शीतल पी. सिंह
18 नवंबर 2025 को आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू जिले के मारे डुमिल्ली जंगल में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में माडवी हिड़मा (उम्र 51), उनकी पत्नी मडकम राजे और चार अन्य नक्सलियों की मौत हो गई. हिड़मा, सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति का सदस्य और बस्तर क्षेत्र के सबसे कुख्यात कमांडर थे, जिनके सिर पर 1 करोड़ रुपये का इनाम था. वे 2010 के दंतेवाड़ा हमले (76 सीआरपीएफ जवान शहीद), 2013 के झीरम घाटी हमले (कांग्रेस नेताओं की हत्या) और कई अन्य घातों के मास्टरमाइंड माने जाते थे.
छत्तीसगढ़ पुलिस ने इसे नक्सलवाद के खिलाफ ‘ताबूत में आखिरी कील’ बताया, जबकि गृह मंत्री अमित शाह ने 30 नवंबर तक हिड़मा को खत्म करने का लक्ष्य रखा था. यह घटना नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरेंडर और ऑपरेशनों की लहर के बीच आई, जहां 2025 में 450 से अधिक नक्सली मारे जा चुके हैं.
सोशल मीडिया पर हिड़मा की मौत ने भारी विवाद पैदा कर दिया. एक्स (पूर्व ट्विटर) पर #Hidma और #हिड़मा जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां एक तरफ दक्षिणपंथी यूजर्स इसे ‘नक्सलवाद पर ऐतिहासिक जीत’ बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकार कार्यकर्ता, पूर्व विधायक और कुछ आदिवासी समर्थक इसे ‘फर्जी मुठभेड़’ करार दे रहे हैं.
पूर्व बस्तर विधायक मणिश कुंजम ने दावा किया कि हिड़मा को जिंदा पकड़ लिया गया और फिर मार दिया गया, तथा यह माओवादी नेता देवजी की साजिश थी. एक्स पर पोस्ट्स में हिड़मा को ‘आदिवासी योद्धा’ बताते हुए उनकी मां की गरीबी और जंगल-जमीन के मुद्दों पर चर्चा हो रही है. एक वीडियो में आदिवासी महिलाएं उनके शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाती दिख रही हैं, जिसे ‘लव स्टोरी का दुखद अंत’ कहा जा रहा है. दूसरी ओर, यूजर्स जैसे @BesuraTaansane ने समर्थकों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा और एनआईए से जांच की मांग की.
यूट्यूब और फेसबुक पर असंख्य रील्स वायरल हो रही हैं, जहां आदिवासी समुदाय में हिड़मा के प्रति हमदर्दी झलक रही है. चैनल्स जैसे साक्षी टीवी और आईएएन24 ने रील्स में हिड़मा को ‘आदिवासी हीरो’ बताया, जो खनन माफिया और सरकारी दमन के खिलाफ लड़े.
एक रील में कहा गया, ‘हिड़मा ने जंगल बचाने के लिए हथियार उठाए, क्योंकि सरकार ने आदिवासियों की जमीन छीनी.’ ये वीडियोज लाखों व्यूज पा चुके हैं, जिसमें अंतिम संस्कार की क्लिप्स और लोक गीतों पर आधारित कंटेंट शामिल है. फेसबुक ग्रुप्स में ‘लाल सलाम’ वाले पोस्ट्स शेयर हो रहे हैं, जो हिड़मा को ‘शोषितों का मसीहा’ बता रहे हैं. हालांकि, ये रील्स अक्सर सेंसरशिप का शिकार हो रही हैं, और कुछ यूजर्स ने इन्हें ‘प्रोपगैंडा’ कहा.
मीडिया में कवरेज दोधारी तलवार सी है. राष्ट्रीय चैनल्स (एनडीटीवी, इंडिया टुडे) ने इसे ‘नक्सलवाद के अंत की शुरुआत’ बताया, लेकिन क्षेत्रीय मीडिया और कुछ आउटलेट्स (फ्रंटलाइन, द वायर) ने फर्जी एनकाउंटर के आरोपों को प्रमुखता दी. हिड़मा के भाई और माओवादी संगठन ने दावा किया कि वे विजयवाड़ा में इलाज के लिए गए थे, और ‘गद्दारों’ ने लोकेशन लीक की. सिविल लिबर्टीज कमिटी ने इसे ‘राज्य प्रायोजित हत्या’ कहा. जितने मुंह, उतनी बातें—कुछ इसे सरेंडर प्लान की विफलता बता रहे हैं, तो कुछ माओवादी विभाजन का नतीजा.
देश की प्रमुख पार्टियां—बीजेपी और कांग्रेस—ने इसे छोटी खबर बनाए रखा. छत्तीसगढ़ सीएम विष्णु देव साय ने इसे ‘लाल आतंक पर बड़ी जीत’ कहा, लेकिन कोई बड़ा बयान नहीं आया. गृह मंत्री अमित शाह ने लक्ष्य पूरा होने पर बधाई दी, लेकिन विपक्ष पर चुप्पी साधी. कांग्रेस ने इसे ‘सुरक्षा सफलता’ माना, लेकिन एक यूथ कांग्रेस नेता प्रीति मांझी के ‘लाल सलाम’ पोस्ट पर विवाद हुआ—पार्टी ने उन्हें सस्पेंड कर जांच शुरू की. मध्य प्रदेश सीएम मोहन यादव ने दिग्विजय सिंह पर नक्सली समर्थन का आरोप लगाया. राष्ट्रीय मीडिया (द हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस) ने इसे संक्षिप्त कवर किया, फोकस सरेंडर और ऑपरेशन पर रहा, न कि आदिवासी हमदर्दी पर.
यह नक्सलवाद के लिए बहुत बड़ा झटका है ? हिड़मा की मौत से सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति कमजोर हो गई—अब सिर्फ 7 सदस्य बचे हैं. 2025 में 1,300 से अधिक सरेंडर हुए, और बस्तर में सक्रिय कैडर घटकर 100-150 रह गए. अमित शाह का 31 मार्च 2026 का लक्ष्य करीब लग रहा है लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में जंगल-जमीन, खनन और गरीबी के मुद्दे न सिर्फ़ बरकरार हैं बल्कि नये नये सिरे से उभर रहे हैं जो नई भर्ती को जन्म दे सकते हैं.
सोशल मीडिया की हमदर्दी बताती है कि राज्य की नीतियां आदिवासियों को अलग-थलग कर रही हैं—फर्जी एनकाउंटर के आरोप विकास मॉडल पर सवाल उठाते हैं. ध्यान रहे नक्सलवाद एक विचार है और विचार धुंधला जाते हैं लेकिन खत्म नहीं हो सकते.





