उमेश प्रसाद सिंह,पटना
समाजवादी ऑदोलन अपने जीवनकाल 1934 से जबतक संगठन पूरी तरह डाक्टर राम मनोहर लोहिया के हाथ नहीं आया ; दलित, पिछड़े , अकलियत नेतृत्व को कभी भी पनपने नहीं दिया।
1942 हजारीबाग जेल से फरार सभी सवर्ण समाज के नेता जयप्रकाश, राम नन्दन मिश्र, सूर्यनारायण सिंह, योगेन्द्र शुक्ल थे ; एकमात्र गुलाबी सोनार। आज उनका नाम कितने लोग जानते है। गुलाबी सोनार अंग्रेजीराज के ऑखों में भगतसिंह वाले केस में भी वाॅछित थे। सरकारी दस्तावेज में वे उस समय भी मोस्ट वांटेड थे। आज पिछड़ा उभार में भी वे कहीं दिखाई नहीं पड़ते।
आज कर्पूरी ठाकुर की जीवनी हिन्दी – अंग्रेजी में लिखने वालों की भीड़ व्यक्तिगत और सरकारी स्तर पर बड़ी बड़ी राशि देकर लिखाई जा रही है। ऐसी जीवनियाॅ प्रशंसा की एक नाकाम कोशिश है जो स्थायी नहीं होगी। कर्पूरी ठाकुर या एक गाड़ीवान के बेटा रामानन्द तिवारी को समाजवादी नेतृत्व कैसे दबाकर ही नहीं रखा; कार्यालय में कमरा बंद कर जो दुर्गति की गयी; वह लिखने का साहस मुझे भी नहीं है।यह दुर्गति करनेवाले दबंग सवर्ण नेता ही थे।
कर्पूरी ठाकुर की ऐसी हालत हो गयी कि वे कांग्रेस में जाने का मन बना लिये ; भला हो रामानन्द तिवारी जी का जिन्होंने कांग्रेस में जाने से रोका। मैं तो 1960 से रामानन्द तिवारी जी को लोहिया जी के साथ आने की कोशिश कर रहा था। ऐसा जुझारू नेता कैसे जयप्रकाश और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से निकले ; जब भी मैं जाता था ; मेरा प्रयास रहता था। अशोक मेहता ग्रुप का हर दबाव और कोशिश इन दोनों को कांग्रेस में ले जाने को प्रयास रत था। जयप्रकाश अपने स्वभाव अनुसार अपने अंतरात्मा पर फैसला लेने की राय दे चुके थे।
अंतत: 1964 का समय आया । कांग्रेस ने 1964 के लोहिया जी के एकता प्रयास वाराणसी सम्मेलन को विफल करने के उद्देश्य से डी आई आर में बंद रामानन्द तिवारी को हजारीबाग जेल से मुक्त कर दिया। आदरणीय तिवारी ने मुझे पोस्टकार्ड लिखकर ” वाराणसी” पहुॅचने को कहा जबकि मैं तो पहले से तैयार था। राॅची के साथी शैलेन्द्र भट्टाचार्य वगैरह के साथ हमलोग पूरे दलबल से पहुॅचे। आदरणीय तिवारी जी हमलोग के साथ ही ठहरे।
प्रजा वाले समानान्तर सम्मेलन कांग्रेस की मदद से सारनाथ में रखे। उसका नेतृत्व एन जी गोरे , हरिविष्णु कामथ , नाथपै, सुरेन्द्र नाथ द्विवेदी , सुरेन्द्र मोहन , बसावन सिंह , सूरजनारायण सिंह आदि कर रहे थे।
एस एम जोशी , रामानन्द तिवारी , कर्पूरी ठाकुर वगैरह लोहिया जी के एकता फार्मूला के साथ थे। इसके बाद ही कर्पूरी ठाकुर बिहार स्तर के नेता बने और फिर अखिल भारतीय छवि भी बनी।





