दिलीप कुमार पाठक
मेरा अमेरिका का दौरा सेन फ़्रांसिस्को में ख़त्म हुआ. मैं रेड वुड जंगल देखने गया जिसने अमेरिकी कवि रोबोट फ़्रॉस्ट को वो चन्द लाइनें लिखने को प्रेरित किया. जिस को पंडित नेहरू जी ने दोहराया था.
दी वुड्स आर लवली , डार्क एंड डीप
बट आई हैव प्रॉमिसिस टू कीप
एंड मील्स टू गो बिफोर आई स्लीप
एंड मील्स गो बिफोर आई स्लीप
पंडित जी अभी अधरंग की बीमारी से ही उभरे थे, जिस के कारण वे काफ़ी कमजोर हो गये थे. वो बीमारी के बाद पहली बार एक सड़क के किनारे चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे. पंडित जी एक जीप में खड़े थे. अपनी मनपसंद पोशाक पहने हुए हल्के भूरे रंग की शेरवानी और सफ़ेद रंग की खादी की गांधी टोपी जिसको उस वक़्त हर एक कांग्रेसी ने अपने नेता का अनुसरण करते हुए पहनना शुरू कर दिया था. मैं अपनी कार में लोनावाला जा रहा था. मेरा रास्ता पुलिस वालों के साथ साथ उस भीड़ ने रोका हुआ था, जो पंडित जी को सुनने के लिए एकत्रित हुई थी. मैंने अपनी कार रोक दी दिल कर रहा था, कि मैं भीड़ में पंडित जी के पास जाऊँ ताकि वह मुझे पहचान सकें, लेकिन पुलिस वालों की घेराबंदी और मेरे संस्कारों ने मुझे रोका. अपने प्यारे नेता से मिलने के लिए और किसी मौक़े का इंतज़ार करना ठीक समझा.
अंततः यह भेंट नागपुर में हुई, जहां मुझे नेहरू जी से के के मेनन और वाई बी चौहान जो उस समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे,उन्होंने मिलवाया. वहाँ के प्रबंधकों ने कई सौ बड़े-बड़े लोगों को बुलाया हुआ था. मैं पंडित जी के आने से बहुत पहले पहुँच गया था. जब तक पंडित जी नहीं आए थे तब तक मैं आकर्षण का केंद्र था,लेकिन उनके आते ही सारी निगाहें उनकी तरफ़ उठ गई और सारा हाल पंडित नेहरू ज़िन्दाबाद के नारों से गूंज उठा. मैं सीधा हाल के दरवाज़े पर एक गुलाब का ताज़ा फूल ले कर पहुँचा और हाथ जोड़ कर गुलाब का फूल उनकी तरफ़ बढ़ाया. उन्होंने मेरी तरफ़ मुस्कान फेंकते हुए और गुलाब के फूल को न लेते हुए आगे निकल गए, और गुलाब का फूल मेरे हाथ में मुरझाने लगा! शायद पंडित जी ऐसी स्थितियों से दो चार कई बार हो चुके थे. उनके ऊपर लोकप्रियता का नशा था और वह इस का पूरा मज़ा लेते थे.
गुलाब का फूल मेरे हाथ में ही रह गया, लेकिन रात को अधिकारिक तौर पर मुझे उनसे मिलाया गया. वह चौकड़ी मार कर ज़मीन पर बैठे थे. मैंने उन को दिन की बात याद दिलाने की कोशिश की जिस पर वह मुस्कुराए और कहा “हाँ मुझे याद हैं “ इस से पहले कि वो कुछ और कहते जो भीड़ बाहर खड़ी थी वो बैरिकेड तोड़ कर अन्दर आई तो पंडित जी अपने चिर-परिचित बैटन को लेकर भीड़ को डाँटने लगे. एक दो को तो उन्होंने अपने बैटन से मार भी दिया,डांटते हुए हँस पड़े. वह अक्सर ऐसा किया करते थे. लोग उनके इस अन्दाज़ को खूब पसंद भी करते थे. भीड़ को शांत करने के बाद वह फिर चौकड़ी मार कर अपनी कोहनियों को अपनी जाँघों पर रखते हुए अपनी ठोड़ी को अपनी दोनों हथेलियों में लेकर बैठ गए. ऐसा लगता था कि वह अपने लिए जनता का पागलपन को पसंद करते थे, और हमेशा इसी नशे में रहते थे.
