टी एंड सीपी, नगर निगम पालिकाएं, राजस्व निरीक्षक ,पटवारी, तहसीलदार, एडीएम, एसडीएम, कलेक्टर, कमिश्नर, शहरीय विकास प्राधिकरण, विकास प्राधिकरण, गृह निर्माण मंडल, वन, सरकारी विभाग, पंजीयन सभी मोटी कमाई कर देते हैं, भू कॉलोनी माफिया को संरक्षण
कैग (CAG) की रिपोर्ट और मैदानी हकीकत में अवैध कॉलोनियों को लेकर बड़ा अंतर सामने आया है। कैग ने जहाँ 636 अवैध कॉलोनियों की बात मानी हैवहीं इंदौर में लगभग 2000 और मध्य प्रदेश में 50,000 से अधिक कॉलोनियां अवैध होने का दावा हैजो राज्य में बड़े पैमाने पर अनियमित विकास को दर्शाता है।
अवैध कॉलोनियों पर विरोधाभास:
- कैग रिपोर्ट: कैग ने 636 अवैध कॉलोनियों की पुष्टि की है।
- वास्तविक स्थिति (अनुमानित): इंदौर में ही 2000 से अधिक और पूरे प्रदेश में 50,000 से ज्यादा अवैध कॉलोनियां हैं।
- प्रभाव: इतनी बड़ी संख्या में अवैध कॉलोनियां होनानगर निगमों और विकास प्राधिकरणों की निगरानी में बड़ी खामियां दिखाता है।
प्रमुख बिंदु:
- यह अंतर सरकारी सर्वे और जमीनी हकीकत के बीच भारी अंतर को उजागर करता है।
- अवैध कॉलोनियों में बुनियादी सुविधाओं (पानीसड़कबिजली) का अभाव होता हैजिससे रहवासियों को परेशानी होती है।
- राज्य सरकार के नियमितीकरण के दावों के बावजूद अवैध कॉलोनियों का दायरा बहुत बड़ा है।
अवैध कॉलोनियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया धीमी होने के कारण भी यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
भारत के महालेखाकार की टीम ने इंदौर में अपने ऑडिट की टिप्पणी में लिखा इंदौर में 636 कॉलोनी अवैध परंतु टीएनसीपी नगर निगम कलेक्टर नगर निगम को पूरे रिकॉर्ड दस्तावेज उपलब्ध नहीं करवाए जब उन्होंने 636 कॉलोनी बताइए जबकि यथार्थ में इंदौर में 2000 से ज्यादा कालोनियां सभी अंतर नगरीय मार्गों, राज्य मागों, राजमार्गों, बड़े संस्थानों के आसपास खड़ी है जिनमें सबने अर्थातकलेक्टरेट के राजस्व निरीक्षक पटवारी नायब तहसीलदार तहसीलदार एडीएम एसडीएम कलेक्टर से लेकर नगर निगम पालिकाएं परिषदों परशुराम महापौर निगम आयुक्त मुख्य कार्यपालिका अधिकारी से लेकर पंचायतों के सरपंचों तक सबने पैसा कमाया। कॉलोनी बनाने की परमिशन देने की सारी कहानी टी एंड सीपी गृह एवं ग्रामीण विश्व के अधिकारियों में चपरासी से लेकर सहायक मानचित्रकार मानचित्रकार जुकी भूमि के फेरबदल कॉलोनी प्राकृतिक नदी नालों खेतों पहाड़ों वन भूमि सरकारी शिक्षण संस्थानों सड़कों चरनोई ग्राम पंचायत नजूल भूमि आदि को वहां बैठे सहायक उप व संयुक्त संचालक तक केअधिकारों द्वारा फिर बदल करने के साथ-साथ पंजीयन में ऐसी कानूनियों की चड़ाधड़ रजिस्ट्री होने खरीद बिक्री होने नामांतरण करने ग्रहण रखने आदि के खेल इन विभागों में किए जाते हैं। भूमिया कॉलोनी माफिया बड़े-बड़े विज्ञापन देकर साथ में बड़े-बड़े समाचार पत्रों जिसमें भास्कर पत्रिका नई