राकेश श्रीवास्तव
विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का 73वां गणतंत्र दिवस मनाते हुए नागरिक के रूप में हम गौरवान्वित हैं। आज नैतिकता का यह तकाजा है हमारा देश जो प्रगति के मार्ग पर अनेक कीर्तिमान स्थापित कर चुका है थोड़ी दरियादिली दिखा कर उसके लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने का प्रयास करे। 26 जनवरी 1950 को हमने अपने देश के लिए सर्वश्रेष्ठ की प्रार्थना की और उसके लिए नीति,नियत और नियम निर्धारित किए। उद्देश्य था एक लोकतांत्रिक,संप्रभु तथा गणतंत्र देश मे सभी नागरिकों के उत्थान और प्रगति के लिए समतामूलक समाज की स्थापना।भारतीय संविधान के प्रस्तावना के अनुसार भारत एक सम्प्रुभतासम्पन्न, समाजवादी,पंथनिरपेक्ष,लोकतांत्रिक, गणराज्य है।
13 दिसम्बर 1946 को जवाहर लाल नेहरू द्वारा सविंधान सभा में प्रस्तुत की गयी प्रस्तावना कहतीं है “हम भारत के लोग,भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी,पंथनिरपेक्ष,लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक न्याय,विचार,अभिव्यक्ति, विश्वास,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथासबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिएदृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वाराइस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”(42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा भारतीय संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद, पंथनिरपेक्ष व अखण्डता शब्द जोड़े गए।)
संविधान के नाम की जितनी कसमें खायी जाती हैं या वादे किए जाते हैं, उनके शतांश का भी पालन यदि उत्तरदायी लोग करने लगें तो शायद समाज इतनी बदहाली मे न हो।आज आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष मे हमे अपने आत्मावलोकन की आवश्यकता है कि हम शिक्षित सुविधाभोगी लोग अपने अधिकारों के लिए कितना जागरुक है और लामबंद हो जाते हैं, वहीं संविधान के समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने की बात आती है तो नियम,नीति, नियति और नैतिकता के पाठ याद दिलाने लगते हैं।उनको मुफ्तखोर,कामचोर कहते हमारी जबान थकती नहीं।
प्रस्तावना की प्रारम्भ मे ही अंकित है “हम भारत के लोग” अर्थात भारत का प्रत्येक व्यक्ति।सदैव स्मरण योग्य है स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण का अंश “मुझे आप से कहने मे गर्व है कि मै ऐसे धर्म का अनुयायी हूं जिसकी पवित्र भाषा संस्कृत मे exclusion शब्द अननुवादध है।” याद करिए गांधी कहते हैं कि यदि किसी कार्य को लेकर कोई दुविधा है तो उसे समाज के अंतिम आदमी के हित की कसौटी पर परखना होगा। क्या हम वास्तव मे समाज के प्रति अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वाह कर पा रहे हैं।
संविधान की प्रस्तावना मे भारत के” समस्त नागरिकों को :सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक न्याय” की समता दिलाने की बात अमिट स्याही से लिखी गई है।पर लगता है कि इस स्याही की रोशनी हुक्मरानों के लिए धुंधली हो गई है।क्या हम ईमानदारी से कह सकते हैं कि “अवसर की समता प्राप्त करने के लिए” व्यवस्था बन सकी है।निकट भविष्य में इसकी कोई उम्मीद भी नहीं दिखती है।शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए उपलब्ध अवसर मे असमानता बढती ही जा रही है।गरीबी और अमीरी की खाई भी बढ़ती ही जा रही है।न्याय के लिए किसको कितना भटकना पड़ता है किसी से छिपा नही है। वयहां तक कि हत्या और बलात्कार के मामले की शिकायत के लिए भी सिफारिश की जरूरत पड़ती है।न्यायपालिका तक आरोपों के घेरे मे रहती है।रेलवे पर निजीकरण के साये को देख कर लगता है कि अब तो सबके लिए सरकारी परिवहन सुविधाएं भी उपलब्ध नही होंगी।रोजगार के अवसर की बात तो जितनी कम की जाय, बेहतर होगा।
अब अपने काम की जिम्मेदारी लेने का समय नहीं है। लाल बहादुर शास्त्री इस्तीफा देकर केवल किताबों मे दर्ज हो गये।उनसे कोई प्रेरणा नही लेता है।अब त्यागपत्र देने को कमजोरी समझा जाता है और दबंगई को आभूषण।नैतिकता की बात को तो आऊट आफ डेट हो चुकी है।जिनको कार्यवाही करनी चाहिए उन्होंने आंखे फेर ली हैं।
संवैधानिक विशेषज्ञों को बहस करने दीजिए। उससे हमारी नियति नही बदलने वाली है।अब समय आ गया है कि संवैधानिक जिम्मेदारी और अधिकारों को मोटी मोटी किताबों से बाहर लाकर सरल भाषा मे बात की जाय। रोजमर्रा की जिंदगी के मामलों पर अपने संविधान की ओर देखा जाए। उसको पूजने के साथ ही उसे अलमारियों से निकाल कर छोटी छोटी बातों पर भी संविधान के संदर्भ मे बात की जाय। संविधान को समाज से जोड़ा जाय। जय हिंद, जय भारत





