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….देश में चोरी-छुपे तानाशाही का प्रवेश हो रहा है….चुनाव प्रणाली को विस्मृत करना पड़ेगा?

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ओमप्रकाश मेहता

अपने एकादश शासनकाल वर्ष में प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के तैवर बहुत कुछ बदले-बदले नजर आ रहे है, पिछले एक दशक के शासनकाल में जब वे पूर्ण बहुमत के साथ सत्तारूढ़ थे, तब उनके ऐसे तैवर नजर नही आए, जो अब उनके बैसाखी के सहारे चलने वाले तीसरे कार्यकाल के दौरान नजर आ रहे है। अब उनकी नजर संवैधानिक रूप से स्वतंत्र रूप से कार्यरत संगठनों पर है, संसद के दोनों सदनों पर तो उनका कब्जा है ही, अब वे चुनाव आयोग और न्याय पालिका जैसे संवैधानिक रूप से स्वतंत्र संगठनों पर कब्जा करना चाहते है, जिसे तानाशाही शासन का पहला कदम कहा जा सकता है, हमारी मौजूदा चुनाव प्रणाली पर इसलिए उंगलियां उठाई जाने लगी है, कभी मतपत्र विधि से फिर से चुनाव प्रक्रिया शुरू करने की मांग की जा रही है, तो कभी इलेक्ट्रिनिक मतदान मशीनो को लेकर नए-नए सवाल उठाए जा रहे है और हर चुनाव हारने वाला राजनीतिक दल चुनाव प्रक्रिया पर ही विभिन्न संवैधानिक या कथित असंवैधानिक सवाल उठा रहे है, चुनाव हारने वाले दल के निशाने पर ये चुनाव मशीनें ही होती है और फिर से मतपत्र विधि शुरू करने की मांग की जाती है।
आज यदि इस हिसाब से यह कहा जाए कि हमारी चुनाव प्रणाली भी राजनीति का एक हिस्सा बनती जा रही है, तो कतई गलत नही होगा और इस प्रणाली को लेकर कई तरह के नए-नए सवाल उठाए जा रहे है। ऐसी स्थिति में यदि कुल मिलाकर यह कहा जाए कि मोदी सरकार के कब्जे की पहल में यदि चुनाव आयोग ही है तो कतई गलत नही होगा।
यहां यह एक विचारणीय चिंताजनक सवाल है कि जब मोदी जी पिछले दशक में स्वयं के बल पर पूर्ण बहुमत में थे, तब इस तरह के प्रयास उनके द्वारा नही किए गए तो क्या अब वे सहयोगी दलों के दबाव में यह सब करने को मजबूर है? या उनकी भावी राजनीति ही यह एक झलक है? क्योंकि संवैधानिक संस्थानों में चुनाव आयोग व न्याय पालिका जैसे संगठन तथा कुछ अन्य संगठन ही मोदी के वर्चस्व से बाहर रहे है, यदि चुनाव आयोग व न्याय पालिका जैसे स्वतंत्र संवैधानिक संगठनों पर भी मोदी जी ने कब्जा कर लिया तो फिर इस सरकार को ‘तानाशाही’ के दायरे से बाहर कैसे रखा जा सकेगा। इस दृष्टि से मोदी जी का यह तीसरा शासनकाल काफी सूक्ष्म दृष्टि से देखा-परखा जा रहा है, क्योकि आज भारत का हर बुद्धिजीवी नागरिक यह महसूस अवश्य करने लगा है कि देश में चोरी-छुपे तानाशाही का प्रवेश हो अवश्य रहा है और यदि वह इस तीसरे कार्यकाल में आ गई तो फिर देश को चुनाव प्रणाली को विस्मृत करना पड़ेगा और नए माहौल में जीने का ‘गुर’ सीखना पड़ेगा, यही आज की मौजूदा चेतावनी है।

Ramswaroop Mantri

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