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सचेतनता और सजगता लुप्त…?

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शशिकांत गुप्ते

बनारस एहतिहासिक और धार्मिक नगरी है।बनारस में बारह ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ भी एक ज्योतिर्लिंग है।
बिस्मिल्ला खाँ साहब के शहनाई की गूंज विश्व प्रसिद्ध है।
महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद्र जी की जन्मभूमि है।बनारस, बहुत से ख्यात नाम साहित्यकारों की भी जन्म भूमि भी है।
इसी बनारस में संत कबीरसाहब भी प्रकट हुए हैं।नीरू और नीमा दम्पत्ति ने कबीरसाहब का पालनपोषण किया।इसी बनारस में कबीरसाहब के समकालीन संत रविदास (मौची समाच के)भी जन्मे है।
संत कबीरसाहब जहाँ रहतें थे। वह स्थान कबीरमठ के नाम से प्रसिद्ध है।
सौभाग्य से लेखक का ससुराल भी बनारस ही है।
कबीरमठ में प्रवेश करतें ही दीवार पर दोहा लिखा है।
कबीरा तेरी झोपडी,गल कटीयन के पास।
जैसी करनी वैसे भरनी , तू क्यों भया उदास।।
कबीरसाहब के निवास के पड़ोस में बूचड़खाना था।
संत कबीरसाहब यथास्तितिवाद का विरोध करते थे।निर्भीकता से अपनी बात कहतें थे।सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध बेबाक होकर बोलते थे।कबीरसाहब इस तरह के दोहे कहने का साहस रखतें थें।
कांकर पाथर जोरि के ,मस्जिद लई चुनाय।
ता उपर मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।।
कबीरसाहब ने यह भी कहा है।
पाथर पूजे हरि मिले,मैं तो पूजूं पहार
याते चाकी भली जो पीस खाय संसार।।
भक्ति के महत्व को स्पष्टता से समझाने के लिए कबीरसाहब ने कहा है,
राम राम सब कोई कहे,ठग,ठाकुर और चोर
जिस राम से ध्रुव प्रह्लाद और मीरा तरे, वह राम कोई और
वर्तमान राजनैतिक,सामाजिक, और सांस्कृतिक माहौल को देखतें हुए,कबीरसाहब के कथन को प्रणाम करना चाहिए।
कबीरसाहब में लगभग सातसौ वर्ष पूर्व यह कहने का साहस था।
वर्तमान स्थिति में संवैधानिक मूलभूत अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी अप्रत्यक्ष अंकुश है।
इक्कसवीं सदी पहुँचने के बाद भी हमारा दृष्टिकोण व्यापक होने के बजाय संकीर्ण होता जा रहा है।
लोग बिना उपलब्धि के अभिमान को अंगीकृत कर रहें है।
किसी शायर ने क्या खूब कहा है।
गुरूर होने की तो छोड़िए,लोग गुफ्तगू से कतराने लगे हैं
गुरूर ओठे हैं रिश्तें,अपनी हैसियत पर इतराने लगें हैं
आज उक्त उदगार प्रकट करना भी बहुत जोखिम का काम है।
वर्तमान समय के लिए महान कवि रामधारीसिंह दिनकर रचित निम्न पंक्तिय प्रासंगिक हैं।
मूल जानना कठिन है,नदियों का वीरों का
धनुष्य छोड़कर और गौत्र क्या है रणधीरों का
पाते सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर
जाति जाति का शोर मचाते केवल कायर क्रूर

उपर्युक्त दोहे कबीरसाहब के हैं।जो शेर लिखा है,वह किसी शायर का है।कविता की पंक्तियां दिनकरजी है।
लेखक के द्वारा यह स्पष्टिकरण पूर्ण होश हवास में दिया जारहा है।मतलब सचेतनता और सजगता में दिया है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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