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संस्कृति~ चिंतन : हम भारतीयों के जीवन का अद्भुत सत्य 

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दिव्यांशी मिश्रा 

      _अगर आप सोचते है कि भारत की आत्मा धर्म में बसती है, तॊ आप ग़लत हैं ! वह अध्यात्म, तप और त्याग में भी नही बसती ! वह उत्सव, तीज, त्योहारों में भी नही बसती !! वह सिर्फ़ एक ही चीज़ में बसती है ! और वह है –  “दिखावा ” यानी पाखण्ड !!_ 

   *इसे आप ध्यान से समझ लें :*

पूरे भारत की आत्मा में जो तत्व गहरे समाया है, वह ‘सत्य’ या ‘परमात्मा’ नही है। वह है – “मैं क्या चीज़ हूँ !”

    यहाँ हर व्यक्ति इस जुगत में लगा है कि, किसी भी तरह से, किसी भी क्षेत्र में सफ़ल होकर, दूसरों को बता सके कि ” देख, मैं क्या चीज हूँ ।”

       _यही दिखाने के लिए वह पैसा कमा रहा है। यही दिखाने के लिए वह नेतागीरी कर रहा है। यही दिखाने के लिए वह अधिकारी बना है, कलाकर बना है। यही दिखाने के लिए वह कविता कर रहा है, लिख रहा है !_

यह महज़ जीविकोपार्जन का मामला नही है। यह नुमाईश का मामला है। अपनी हैसियत के प्रदर्शन का मामला है। यही दिखाने के लिए वह नाच रहा है…गा रहा है, या अन्य उद्यम कर रहा है।

   _जब तक ये “दिखावावाद” जिंदा हैं भारत में : आप भूल जाईये कि यहाँ कोई उत्थान हो सकता है। न साम्यवाद, न समाजवाद, न राष्ट्रवाद। मानवतावाद तो दूर की बात है।_

अभी कम से कम सौ वर्षों तक यहाँ जो “वाद” चलेंगे, वो हैं :

“अहंवाद” “मैं वाद”, “स्वार्थवाद”, “परिवारवाद”, “लूटखसोट वाद।” 

     जब तक ये “वाद” हैं, तब तक किसी भी तरह का उत्थान भारत में परम असंभावना है। वह इसलिए, क्योंकि ~

*यहाँ खून के एक खरबवें हिस्से में भी जो विष भरा है…वह है, “”वी.आई.पी. वाद”” व “वर्गभेदवाद” का विष।*

यहाँ आलम ये है कि एक स्कूल, एक क्लास में पढ़े बालसखा भी ग्रुपों में बँट जाते हैं। जो सफ़ल हैं, वो स्वयं को एलीट (उत्कृष्ट, श्रेष्ठ) मानने लगते हैं और अन्यों को दोयम।

      _भारत में शायद ही ऐसा अधिकारी देखने को मिलेगा जो अपने मातहतों को हिक़ारत से ना देखता हो। शायद ही ऐसे लोग मिलेंगे जो घर में काम करने वाली बाई, मजदूर, प्लम्बर, इलेक्ट्रिशियन या स्वीपर को तुच्छता से ना देखते हों। शायद ही ऐसा नेता मिलेगा जिसके आस-पास 4-6 छर्रे न मँडराते हों…और वह अपने आप को आलमगीर न समझता हो।_

   फ्लाइट से कहीं जाने वाला व्यक्ति जब तक 10-20 बार अनेक लोगों के बीच ये ना बक ले कि “मेरी कल सुबह 10 बजे की फ्लाइट है” या, “मैं कल 5 बजे की फ्लाइट से वापिस लौटा!” उसे लगता हैं कि मेरा आना जाना सफ़ल नही हुआ !

     _छुटभैये बिल्डर, ठेकेदार ज़रा सा पैसा आते ही मोटी मोटी सोने की चेन और कड़ा पहनकर अपने सफ़ल होने की भौंडी नुमाईश करते मिलेंगे।_

    नव धनाड्य हर साल कारें बदल कर अपने अमीर होने की पुनर्रुदघोषणा करते हैं।

कुल मिलाकर, जिस एक भाव से पूरा भारतवर्ष आविष्ट हैं…वह है – 

“देख, मैं क्या हूँ , और तू क्या है ?”

     _यह दिखावावाद ही वह भूमि है…जिस पर लहलहा रही हैं भ्रष्टाचार की फसलें, वर्ग भेद के पौधे  और इन पर भिनभिना रहे हैं उच्चता और निम्नतावाद के कीड़े।_

    *इसी के कारण सब रोगी हैं, तनाव ग्रस्त हैं, कुंठित हैं, मनोविषादी हैं।*

    _यही कारण है कि भारत डायबिटीज, हृदयरोग, ब्लड प्रेशर जैसी सभी प्रमुख बीमारियों का हब बना हुआ है ! क्योंकि कुंठा ग्रस्त मन अंततः शरीर को भी रुग्ण बना देता है।_

सब साइकोसोमेटिक है ! 