दुनिया व अन्य समाचार पत्रों को मिलाकर उनकी में बड़े विज्ञापन छपवाते हैं जबकि यह जो विज्ञापन जो अवैध कॉलोनी के होते हैं विज्ञापन छापना ही भारतीय विज्ञापन प्रकाशन संहिता अधिनियम 1956 के अंतर्गत ही प्रतिबंधित है ताकि आम जनता उसमें भ्रमित ना हो और उसमें आमजन विचारक जीवन भर की कमाई झोंक कर अपने लिए मकान खड़ा करने का सपना ना देखें जबकि ऐसा अधिकतम करोनियों मेंअकेले इंदौर में ही हजारों करोड़ों का व्यापार हो चुका है।
भारतीय महालेखाकार यथार्थ में मैद्धांतिक रूप सेकागजी चौकीदार खान है। जो केवल कागजों की देखभाल कर उसमें त्रुटियां अनियमितताएं अवैधना को ही इंगित कर सकता है यह फील्ड में जाकर करने के साथउसे पर कोई उंगली नहीं उठा सकता यह बात हर विभाग में लागू होती है इसलिए वह 636 बता पायापर जितने भी कलेक्टर यहां पर आते हैं यह सब मोटी कमाई करने के लिए भू माफिया कॉलोनी माफिया को सरकारी जमीनों जो अनेकों विभागों की जिसमें कृषि उद्यान की वन लोक निर्माण शिक्षा गृह निर्माण नजूल उद्योग जल संसाधन लोक स्वास्थ्य यांत्रिकीय चिकित्सा विद्युत मंडल की कंपनियां आदि सरकार के सौ से ज्यादा विभागों की भूमि पर भी अपनी मोटी कमाई के लिए कॉलोनी कटवाने से गुरेज नहीं करते।
यही कारण है कि मध्य प्रदेश गृह एवं प्राम निवेश नगर निगम पालिकाओं परिषदों कलेक्टर कार्यालय गृह निर्माण मंडल लोक निर्माण विभाग वन विभाग शिक्षा चिकित्सा उद्योग कृषि उद्यान की जल संसाधन आदि विभागों मेंअगर सूचना के अधिकार में जानकारी मांगने पर कि आपका विभाग की कितनी भूमि कहां भू और कॉलोनी माफियाओं किसानों उद्योगपतियों ने अवैध कब्जे कर रखी है तो यह अफसर सब के सब कोई जानकारी नहीं देते सूचना अधिकार के पत्र के जवाब में लिख देते हैं हमारे पास स्टाफ नहीं है आपके पत्र की भाषा समतझ में नहीं आ रही आप क्या चाहते हैं आप कार्यालय में आकर दस्तावेजों का अवलोकन करिए इस प्रकार के बहाने बनाकर सूचना के अधिकार में इन अवैध कानूनी माफिया की जानकारी देने से संबंधित विभाग बचने की नाकाम कोशिश करते हैं क्योंकि सारे हरामखोरों नेजल संजू भूमिया कॉलोनी माफिया के साथ मिलकर अपनी भूमि के बड़े बड़े करोड़ों रुपए हजम किए होते हैं और यह कहानी इंदौर भोपाल जबलपुर ग्वालियर उज्जैन की ही नहीं गांव से लेकर नगर परिषदों पालिकाओं और नगर निर्गमन की भी पूरे प्रदेश में है । प्रदेश में इस प्रकार 50000 से ज्यादा कालोनी है भू कॉलोनी माफिया द्वारा नेताओं के संरक्षण में दूसरी तरफ बर्तमान में तो प्रदेश का मोहन यादव मुख्यमंत्री और उसका परिवार ही स्वयं बड़ा भू कॉलोनी माफिया बन अपने कार्यकाल में लाखों करोड़ों की जमीन संजय कर जाना चाहता है सूत्रों के अनुसार यहां से लेकर राजस्थान के झालावाड़ तक हर शहर में अवैध कालोनी काटने बालों को संरक्षण देने के साथ उन कॉलोनीयों में अपने प्लॉट भी बुक कर रखे हैं।






Add comment