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अधर्म का नाश हो*जाति का विनाश हो*(खंड-1)-(अध्याय-44)

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संजय कनौजिया की कलम”✍️

यू.पी.ए की मनमोहन सिंह सरकार में, विपक्ष में रहकर भी भाजपा लगातार हिंदुत्व को हवा देती रही..वर्ष 2014 में पुनः सत्ता पाने के बाद और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के अब तक इन दो कार्येकालों में, यानी आधुनिक भारत के इक्कसवी शताब्दी के रजत काल में, अधर्म मर्यादा की सभी सीमाएं लांघकर चरम पर जा पहुंचा..मॉब-लिंचिंग किस बला का नाम है शायद कुछ लोगों को ही पता हो, लेकिन आज पूरा देश इस नाम व इसके कृत्यों से वाकिफ़ हो चुका है.. रोमियो स्कवॉड, भाजपा शासित उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े प्रदेश में कैसा नाच नाचता दिखता है, यह किसी से छुपा नहीं..गैर हिन्दू नाम होने से दूसरे धर्म के लोगो को आतंकी कहकर बुरी तरह से उसकी हत्या कर दी जाती है..मांस को गौ-मांस से जोड़कर हत्या कर दी जाती है..अल्पसंख्यक वर्ग के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जाता है..कट्टर हिन्दुओं को सरे आम तलवार-त्रिशूल सहित उत्पात मचाते देखा जाता है..दलित वर्ग की बच्चियों युवतियों का शोषण-बलात्कार-और जघन्य हत्या के बावजूद प्रशासन की ख़ामोशी अचंभित कर डालती है..धार्मिक उन्मांद को लेकर शांत क्षेत्र को भी विषैला कर अशांत कर दिया जाता है..सत्ता के खिलाफ अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोट रखा है..जातिवाद को और अधिक बढ़ावा देकर नफरत-ऊंच नीच-छुआ-छूत की गैर-जरुरी मान्यताओं को बढ़ावा देकर सौहार्द और सद्भावना के सन्देश को समाप्त किया जा रहा है..आधुनिकता के इस युग में पाखंड-अंधविश्वास-तंत्र, मंत्र भी पीछे ना रहा, उसका चरित्र भी आधुनिकता की चादर ओढ़कर ज्यों का त्यों पहले से कहीं ओर अधिक गहरा गया..देश उस वक्त अचंभित हो गया जब यह बात सार्वजनिक हुई कि कर्णाटक के स्कूलों में 8वीं कक्षा के एक पाठ्यक्रम के हिस्से में सावरकर का वाहन बुलबुल था और वह जेल से ही बुलबुल पर सवार होकर, क्षेत्रों का भ्रमण कर सभी स्थितियों को भांपकर पुनः जेल में, अपने स्थान पर आ जाया करते थे, इस पाखण्ड को, दैविये शक्ति का प्रतीक बताकर पढ़ाया जाता हैं..समझा जाए तो यह भाजपा की प्रकर्ति का ही एक मुख्य हिस्सा है और इसके बाहर भाजपा जायेगी तो वह कोमा में आ जायेगी..भाजपा की बुनियाद ही इसी नीव पर टिकी हुई है..भाजपा धर्म में अधर्म का घोल ना करे तो अपनी पहचान खो देगी..आज भाजपा इसी अधर्म को लेकर 15 से 30% (प्रतिशत) लोगों को पक्के तौर पर अपना बना चुकी है..यानी देश की कुल आबादी के 30% (प्रतिशत) लोगों को अधर्म के मार्ग पर ले आई है..!
