सुसंस्कृति परिहार
इधर सरकार, वैज्ञानिक और चिकित्सा शास्त्री ओमेक्रान कोरोनावायरस के नित नए स्वरुप को लेकर परेशान हैं वहीं दूसरी ओर हम भारत के लोग इसे ज़रा भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।जीवन -मरण जस -अपजस सब प्रभु के हाथ है ।वे तो यही कहकर ख़ुश हैं।कहते हैं यदि मरना ही है तो तिल तिल डरना कैसा ?मानों ग़ालिबाना अंदाज़ में कह रहे हों मौत का एक दिन मुअय्य्न है नींद क्यों रात भर नहीं आती ? लगता है जैसे हमारी संस्कृति का मूलाधार सिर्फ यही है।यह भ्रांत धारणा है और इसे इंसानियत और संवेदनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। आजकल देखा जा रहा है कि पढ़ें लिखे लोग भले चिकित्सा और विज्ञान की उपादेयता समझाएं किंतु जिसे ऊपर वाले की लगन लग गई उसे समझाना व्यर्थ है।संयोग से हमारे देश में ऐसे लोगों की तादाद बहुतायत में हैं। चिकित्सक कितनी भी मेहनत से बीमार को ठीक कर देता है पर वह उसे भगवान की कृपा ही मानता है।अब कोरोनाकाल में ही देखिए कैसे कैसे विद्यार्थी परीक्षा उत्तीर्ण कर लिए। कोरोनावायरस की या शिवराज की जय ही बोल देते पर जय तो भगवान की ही हो रही है।ना भगवान कोरोनावायरस भेजता,ना बिना परीक्षा पास करने मामा जी कहते यानि सारा किया कराया प्रभु का है इसलिए चाहे मास्क लगाओ या ना लगाओ।एक गज दूरी रखो या ना रखो सब तो वहीं करेगा।
पिछले दिनों एक बड़ा ही अजीबोगरीब दृश्य देखकर चकित होना पड़ा कि भगवान की इस तरहा जयकारा की गई कि चेतना जाती रही। एक पुलिस वाले ने मास्क विहीन एक ग्रामीण को टोका- मास्क नहीं लगा है जुर्माना भरो 500₹ ।वह सकपका गया बोला काहे का ।मास्क नहीं लगाने का।उसने कहा- पिछले साल मेरे भाई ने लगाया था उसकी दम घुटने से मौत हो गई।मुझे भी मास्क बंधवा कर मारना है क्या ? सुनो!भगवान की मर्जी बिना पत्ता नहीं हिलता।जबरन लोगों को ना मारो। चारों तरफ जयकारा चल पड़ा। जय श्री राम का।पुलिस वाले ने भी जय बोली और उसे रुखसत कर दिया भीड़ भी छंट गई।इसी घटना से प्रेरित एक शहरी युवा कोरोनावायरस नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए कोरोना को हो गया है प्यार ——-हम क्या करें ?गाता निकल गया।लोग देखते रह गए।
ये सब बातें सोचने विवश करती हैं कि कोरोनावायरस के युद्ध में भी जय श्री राम और उत्तेजक भीड़। पुलिस वाला हिंदू नहीं होता तो बिना कोरोना वायरस के भी वह भगवान को प्यारा हो गया होता। दूसरा अहम सवाल है क्या यह ज़रुरी है कि बीमार को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए यानि भगवान भरोसे।ऐसा तो कभी नहीं होना चाहिए।आखिरी सांस तक परिवार जन और चिकित्सक मेहनत करते हैं और कितनों को जीवन देते हैं।यह नहीं भूलना चाहिए। पिछले कोराना काल की दूसरी लहर को याद करिए कितने आखिरी सांस लेते लोगों को भी परिजन अस्पतालों के चक्कर काटते रहे।यह इंसानियत से प्रेम है।इसे भगवान की आड़ लेकर हर्गिज रोका नहीं जा सकता।
याद रखिए,वैक्सीन के दो डोज आपने लिए है इसका ये मतलब कतई नहीं अब आप पूरी तरह सेफ हैं वस्तुत:कोरोनावायरस बहुरुपिए की तरह अपनी तासीर बदल रहा है इसलिए पहली बनी वैक्सीन का असर कम हो जाता है जब तक आगे का डोज़ आ पाता है उससे पहले वह कम असर वाले लोगों को चपेट में ले लेता हैऔर यहीं जन हानि हो जाती है। इसलिए जो सबसे मुफीद और सस्ता तथा आसान रास्ता होता है वह है सावधानी रखना और ये सभी को मालूम हैं। इसलिए इनका परिपालन कर इसकी चेन पर रोक लग जाती है।जब इसे तोड़ा जाता है तो संक्रमण दर कई गुनी रफ्तार से बढ़ती है तब सबको इलाज मुश्किल होने लगता है।
इसलिए अपनी सांसों को बचाने की ज़रूरत है।मास्क से दम घुटता है यह सही नहीं है।ये ज़रूर है अनावश्यक दबाव लगता है किंतु नियमितीकरण के बाद ये अहसास जाता रहता है।दो गज दूरी है ज़रुरी क्योंकि आप सहजता से मरीज को नहीं जान पाते। भीड़ से दूरी बनाएं।हाथ साफ रखें।सबसे बड़ी बात ये कि इससे डरे नहीं ।नया वेरिएंट अभी तक क्यूरेबिल है लेकिन रिस्क ना लें। युवाओं को डोज़ बराबर दिलवाएं कोताही ना बरतें। बुज़ुर्ग जो अन्य बीमारियों से घिरे हैं उन लोगों को बूस्टर भी लगवाएं।ये सब नि:शुल्क हैं।
कोरोना को हो गया है प्यार —-तो हम क्या करें?जी निदान आपके पास है । ज़रूरी है मस्त रहें लेकिन अपनी और अपने समाज की फ्रिक भी करें। जीवन भगवान ने सिर्फ जीने -मरने के लिए ही नहीं बनाया है बल्कि कठिनाइयों में रास्ता बनाने के लिए भी दिया है।आइए कोशिश करें इस प्यारे जगत में हम हंसते मुस्कुराते निरंतर प्रगतिपथ पर चलते रहें और जितना बन पड़े सहयोग हम भी करें ।
कोरोना को हो गया है प्यार !तो हम क्या करें?




