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*संस्कृति : इस्लाम के पहले का अरब और मक्का*

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        प्रस्तुति : पुष्पा गुप्ता

इस्लामिक इतिहास, मजहब और राजनीति में एक बहुत पवित्र वर्ष माना जाता है. उस वर्ष को अरबी भाषा में “उम अल-फिल“ अंग्रेजी में ईयर ऑफ एलीफेंट अर्थात् हाथी का वर्ष कहा जाता है.

     यह वर्ष ग्रेगेरियन कैलेंडर के अनुसार सन् 570 ई था. इस वर्ष को हाथी का वर्ष इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसी काल में अक्सुम साम्राज्य ने मक्का को जीतने के लिए आक्रमण किया था.

      चूँकि अक्सुम अफ्रीकी साम्राज्य था इसीलिए उनकी सेना में हाथियों की संख्या अच्छी थी. और वे हॉर्न ऑफ अफ्रीका से पार करके अरब क्षेत्र आए थे. इसीलिए उनकी पूरी सैन्य टुकड़ी हाथियों पर थी.

इसी आक्रमण को लेकर इस्लाम से पहले के अरबी काल की एक कहानी है जिसमें बताया जाता है कि मक्का की रक्षा के लिए पक्षियों ने हाथियों की सेना से युद्ध किया था.

     इसमें कहा जाता है कि पक्षियों ने अपनी चोंच में पत्थर लेकर हाथियों पर प्रहार किया. और उन्होंने काबा और मक्का की रक्षा की. इस आक्रमण में, इस कहानी के अनुसार, हाथियों की सेना को पक्षियों ने पराजित कर दिया.

      इस चमत्कारी, इस्लाम से पहले की, कथा का इस्लाम में भी बहुत ही विशेष महत्व है. क्योंकि इस्लामिक मान्यता के अनुसार इसी वर्ष अर्थात् सन् 570 में ही मोहम्मद साहब का जन्म हुआ था.

चूँकि अरब में रेकॉर्ड रखने और लिखने का कोई चलन नहीं था इसीलिए इसे पुष्ट करने के कोई पत्र उपस्थित नहीं है. अकादमिक अरबी इतिहासकारों के अनुसार मोहम्मद साहब का जन्म अक्सुम के इस आक्रमण के कुछ वर्षों बाद हुआ था.

    यहाँ दो बातें बहुत विशेष हैं पहली यह है कि मक्का पर अक्सुम साम्राज्य का आक्रमण क्यों हुआ? और दूसरा क्या अरब में कोई केंद्रीय सत्ता नहीं थी जो प्रतिरोध करती?

     सबसे पहले मक्का के बारे में बात करते हैं. इस्लाम के उदय से बहुत पूर्व ही मक्का एक बड़ा व्यापारिक और धार्मिक केंद्र हुआ करता था.

मक्का ही भारत से व्यापार और सिल्क रूट से व्यापार का बड़ा केंद्र था. अरबी जहाजियों द्वारा भारत से लाए गए मसाले सोने से भी महंगे यूरोप में बिका करते थे. इसीलिए मक्का कहीं समृद्ध शहर था. साथ दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी अरब में कोई केंद्रीय सत्ता नहीं थी.

    एक ओर सासानी साम्राज्य था तो उत्तर की ओर बाइजेंटियम साम्राज्य और समुद्र पार अफ्रीका में अक्सुम थे. घासनी और अखमिद दो अरबी छोटे राज्य उत्तर में थे अवश्य लेकिन वे शक्तिशाली नहीं थे.

     वे दोनों साशनी और बाइजेंटियम साम्राज्यों के बफर स्टेट अधिक थे. ऐसे में कबायली अरब की स्थिति अराजकता से भरी थी.

     व्यापार के चलते और भारत से आए धातु-कर्म से धनाढ्य हो ही चुके थे. इसीलिए सभी साम्राज्यों की दृष्टि मक्का पर रहती थी. और मक्का व्यापारिक के साथ ही साथ धार्मिक शक्ति का भी केंद्र था. क्योंकि मक्का में ही काबा था जहाँ हर वर्ष तीर्थ यात्रा होती थी और इससे आय की जाती थी.

बहुत से लोगों को संभवतः पता ना हो की हज और काबा की मजहबी यात्रा मोहम्मद साहब ने आरंभ नहीं की थी. यह उनके जन्म से बहुत पहले से होती थी. और इस पर उनके ही वंश का आधिपत्य था.

     मोहम्मद साहब के दादाजान हाशिम हर वर्ष मक्का में तीर्थ यात्रा आयोजित करते थे. और यह उनके वर्चस्व और आय का एक बड़ा साधन था. मोहम्मद साहब ने मात्र अपने वंश के आधिपत्य वाले धर्म स्थल को अपने नए मजहब में विशेष बनाया.

     इसीलिए जब इस्लाम की स्थापना और विस्तार हुआ तो उसमें काबा और मक्का से जुड़ी बातें अधिक प्राथमिकता पाईं. क्योंकि कुरैशों के ही अधिकार में यह वृद्धि करता था.

      मक्का की यात्रा से मिलने वाले व्यापारिक टैक्स को लेकर तीनों साम्राज्यों की दृष्टि थी क्योंकि यदि मक्का पर आधिपत्य हो जाता. तो धार्मिक रूप से भी उनको कर यानी टैक्स मिलने लगता।

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