अग्नि आलोक
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आत्मबल के साथ संवाद ही हल?

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शशिकांत गुप्ते

संवाद ही एक मात्र हल है, किसी भी विवाद का। संवादहीनता किसी तरह की हिंसा को रोक नहीं सकती है।
अनेकता में एकता यही तो अपने देश भारत की विशेषता है।
यह सुवाक्य पढ़ने सुनने तो बहुत अच्छा लगता है,लेकिन हिंसा का कारण गुलदस्ते में कुछ विघ्नसंतोषी फूलों के साथ काटें भी रख देते हैं। काटें रखने से फूलों में दूसरे के साथ द्वेष पैदा होता है।
यही द्वेष वैमनस्यता में बदल जाता है। कमोबेश मणिपुर यही तो हो रहा है।
गांधीजी तो सांप्रदायिक विद्वेष को मिटाने के लिए बगैर सुरक्षा के नोआखली गए थे। गांधीजी की कथनी करनी में अंतर नहीं था।
गांधीजी संवाद करने में विश्वास रखते थे।
संवाद करना मतलब जीवंत संपर्क स्थापित करना। दुर्भाग्य आज सिर्फ वाकपटुता ही दिखाई दे रही है।
उक्त मुद्दे के संदर्भ में प्रख्यात कवि,बाल कवि बैरागी की रचना का स्मरण होता है।
हर पीढ़ी को पूरा हक़ है,अपने सपन सजाने का
अंगारों को पूरा हक़ है,जलने और जलाने का
बेशक आग लगाओ रे अंगारों मावस के गलियारों में
देखो आग लगा मत देना पूनम के पखवारों में

दुर्भाग्य से आज वैमनस्यता को हवा दी जा रही है। इसे ही कहते हैं पूनम के पखवारे में आग लगाना?
बाल कवि की कविता की प्रस्तुत पंक्तियां आज की समस्या पर प्रश्न उपस्थित करती है।
माली को परखा जाता है,बे मौसम पतखारों में
उस माली को माफी मत दो,जिसने गंध चुराई हो
जिसके होते हर क्यारी में नागफनी उग आई हो
नैतिक युद्ध नहीं होते है नारों और हथियारों से
ऐसे युद्ध लड़े जाते हैं,चारित्रिक आधारों से

जो लोग सौहाद्र के पक्षधर होते हैं,उनके लिए शायर बिस्मिल सईद का यह शेर प्रासंगिक है।
हम ने काँटों को भी नरमी से छुआ है अक्सर
नफरत के समर्थकों के लिए शेर का अगला मिसरा है।
लोग बेदर्द हैं फूलों को मसल देते हैं

अंत में मुल्क के रहबरो से यही अपील है।
बाबा मन की आंखे खोल
ज्ञान तराजू लेके हाथ में
तोल सके तो तोल

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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