूत वह साकार वास्तविकता है जिसका ज्ञान मनुष्य को उसकी इंद्रियों द्वारा मिलता है । यह ऐसी वास्तविकता है जिसकी तस्वीर बनाई जा सकती है और जो इंद्रियों के माध्यम से मस्तिष्क में प्रतिबिम्बित होती है , किन्तु इसकी सत्ता उस इंद्रिय – मस्तिष्क संपर्क से उत्पन्न होने वाली संवेदना पर निर्भर नहीं है।
यहाँ साकार उस निराकार के विपरीत अर्थ में है जिसका अस्तित्व बाह्य जगत में कहीं नहीं मिलता और जो सिर्फ़ मस्तिष्क की कल्पना मात्र है। भौतिक वाद (materialism ) वह दार्शनिक वाद है जो कि कल्पना , विचार , ज्ञान को मानव चेतना पर एक ऐसे वास्तविक भौतिक जगत का प्रतिबिम्ब मानता है जिसकी सत्ता हमारी चेतना या इच्छा से बिलकुल स्वतंत्र है।
एंगेल्स के शब्दों में जो चेतन को नहीं अपितु प्रकृति को सारे जड -चेतन जगत का मूल मानता है ,ऐसे वाद को भौतिक वाद कहते हैं।
(चेतना विकास मिशन)





