अग्नि आलोक
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Confidence मतलब आत्मविश्वास

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शशिकांत गुप्ते

निम्न पंक्तियां प्रख्यार साहित्यकार स्व. जयशंकर प्रसादजी द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी की हैं।
वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या,
जिस पथ पर बिखरे शूल न हों,
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या,
जब धाराएं प्रतिकूल न हों!

चिंतक और विचारकों ने कहा है, धारा के विपरीत चलने वाला ही साहसी होता है। धारा के साथ तो तिनका भी बह जाता है।
जयशंकर प्रसादजी ने उक्त पँक्तियों में आत्मबल को सशक्त बनाने के लिए,प्रेरणादायक उपदेश दिया है।
सच में जीवन की यात्रा का पथ अग्निपथ ही होना चाहिए। यहाँ पर अग्निपथ से तात्पर्य किसी अल्प कालीन रोजगार योजना से नहीं है। जो युवावस्था में ही देश भाविकर्णधारों को सेवा से निवृत कर साठ से बासठ वर्ष की आयु पूर्ण होने के एहसास करवा दे?
यहाँ अग्नि शब्द का अर्थ वैचारिक आग के से है। वैचारिक आग जनमानस को अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए ना सिर्फ प्रेरित करती है,बल्कि अन्याय के विरुद्ध आंदोलित करती है।
यह शब्दों की अग्नि जन के मानस में प्रज्ज्वलित होनी ही चाहिए।
ये वही आग है, जो स्वतंत्रता संग्राम के सैनानियों के अंतर्मन में जागी थी। इसी वैचारिक आग से उद्वेलित होकर शहीद-ए-आज़म भगतसिंह ने फिरंगियों को डराने के लिए सभागृह में बम का धमाका किया था। यह धमाका अहिंसक आंदोलन का महत्वपूर्ण सबूत है। आज अहिंसक आंदोलन पर व्यापक बहस अनिवार्य हो गई है।
हिंसा से तात्पर्य सिर्फ हिंसक क्रूर कृत्य से नहीं है। हिंसा को उकसाने के लिए वैमनस्य भरे शब्दों को निर्भीक होकर सार्वजनिक रूप से प्रकट करना भी हिंसा ही है।
गांधीजी ने सत्य और अहिंसा की वैचारिक शाब्दिक अग्नि देश के आमजन में जगाई।
ये सभी स्वतंत्रता सैनानी वैचारिक अग्नि के पथ पर ही अग्रसर होकर चलते रहें हैं।
विचारों की अग्नि जनमानस में सिर्फ तपन ही पैदा नहीं करती है,बल्कि क्रांति का लावा पैदा करती है। यह लावा ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे जैसा नहीं होता है,जो प्राणियों के साथ प्रकृति को भी नष्ठ कर सकता है।यह लावा वैचारिक लावा होता है। इस वैचारिक लावें में शब्द ही ब्रह्म है यह सिद्ध हो जाता है।
ये शब्द-ब्रह्म ही जन मानस के अंतर्मन से भ्रम के प्रदूषण को धो डालते हैं।
जयशंकर प्रसादजी रचित कामायनी महाकाव्य की उक्त पँक्तियों में प्रतीक के रूप जिन शूलों का प्रयोग किया है।
(हमने तो नुकीले शूल किसान आंदोलन के समय प्रत्यक्ष देखें हैं।
यह नुकीले शूल, कृषिप्रधान देश में कृषक जब अपने हक़ के लिए आंदोलन कर रहे थे तब सड़क पर गाड़े गए थे।)
आज शाब्दिक शूलों का सार्वजनिक तौर पर बेख़ौफ़ होकर उच्चारण किया जा रहा है। बेख़ौफ़ होने का कांरण है,संया भए कोतवाल तो डर काहे का।
इसीलिए जयशंकर प्रसादजी रचित उक्त पँक्तियों को आत्मसात
करना जरूरी है।
इसी संदर्भ में शायरों ने भी अपने शेर में प्रेरक संदेश दिया है।
अभी से पाँव के छाले न देखो
अभी यारो सफ़र की इब्तिदा है

शायर एजाज़ रहमानी

यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है
हवा की ओट भी ले कर चराग़ जलता है

शायर मंज़ूर हाशमी
अंत में स्वतंत्रता के अमृतवर्ष की सभी शुभकामनाएं।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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