प्रदीप द्विवेदी.
पंजाब कांग्रेस में कुछ ही दिनों में कई बड़े बदलाव हो गए हैं और कथित नेशनल मीडिया इसे कांग्रेस की बड़ी सियासी परेशानी मानकर कांग्रेस नेतृत्व पर निशाना साध रहा है?
लेकिन, यदि ऐसा बीजेपी के साथ होता, तो यह मास्टर स्ट्रोक कहलाता, क्यों?
एक- पंजाब कांग्रेस में सीएम पद के दावेदार दो बड़े नेता थे…. कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू, जिनके दबाव में था कांग्रेस नेतृत्व!
दो- सिद्धू ने कैप्टन के खिलाफ अभियान चलाया और अंततः कैप्टन को सीएम पद छोड़ना पड़ा, पहला दावेदार बाहर?
तीन- कैप्टन ने कहा कि सिद्धू को सीएम नहीं बनने दंूगा, सिद्धू सियासी जंग जीत कर भी हार गए और सियासी समीकरण में तीसरे नेता की एंट्री हुई- चरणजीत सिंह चन्नी सीएम बने?
चार– शायद सिद्धू सीएम चन्नी को सियासी क्रिकेट का नाइट वॉचमैन मान रहे थे? लेकिन, जल्दी ही उन्हे समझ में आ गया कि जैसा वे समझ रहे थे, हालात वैसे नहीं हैं?
पांच- न तो सिद्धू सुपर सीएम बन पाए और न भविष्य में सीएम बनने का कोई चांस है?
छह- पंजाब में कांग्रेस को कैप्टन और सिद्धू, दोनों के सियासी दबाव से मुक्ति मिल गई और पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री के तौर पर चरणजीत सिंह चन्नी नया असरदार चेहरा बनकर उभरे हैं, जिनके सीएम होने का पॉलिटिकल मैसेज यूपी के चुनाव में भी असर दिखाएगा, तो पंजाब में अकाली-बसपा गठबंधन को भी तगड़ा झटका देगा?
सात- यदि ऐसी सियासी उठा-पटक एक-दो माह पहले होती, तो कांग्रेस को तगड़ा राजनीतिक झटका लगता, परन्तु अब तो कैप्टन और सिद्धू, दोनो नेता पॉलिटिकली एक्सपोज हो चुके हैं?
आठ- कैप्टेन के अमित शाह से मिलने के बाद कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं से मिलने की भी खबरें हैं, लेकिन इससे क्या हासिल होगा?
नौ- कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं में से कोई नेता ऐसा नहीं है जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर पकड़ और पहचान हो और अपने दम पर चुनाव जीत सके?
दस- बहरहाल, पंजाब में आगे क्या होगा? इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि आजकल राजनीति कॉलेज इलैक्शन जैसी हो गई है, कब क्या समीकरण बन जाएं? और…. क्या नतीजे आएंगे? कोई नहीं जानता!
वैसे इस सियासी उठा-पटक से सबसे ज्यादा खुश मोदी टीम है, क्योंकि पंजाब में इस वक्त उसके लिए न पाने को कुछ है और न खोने के लिए कुछ है, बस! एक ही तसल्ली है कि पंजाब कांग्रेस में सियासी हंगामा जोरों पर है?
सियासी सयानों का मानना है कि कांग्रेस में जो कुछ हो रहा है, वह तो सबके सामने है, लेकिन बीजेपी के राज्यों- गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक आदि में अंदर-ही-अंदर जो असंतोष पनप रहा है, उसका नतीजा तो विधानसभा चुनावों के बाद ही नजर आएगा!