धर्म और अधर्म ये दो शब्द भारतीय मानव जीवन में अत्यंत ही गहरा स्थान बनाएं हुए हैं..धर्म कोई भी हो उसमे अधर्म की स्वीकार्यता, ना तो किसी भी धर्म ग्रन्थ में है और ना ही देश का संविधान इसकी इजाज़त देता है..उसके बावजूद अधर्म ने अपनी पहचान बरकरार रखी है, और समय-समय पर इसमें उतार-चढ़ाव होते रहे हैं..हम युग अनुसार समझें तो सतयुग में भी अधर्म की व्याख्या है, द्वापर और त्रेता युग में अधर्म ने चरम की सभी सीमाएं लांघ ली थी..जिसकी व्याख्याएं हिन्दू कहे जाने वाले धर्म-ग्रंथों और शास्त्रों में गढ़ी गईं हैं..चूँकि यह सब किवदंतियां ही हैं..अतः यहाँ हमे डॉ० राममनोहर लोहिया के दिखाए मार्ग से इतना सबक लेना चाहिए, कि इन कथाओं द्वारा जो वैज्ञानिक-सामाजिक व सांस्कृतिक अनुशासन बनाएं रखने के सन्देश हैं, जो मानव जीवन पर सकरात्मक असर डाले उसे स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं करना चाहिए..हालांकि जीवन जीने की पद्दति में अनुशासन ही एक मात्र माध्यम है, जो नियम के विपरीत जाने पर अंकुश का कार्य करता है..धर्म इस ओर लगातार सहायक बना हुआ रहा, लेकिन देश की आजादी के बाद धर्म की जगह संविधान को आधिकारिक मान्यता दी गई..आज दुनियां भर के लगभग सभी देश अपने-अपने बनाएं संविधान अनुसार ही चलते हैं..परन्तु यह बात भी समझनी होगी कि संविधान के नियम से पूर्व धर्म के दैविये भय, जीवन के जीने की पद्दति में अनुशासन बनाये रखे रहा..लेकिन धर्म से पहले भी अनुशासन के नियम पर चलने का कोई और माध्यम भी था, जो अनुशासन बनाएं हुए था..उस अनुशासन की झलक वर्तमान में भी अपना अघोषित स्थान बनाएं हुए है..इसे समझने के लिए, इस ओर मोटे तौर पर नज़र डालें तथा आदिकाल के मानव जीवन को समझें तो रात को जब थक हार कर लेटता था, तो उसे टिमटिमाते तारे दिखाई देते थे और उसमे जिज्ञासा के विवेक की ओर धकलते थे..दिन में सूर्य उसका जिज्ञासा का केंद्र रहता था..हवा-पानी-आकाश-पेड़-पौधे-जंगल-नदियां-पहाड़ आदि सब उसके जिज्ञासा के ही केंद्र थे..भयंकर जंगली पशुओं से सुरक्षा की सतर्कता एवं उनका शिकार उसे पाषाणयुग की ओर ले आया और यहाँ हम महान वैज्ञानिक डार्विन के सिद्धांत अनुसार समझे तो मानव, मनुष्यता की और बढ़ने लगा..धीरे-धीरे सभ्य हुआ तथा कबीलों में बंटकर, एक स्थान से दूसरे स्थान के भ्रमण पर निकल नदियों के किनारों पर अपने कबीलों को बसाने लगा और नई-नई खोजों में व्यस्त हो गया..सभ्यताओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया और मानव विकास और उत्पादन की दिशा में बढ़ गया..मिश्र की मैसोपोटामियां सभ्यता, अमरीका की माया सभ्यता..हालांकि हड़प्पा, मोहनजोदडो और सिंधुघाटी की सभ्यता एक ही सभ्यता के अलग-अलग नाम है जिस पर इतिहास के विद्यार्थी आज भी शोध करते रहते हैं.. सिंधुघाटी की सभ्यता के बाद जो नई सभ्यता ने जन्म लिया उस सभ्यता का कोई नाम नहीं है वह कालों के आधार पर जानी जाती है जैसे प्राचीन काल, मध्यकाल और आधुनिक काल..प्राचीन काल को वैज्ञानिक आधार पर आदिकाल-पाषाणकाल को सभ्यताओं के लुप्त हुए और उस सभ्यताओं के मिले अवशेषों के आधार पर ही साक्ष्यों और तर्कों पर तैयार दस्तावेज़ों को आधिकारिक मान्यता दी गई है..मध्यकाल को साक्ष्य सहित लगभग ईसा से पूर्व और ईसा पश्चात, तिथि एवं समय अनुसार सभी दस्तावेज का ऐतिहासिक जिक्र रहा है….

धारावाहिक लेख जारी है
(लेखक-राजनीतिक व सामाजिक चिंतक है)

Ramswaroop Mantri

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