मेरी उन से अख़िर मुलाक़ात गर्मजोशी और निजता से भरपूर थी. फ़िल्म जगत ने प्रधानमंत्री फंड के लिये एक शो किया और पंडित जी भी वहीं थे. पण्डित जी उस वक़्त गम्भीर हो गये जब लता जी ने “ ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुर्बानी” यह गीत नेहरू जी का पसंदीदा गीत था. लता जी भी अपने सारे प्रोग्राम इसी गीत से शुरू करती थी. वैसे भी यह गीत देश भक्ति से ओतप्रोत हैं. प्रोग्राम के बाद उस समय की मशहूर तिकड़ी की मुलाक़ात जो काफ़ी निजी थी, पंडित जी से हुई. तिकड़ी से मेरा मतलब दिलीप साहब, राजकपूर जी देवानंद यानि मैं, हमें तीन मूर्ति भवन की तरफ़ सेना के मोटरसाइकिलों के साथ हमारी ‘लिमोजीन’ कार पहुँची. पंडित जी की बेटी इन्द्रा जी ने हमारी रहनुमाई की उस वक़्त इन्दिरा जी घरेलू और शर्मीली थी.
तो मैं बात कर रहा था, हमारी तिकड़ी की पंडित जी से मुलाक़ात की इन्द्रा जी ने हमारी ख़ातिरदारी में ख़ास क़िस्म की चाय पिलाई. उसके बाद हमें नेहरू जी के कमरे में ले ज़ाया गया, पंडित जी जैसे मैंने पहले बताया दिल के आघात से अभी उभरे ही थे, काफ़ी कमजोर नज़र आ रहे थे, लेकिन हमारे पहुँचते ही उन्होंने हम तीनों को अपनी बाँहों में भर लिया,फिर शुरू हुई एक अच्छी ख़ासी मुलाक़ात जल्द ही वो अपने मूड में आ गए. हमें अपने क़िस्से सुनाने लगे और हम भी किसी छोटे बच्चे की तरह जो अपने दादा जी से दिल लगा कर कहानियाँ सुनता है, वैसे ही हम उनके क़िस्सों में दिलचस्पी ले रहे थे. वह बच्चों की तरह हमें वो सब स्मृतियों दिखा रहे थे, जो उन को समय समय पर विदेशों के दौरे पर बतौर सम्मान के तौर पर दी गयी थी. मुझे ऐसा लग रहा था कि वह उस समय अपने ऊपर सारे बोझ हटा कर स्वतंत्र होना चाहते थे. जल्द ही हम सब उनके साथ बेतकल्लुफ़ हो गये. अचानक राजकपूर ने पूछ लिया “ हम ने सुना है आप जहां भी जाते थे या जाते हैं वहाँ की औरतें आप की दीवानी हो जाती हैं. ” उन्होंने इस बात को यह कह कर टाल दिया कि “ इतनी नहीं जितनी आप लोगों की दीवानी होती हैं “ ख़ासकर देवानंद की दीवानगी देखो मैं भी महसूस करता हूँ, कहते हुए पण्डित जी मुस्करा पड़े. मैंने देखा की इस उम्र में भी उन की मुस्कान जानलेवा थी. मुझ से रहा नहीं गया और मैंने पूछ लिया “ मैंने सुना है आप की मुस्कान ने लेडी माउंटबैटन का दिल चुरा लिया था, क्या यह सच हैं? ” वह शरम के मारे लाल हो गये और मेरे सवाल का मज़ा उठाते हंसते हुए बोले “ मैं अपने बारे में इस क़िस्म की बातों को पसंद करता हूँ. ” साथ में ही दिलीप ने शिगूफ़ा छोड़ दिया “ पर मैंने सुना हैं यह बात तो लेडी माउंट बैटन ने खुद क़बूली हैं, कि आप उनकी कमजोरी थे. “ वह फिर हंसे और कहा “हाँ लोगों ने मुझे भी इन बातों पर विश्वास करने को विवश कर दिया हैं. ” लेकिन मेरे विषय में लोग ऐसी बातेँ करते हैं तो मैं भी मज़ा लेते हुए खुश होता हूँ. हम पण्डित जी की शख्सियत का ठहराव, धैर्य, उससे भी ज्यादा सहनशीलता के कायल हो रहे थे, पण्डित जी के बारे में जितना सुना, पढ़ा था, उससे कहीं अधिक हमने उनको पाया.
