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आरएसएस की निजी मिलिशिया की तरह काम कर रही है दिल्ली पुलिस

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विजयशंकर चतुर्वेदी

दुनिया भर के प्रतिनिधियों की मौजूदगी वाले ‘एआई इम्पैक्ट 2026 समिट’ में यूथ कांग्रेस के विरोध को लेकर सत्ता पक्ष ने जिस तरह “राष्ट्र की छवि” और “शर्मनाक प्रदर्शन” वाले शब्द-पद लगातार इस्तेमाल किए हैं, उससे एक गहरा राजनीतिक विरोधाभास उजागर होता है। प्रदर्शनकारी युवाओं को क़ानून के हवाले कर दिया गया गया है, सरकार के इशारे पर आतंकवादियों जैसी छापामार गिरफ्तारियां अभी भी जारी हैं। और स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने इस प्रदर्शन को समस्त मर्यादा-भंग करने वाला आचरण करार दिया है।

इससे प्रेरणा लेकर दिल्ली पुलिस ने जज से कहा कि इन लोगों ने राष्ट्रविरोधी नारे लगाए हैं, इसलिए गहन जांच जरूरी है। लगता है कि दिल्ली पुलिस आरएसएस की निजी मिलिशिया की तरह काम कर रही है। तुलना के लिए, दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद जिले में 100 साल से अधिक पुरानी मजार को कुछ लोग तोड़ते हैं और 24 घण्टे में उनकी जमानत हो जाती है, जबकि उस हरकत ने सारी दुनिया में भारत की छबि ख़राब की थी।

लेकिन एक लोकतांत्रिक प्रदर्शन पर ऐसी धाराएँ थोपी जा रही हैं कि ये लोग लंबे समय तक जेल में सड़ते रहें! यह दमनात्मक कार्रवाई भविष्य के लिए चेतावनी भी है कि मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन की कोई जुर्रत न कर सके! माना कि कुछ कांग्रेसी युवाओं ने राजनीतिक नारे लगाए, तो उसे सीधे राष्ट्र की प्रतिष्ठा से जोड़ देना, दरअसल लोकतांत्रिक असहमति को अपराध की तरह पेश करना है।

पूरे देश में विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों की गूँज सुनाई दे रही है, उस पर सत्ता की तीखी प्रतिक्रिया ने इस बहस को और व्यापक बना दिया है।

आख़िर लोकतंत्र में विरोध कब से शर्मनाक हो गया? विरोध के तरीकों पर बहस हो सकती है, होनी भी चाहिए। यह सवाल इसलिए भी अहम है कि बीजेपी स्वयं अपने विपक्षी दौर में सड़क से संसद तक आक्रामक, नाटकीय और प्रतीकात्मक विरोध की राजनीति करती रही है। तब वही विरोध लोकतंत्र की ताकत कहा जाता था; आज वही तरीका अपनाने पर उसे राष्ट्र की प्रतिष्ठा से जोड़कर अस्वीकार्य करार दिया जा रहा है।

याद किया जाना चाहिए कि यूपीए सरकार के समय छोटी से छोटी बात पर, पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर बीजेपी के शीर्ष नेता बैलगाड़ियों पर बैठकर सदन जाते थे, महंगाई बढ़ने पर संसद ठप कर दी जाती थी, रसोई गैस महंगी होते ही सिलेंडर लेकर सड़कों पर प्रदर्शन होते थे। स्मृति ईरानी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को चूड़ियाँ भेजकर विरोध दर्ज किया था, और सुषमा स्वराज ने महंगाई के मुद्दे पर नाटकीय अंदाज़ में प्रदर्शन किए थे।

तब इसे जनभावना का प्रतिनिधित्व कहा गया, लोकतांत्रिक अधिकार कहा गया, सरकार को जवाबदेह बनाने का माध्यम बताया गया। आज जब पीएम के ही कंप्रोमाइज्ड दिखने पर विपक्ष प्रदर्शन करता है तो विरोध के तरीके अचानक “देश की छवि खराब करने वाले” और “शर्मनाक” घोषित कर दिए जाते हैं—यह लोकतांत्रिक मूल्यों की चयनात्मक व्याख्या का उदाहरण है।

असल प्रश्न यह है कि एनडीए सरकार ने विपक्ष के लिए स्पेस छोड़ा ही कहाँ है? संसद के भीतर विपक्ष को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, उनके माइक बंद कर दिए जाते हैं, महत्वपूर्ण विधेयक अकेले-अकेले पारित हो जाते हैं और विपक्ष से संवाद की जगह सत्ता की एकतरफा प्रस्तुति हावी होती जा रही है। लोकतंत्र का मंदिर कही जाने वाली संसद में यदि संवाद का गला घोंटा जाएगा, तो असहमति स्वाभाविक रूप से बाहर कहीं रास्ता तलाशेगी।

संसद के बाहर भी विरोध की अनुमति अक्सर कड़ी शर्तों और पुलिसिया कार्रवाई के घेरे में रहती है, या अनुमति ही नहीं दी जाती! ऐसे में यदि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस, एआई समिट जैसे किसी बड़े सार्वजनिक या अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रखने की कोशिश करता है, तो यह लोकतांत्रिक स्पेस की तलाश है या राष्ट्र का अपमान?— यह तय करने का अधिकार केवल सरकार के पास नहीं हो सकता; यह जनता का भी प्रश्न है।

“राष्ट्र की छवि” और “राष्ट्रीय शर्म” का तर्क तब कमजोर पड़ता दिखता है जब आर्थिक चुनौतियाँ गहराती हैं, बेरोज़गारी पर गंभीर सवाल उठते हैं, रुपया दबाव में रहता है, विवादित व्यापार समझौतों पर बहस होती है या विदेशी धरती पर भारतीय नागरिकों के साथ कठोर व्यवहार की खबरें सामने आती हैं। क्या राष्ट्र की छवि केवल विपक्ष के विरोध से तय होती है, या शासन की नीतियों, कूटनीतिक फैसलों और आर्थिक स्थितियों से भी?

लोकतंत्र में असहमति, विरोध और सवाल उठाना ही वह प्रक्रिया है जिससे संस्थाएँ मजबूत होती हैं। यदि सरकार की आलोचना को राष्ट्रविरोध की तरह प्रस्तुत किया जाएगा, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे आत्मालाप में बदल जाएगा। आलोचना देश को कमजोर नहीं करती; वह उसे अधिक जवाबदेह बनाती है और जनता का ध्यान अहम मुद्दों की ओर खींचती है।

समस्या यह है कि मोदी सरकार विरोध को नैतिकता के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक असुविधा के आधार पर परिभाषित कर रही है। यह रवैया लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है और सत्ता की असहिष्णुता को दर्शाता है।

लोकतंत्र की असली परीक्षा सत्ता की आलोचना सहने की क्षमता से होती है। यदि विरोध को शर्मनाक कहा जाएगा, तो इतिहास के हर विपक्ष को कठघरे में खड़ा करना पड़ेगा—जिसमें वे लोग भी शामिल होंगे जो आज सत्ता में हैं और कभी सड़कों पर उतरकर, संसद ठप कराकर और प्रतीकात्मक नौटंकियों के जरिए सरकारों को घेरते थे।

(पत्रकारिता समेत अभिव्यक्ति के कई आयामों को स्पर्श करने वाले विजयशंकर चतुर्वेदी सोशल मीडिया और रचनात्मक लेखन में सक्रिय हैं।)

Ramswaroop Mantri

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