      इन बीमारियों के निवारणार्थ गली-गली में उग रहे हैं…धर्म गुरु, ज्योतिषी, आयुर्वेदा, योगा के स्वयं-भू कमअक़्ल लपोसड़ विद्वान।

   _पूरा भारत भरा पड़ा है जग्गी-फग्गी, श्री-फ्री, आबाओं-बाबाओं और चंगाई सभाओं से। कहीं सुबह गार्डन में नकली हास्यासन हों रहे हैं तॊ कहीं जिन्नाद उतारे जा रहे हैं।_

   *उधर पति पैसा कमाने की मशीन हुआ जा रहा है। इधर पत्नि अतृप्त और नकली जीवन की घुटन और नैराश्य से तिल तिल मर रही है।*

जिस दिन ये श्रेष्ठता साबित करने का जिन्न उतर जाएगा भारत के सिर से, उस दिन सब दुरुस्त होने लगेगा शरीर भी, स्वास्थ्य भी, धर्म भी, अध्यात्म भी ! नकली बाबा, हकीम, वैद्य, डाक्टर भी।

    मगर इस नुमायशी आदमी के रहते साम्यवाद भी एक सपना है और राष्ट्रवाद भी दूर की कौड़ी है। 

क्योंकि~

   _जब “मैं” मिटता है और तब “दूसरा” दिखता है। तब साम्यवाद भी संभावना है। जब “मैं” मिटता है और “राष्ट्र” दिखता है…तब राष्ट्रवाद भी संभावना है।_

   लेकिन ~

*जब तक ये एलीट (श्रेष्ठ) होने की विष्ठा भरी है दिमाग़ में…और उच्चता-निम्नता की पेशाब बह रही है रगों में…तब तक इस देश में कोई संभावना नही है !*

बचपन में एक कविता पढ़ी थी स्कूल में :

         “दो आदमी एक कमरे में, 

         कमरा घर में,

          घर, मुहल्ले में, 

         मुहल्ला शहर में,

            शहर प्रदेश में,

               प्रदेश, देश में !…”

   _ऐसे बढ़ते हुए वो बात ब्रहांड तक जाती थी। इस ब्रह्मांड में रेत के एक कण के खरबवें हिस्से से भी कम हैसियत है पृथ्वी की। हम-आपकी तॊ बिसात ही क्या।_

   जब तक इस बोध से अनुप्राणित ना होंगे प्राण…तब तक कोई संभावना नहीं है।

    *हाथ में सोने का कड़ा पहनने से कोई श्रेष्ठ नही हॊता। श्रेष्ठ हॊता है आदमी, चेतना के उत्थान से !*

श्रेष्ठ हॊता है वो…जिसकी आँखें सौम्य हों। जिसका ललाट भव्य हो। जिसकी भावना उद्दात हो,

जिसके हृदय में प्रेम हो।

*मनुष्य एलीट (उत्कृष्ट,श्रेष्ठ) हॊता है चेतना के विस्तार से, वस्तुओं के संग्रहण से नही !*

ब्रह्मआत्म ऐक्य (आत्मिक) बोध से, दिखावे से नही !! ये पूरब की उद्घोषणा थी !

मगर अब हम उस ऊंचाई से बहुत गहरी गर्त में आ गिरे हैं ! 

 “दिखावावाद” वाकई में एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। दिन ब दिन इसका विस्तार विशालतम होता जाता है। इसे हम मानवीय स्वभाव का दोहरा मापदंड (डबल स्टैण्डर्ड) भी कह सकते हैं।

    मतलब~

*होता कुछ है, और दिखता कुछ है। ये एक प्रकार का स्वयं को, अपनो को व अपने भविष्य को दिया जाने वाला धोखा है, जिसने सत्य को धूमिल और भविष्य को अंधकारमय कर दिया है।*

       दिखावावाद का जन्म मुख्यतः उन्ही में होता है, जिनकी कोई आत्मा नहीं है, जिनके हृदय मृत है। जो अंदर से खाली, वीरान और बंजर है। उन्हें ही बाहर से खुद को दिखाना पड़ता है। वो जो अंदर की पीड़ा है, वो बिना दिखाए, बिना शोर फैलाये शांति कहाँ पाती है।

  _खैर! छोड़िये क्या होने वाला इन गहरी गहरी बातों से। जो है सो है, कुछ भी नहीं घुसने वाला इन दिखावावाद से पीड़ित खोपड़ियों में।_

जय हो दिखावावाद !

कल्याणमय हो भारत का भविष्य !!

      _*हाँ अगर तुम्हारा दिखावा सार्थक, सकारात्मक और उज्ज्वल भविष्य के लिए है*, तो जमकर अपने कार्यों को दिखाइए और गर्व से कहिए ~ ” मैं भी हूँ मानव !” एक नई सोच और उम्मीद का मानव !!_

     (चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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