
“संजय कनौजिया की कलम”✍️
“चंद्रशेखर आज़ाद रावण” से उम्मीद की गुंजाइश इसलिए बनती है कि उनके पास अभी जीवन बहुत लम्बा है, और अपनी छोटी उम्र में ही एक पहचान बनाई है..उनमे ऊर्जा है जवानी का जोश है, वे उ०प्र० के जिलों के सभी गाँव-कस्बो और शहरों में दलित बाशिंदों के बीच जिसमे अति-दलित जातियों की बराबर की संख्या भी हो, उनके मध्य जाकर संवाद बना सकते है, लोगों को, खासकर दलित वर्ग को आकर्षित करने का उनमे हुनर है..यदि वे सही दिशा में आगे बड़े और अपनी राजनीतिक शैली में बदलाव लाएं, जिन उद्धघोषों का कोई मतलब ही नहीं “जैसे देखो-देखो कौन आया शेर आया शेर आया” या “गर्व से कहो हम फलाँ हैं” इस बात को समझने की सबसे बड़ी जरुरत है कि ये भारतीय समाज है..ये अपनी पे आ जाए तो बड़े-बड़े शेरों को बकरी भी बना देता है..अतः ऐसे उद्धघोषों से बचें, वैसे भी इन उद्धघोषों से दलित समाज का क्या भला होगा ?..आज का दलित शिक्षित हो चुका है पहले के मुक़ाबले वह अब अपने नेतृत्व से ठोस और बुनयादी संवाद बनाना चाहता है..वह अपने नेतृत्व में शेर सा जानवर देखना नहीं चाहता..वह अपने नेतृत्वकर्ता में अडिग लीडरशिप देखना चाहता है, जो सैद्धांतिक मूल्यों पर बोलता हो, जो प्रबुद्ध वैचारिक आधार पर सम्बोधित करता हो, जो मौलिक और मूलभूत बुनयादी मुद्दों को उठाता हो..आज की इक्कीसवीं सदी के आधुनिक भारत की राजनीति में बड़े पैमाने पर बदलाव हुए हैं..और आम जनमानस की सोच भी आधुनिक हुई है..अब पुराने ढर्रों पर चलकर राजनीति नहीं की जा सकती अच्छे सुलझे विद्वान अनुभवकारी पत्रकारों से ही सम्बन्ध बनाना चाहिए..बे-मतलब के टेलीविजन चैनलों से बचना चाहिए क्योकि ये बे-वजह ही विवादों में फसा डालते है, दलित नेतृत्वकर्ता को तो, कांशीराम की कार्यशैली की गंभीरता अपने अंदर पैदा करनी चाहिए..आदर्शों के नाम लेने से ही सब ठीक नहीं हो जाता, आदर्शों के विचारों को आत्मसात करने से नेतृत्वकर्ता का चरित्र उभरकर आता है, धैर्य रखना चाहिए, कोई जल्दबाज़ी ना करते हुए केवल संगठनात्मक कार्य में 8-10 साल गंभीरता से लगाए तो, वे भारतीय समाज के एक विशेष वर्ग के नेतृत्वकर्ता के रूप में अपने को मजबूती से स्थापित कर सकता हैं, और यह तब ही संभव हो पायेगा, जब दिशा की दशा सकरात्मक होगी..अन्यथा कितने आये कितने गए..”जो पानी का बुलबुला बनकर चलता है, वह कुछ दूरी चलकर फूट जाता है और जो समुन्द्र की लहर बनकर बढ़ता है वह बढ़ता ही चला जाता है”.. इसके लिए उन्हें खूब पढ़ना होगा..डॉ० अंबेडकर को तो खूब पढ़े हीं..लेकिन ठीक उसी तर्ज़ पर पढ़ें जैसे डॉ० अंबेडकर पढ़ा करते थे..में यह नहीं कहना चाहा रहा कि डॉ० अंबेडकर की तरह, वे सब को और सब कुछ पढ़ लें..लेकिन सिर्फ डॉ० अंबेडकर को ही पढ़े और उन्हें ना पढ़े, जिन्होंने डॉ० अंबेडकर को समझा, उन पर बोला, उन पर लिखा, कम से कम उन्हें जरूर पढ़े..जैसे डॉ० राममनोहर लोहिया, जैसे मधु लिमय, जैसे वे समाजवादी चिंतक, लेखक, शोधकर्ता, अध्यनकर्ता, जिन्होंने दलित चिंतकों से भी कही ज्यादा, डॉ० अंबेडकर के महत्व को जरुरी समझते हुए सार्वजनिक किया है..उन धर्मनिरपेक्ष विचारकों को तो जरूर ही पढ़ें, जिन्होंने गांधी और अंबेडकर के ना जाने कितने बिंदुओं पर आपसी सहमति रखने पर प्रकाश डालते हुए दस्तावेज तैयार किये हैं..अज्ञान लोगों ने तो गांधी और अंबेडकर के मध्य दलित वर्ग में ना जाने कितना ज़हर वो डाला..जिसका खामियाजा भी केवल दलित वर्ग ही भुगत रहा है..!