मैंने आसपास देखा तो मुझे उनकी वह कुर्सी नज़र आई जिस पर बैठ कर वह बड़े बड़े निर्णय लेते थे. मैंने पूछा “ पंडित जी क्या यह वही कुर्सी हैं, जिस पर बैठ कर आप देश को निर्देशन देते हैं. “उन्होंने हंसते हुए कहा “ जाओ बैठ कर खुद देख लो. ” पंडित जी के करिश्मे ने हमें आश्चर्यचकित कर दिया. हम उनके साथ बहुत खुश थे. मैं साफ़ तौर पे देख रहा था कि उनके चेहरे पर छुपीं हुई सी एक उदासी थी, जो उनके आसपास होने वाली निराशा को झलका रही थी. वह नेता जिस ने अपनी शोहरत का शिखर देखा था, वह उन बात को छिपा नहीं पा रहा था, कि उसका ज़िन्दगी का सफ़र ख़त्म होने वाला हैं. जबकि बार बार उनकी हंसी में एक उदासी की झलक छोड़ जाती थी. आख़िरकार हम तीनों की यादगार मुलाकात जो हम तीनों के लिए वह पण्डित जी के द्वारा मिला ज्ञान मार्गदर्शन हमारे लिए आजीवन पूंजी था. हम तीनों न चाहते हुए भी जब उनसे विदा ले रहे थे, चूंकि समय की अपनी मर्यादा थी,हम परस्पर तीनों एक – दूसरे से बातेँ कर रहे थे, कि हम कितने देशों के पीएम, प्रेसिडेंट आदि से मिले हैं, पण्डित जी वाकई कोहिनूर हैं. दिलीप कुमार कहता है कि यार हम सब समझते हैं कि लोगों में हमारा एक आकर्षण है, लेकिन हम पण्डित जी की करिश्माई शख्सियत के तिलिस्म से बाहर नहीं आ पा रहे हैं. तरह – तरह की बातेँ कर रहे थे. सब यादगार था.
आख़िरकार वह समय भी जल्दी आ गया उस वक़्त मैं अमेरिका में था तो मुझे ख़बर मिली कि प्रधानमंत्री पंडित नेहरू जी नहीं रहे. मैं उदासी के गहरे सागर में डूब गया. मैंने इन्द्रा जी को अफ़सोस का तार भेजा जिन को उस वक़्त लोग गूँगी गुड़िया कहते थे.
जी हाँ उस समय इन्द्रा जी को लोग गूँगी गुड़िया कहते थे, लेकिन आने वाले समय में वह भारत की आइरन लेडी बनने वाली थी. मैंने अमेरिका से वापस आकर हिन्दी गाइड को अन्तिम रूप रेखा देना शुरू कर दिया. इसके साथ साथ मैं फ़िल्म तीन देवियाँ पर भी काम कर रहा था. मैं तीन देवियाँ का लेखक और निर्देशक दोनों था,लेकिन यह काम मैंने अमरजीत को दिया हुआ था, जो नवकेतन फ़िल्म कंपनी में प्रचारक के तौर पर काम करता था. तीन देवियाँ फ़िल्म बनाते समय मुझे ख़बर मिली कि मेरे पिता जी नहीं रहे. कहा जाता हैं कि वह अपने फार्म हाउस में थे. कि अचानक उन्हें अंगूर खाने की तलब उठी और उन्होंने नौकरानी को अंगूर लेने भेजा जब वह अंगूर ले कर वापस आई वह अपने प्राण त्याग चुके थे. इस खबर ने मुझे सकते में ला दिया मैंने शूटिंग बन्द की एक अकेले कमरे में चला गया. मैंने अपनी आँखें बंद कर ली मैं अपने पिता जी को देखना चाहता था. बन्द आँखों में वो मुझे नज़र आए वैसे ही जैसे मैंने उनको अपनी छोटी बहन की शादी में देखा था.पगड़ी डाले हुए और महँगी सिगरेट को अपनी उँगलियों के पोरों में दबाए हुए और लम्बे लम्बे कश खींचते हुए अपने बेटे की शोहरत को देखते हुए, मैंने उस वक़्त भी उनको बम्बई में रहने को कहा था पर उनको तो अपने घर से लगाव था. मेरी आँखों से आँसू टपक पड़े और दिल ही दिल में मैं बार बार कह रहा था “ पिता जी आप मुझे बहुत याद आ रहे हो आप मुझे बिन बताए छोड़ कर ऐसे कैसे चले गए और मैं काफ़ी देर तक रोता रहा.
पिता जी को गुज़रे जाने के कुछ दिनों बाद मैं शूटिंग में मशगूल था, कि कोई अन्दर आया और उसने मेरे कान में कहा कि गुरूदत नहीं रहे. लाइट्स जल रही थी, हर कोई मेरा इन्तज़ार कर रहा था. कि मैंने ऊँची आवाज़ में कहा पैक अप गुरूदत जी हमारे बीच नहीं रहे. पिछली ही शाम हम दोनों एक दूसरे से मिले और उन्होंने मुझसे एक और फ़िल्म साथ साथ करने के लिए कहा था. जिस पर मैंने हामी भर दी थी. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था, कि. मेरा यार गुरुदत्त हमें छोड़ कर जा चुका हैं. शायद उस के कमरे में पहुँचने वाला पहला आदमी मैं ही था. उस का चेहरा नीला पड़ चुका था, शायद उस नीले पदार्थ के कारण जो अब भी मेज़ पर गिलास में पड़ा था, जो गुरूदत ने पी लिया था. मैंने एक बेहतरीन दोस्त को खो दिया था. जो सारे फ़िल्म जगत में मेरे दिल के क़रीब था. और जिसे में कभी भूला नहीं पाऊँगा,गुरुदत्त अगर पूरी ज़िन्दगी अगर जीते तो शायद हिन्दी सिनेमा में गुरुदत्त साहब मेरा दोस्त उसके इर्द – इर्द शायद दूसरा कोई नहीं होता वैसे तो मेरा दोस्त आज भी अमरत्व प्राप्त कर चुका है, लेकिन ये तो दुनियावी बातेँ हैं मैं अपने दोस्त को कहां से लाऊँ, वॊ आज भी शिद्दत से याद आता है. जीवन के प्रत्येक पल जब एकांत होता हूँ तो गुरुदत्त की करिश्माई शख्सियत एवं उसका बौध्दिक चेहरा मेरे जेहन में झूलता रहता है, हमेशा शॉट देते हुए गुरुदत्त याद आता है, वो मेरे लिए केवल एक दोस्त नहीं था सच कहूँ तो मेरी जान था…..
मेरी ज़िन्दगी में मैं सबसे ज्यादा दुःखी था, और रोया भी था, मैं लाइफ में बहुत कम ही रोया होऊँगा उनको उँगलियों में गिना जा सकता है. एक तो मेरे पिता जी का जाना, दूसरा करिश्माई शख्सियत पण्डित नेहरू जी का दुनिया से रुख़सती, तीसरा मेरा यार गुरुदत्त साहब उसके जाने की कमी हमेशा खली.
यूँ तो देव साहब की आत्मकथा कभी न कभी पढ़ता रहता हूं, विशेषकर पण्डित नेहरू जी गुरुदत्त साहब देव साहब के तिलिस्म से बाहर आ नहीं पाता हूं आज देव साहब की आत्मकथा ‘रोमांसिंग विथ लाइफ ‘ का एक एक शब्द पेज इंट्रेस्टिंग है, लेकिन जैसे ही हिन्दी सिनेमा की तिकड़ी, देव – राज – दिलीप की बात आती है रोमांचित हो उठता हूं. और बात महानतम पण्डित नेहरू जी, गुरुदत्त साहब, देव साहब का जिक्र होता है तो मैं न जाने किस आनन्द का अनुभव करने लगता हूँ. अध्याय पलटते हुए ऐसा लगता है, कि मैं भी यह सब जी रहा हूँ, और आँखों से देख रहा हूँ ……. मेरे पसंदीदा हीरो देव साहब का जन्मदिन है यूँ तो रोज़ याद आते हैं आज तो एक खुमारी में हूँ.
लव यू देव साहब ![]()
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