मधु लिमय जी द्वारा लिखित लेख, जिसका शीर्षक है “स्वतंत्रता आंदोलन की विचारधारा” किश्त-57, जो समता मार्ग पोर्टल में, दिनांक-3 जुलाई, 2022 को प्रकाशित हुआ है, उस किश्त के आखिरी पैरा में मधु लिमय लिखते है कि..हम कह सकते हैं कि जो लड़ाई स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान छेड़ी गई थी, वह आज भी जारी है..नि: संदेह आज हरिजन आदिवासी और पिछड़े वर्गों में एक नई चेतना जगी है..उनकी स्थिति में कुछ परिवर्तन भी आया है..लेकिन गांधी जी और डॉ० अंबेडकर जिस विषमता रहित समाज की कल्पना करते थे, वह अभी साकार नहीं हुआ है..इतना ही है कि गांधी के कारण भारत का स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ राजनैतिक ना रहकर आर्थिक और सामाजिक आंदोलन भी बन गया था..उस समय तिलक पक्ष यदि “सामाजिक आंदोलन की बात स्वराज के बाद” की बात नहीं कहता, बल्कि उसी समय दोनों आंदोलन साथ-साथ चलते और उसी तरह जवाहरलाल नेहरू और उनके समाजवादी सहयोगी सिर्फ आर्थिक शोषण में लीन ना रहकर सामाजिक विषमता दूर करने के लिए संघर्ष करते तो मेरा विचार है कि राजनीतिक परिवर्तन के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की गति भी आरम्भ से तेज रहती..उसके उपरान्त भी यह संतोष की बात है कि महात्मा फूले, गांधी जी, डॉ० अंबेडकर, डॉ० लोहिया आदि के प्रयासों से हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की कमिया अशंत: ही सही दूर हुई..डॉ० लोहिया की सप्तक्रांति ऐसे ही विचारों का निचोड़ है..!
“कभी तो जाति का विनाश होगा, कभी तो होगा अधर्म का नाश..कभी तो साकार होगा, अंबेडकर-लोहिया का दर्शन”..हमारे देश की जाति व्यवस्था इतनी जटिल व उलझी हुई है, कि इसके बावजूद भी इस ओर कोई अभियान की सफल रचना आज तलक नहीं रची गई..बुराई की इस अनुचित प्रथाओं पर यूँ तो अनगिनित पुस्तकें लिखी गईं, लेख लिखे गए, भाषण हुए, चर्चाएं चलीं, विद्वानों द्वारा वैज्ञानिक आधार पर चित्र, चल-चित्र का सौजन्य प्राप्त हुआ, गॉंव-गांव, क़स्बे-क़स्बे नाटक, नुक्कड़ नाटक, नौटंकी, कठपुतली, गीत-कविता-रागणी व साहित्य का मंचन होता रहा, लेकिन इसे कोई व्यावहारिक नहीं बना सका..जातिय व्यवस्था के खिलाफ़ जमीन पर उतरकर लड़ने वाले नेता तो दिखे, परन्तु अपने चुनावी लाभ की अभिलाषा ने उन्हें भी जातिय जंजाल के कुचक्र में ही उलझा दिया, जबकि जरुरत नेता की नहीं, “सुधारक” की है..एक काल खंड ऐसा भी था जिसकी विषम-प्रस्थितयों ने जनमानस की मानसिकता इतनी गहरी जकड़ रखी थी कि….
धारावाहिक लेख जारी है
(लेखक-राजनीतिक व सामाजिक चिंतक है)





