श्याम सिंह रावत
सामान्यतः देखा जाता है कि तानाशाह स्वभावत: वर्चस्ववादी व्यक्ति होता है जो स्वयं को प्रतिष्ठापित और शक्तिशाली बनाने के लिए हरसंभव उपाय करता है। यदि वह सत्ता पर काबिज़ हो तो लोकतांत्रिक, सामाजिक तथा राजनीतिक मूल्यों और सांस्कृतिक परंपराओं को ध्वस्त करता है। जनता के साथ अत्याचार करता है।
एक तानाशाह अपने आसपास अपनी ही विचारधारा के लोगों को इकट्ठा करके उन्हें पूरी ताक़त से नियंत्रित करता है। भय और भेद उसके मुख्य हथियार होते हैं जिससे उसके निकटस्थ लोग सबसे ज्यादा पीड़ित रहते हैं और वे आपस में एक-दूसरे को शंका की दृष्टि से देखते हैं।
हर तानाशाह संविधान के साथ छेड़-छाड़ करता है या उसे निलंबित कर देता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को ध्वस्त करके मनमानी करता है। उसका मुख्य लक्ष्य होता है अपनी सत्ता को बनाए रखना, चाहे उसके लिए उसे कुछ भी क्यों न करना पड़े। जनता को धोखा देना और लगातार झूठ बोलकर भ्रमित करना उसकी कार्यशैली होती है।
वह अपने समर्थकों को पद, धन और संपत्ति का प्रलोभन देकर उनके समर्थन के बदले में उन्हें अनधिकृत लाभ पहुँचाता है। जिससे भ्रष्टाचार, लूट-खसोट और जनविरोधी काम करने वाले तत्व आसानी से उसके साथ आ मिलते हैं। तानाशाह भ्रष्टाचारियों, लुटेरों तथा अपराधियों; यहाँ तक कि आतंकवादियों को भी अपनी पार्टी में शामिल करने से नहीं कतराता।
तानाशाह शासन-प्रशासन में गलत लोगों को भर्ती करके उनका इस्तेमाल देश विरोधी गतिविधियों में करता है। वह देश के संसाधन अपने दोस्तों और समर्थक व्यापारियों को सौंप देता है; बदले में, व्यवसायी उसे सत्ता में बने रहने में सहायता करते हैं। एक तानाशाह देश के प्रशासनिक तंत्र, न्यायपालिका, मीडिया, सेना और पुलिस में अपने लोगों को घुसाता है और फिर अपने निजी लाभ के लिए उनका इस्तेमाल करता है।
चूँकि हर तानाशाह स्वभावत: क्रूर और निर्दयी होता है तो वह निष्कंटक राज करने के लिए असहमतों, आलोचकों और विरोधियों को जेल भिजवा देता है या उनकी हत्या करवा देता है।
तानाशाह जाति व धर्म का वितंडावाद खड़ा करके देश की पारस्परिक एकता और सौहार्द्र को ध्वस्त कर देता है। लोगों के बीच बैर-भाव को बढ़ावा देता है। उसका शासन लोकतांत्रिक मूल्यों और सिद्धांतों के खिलाफ होता है और उसे विनाश की ओर ले जाता है।
अमेरिकी लेखक और विचारक लॉरेंस डब्ल्यू. ब्रिट का एक लेख ‘फ्री इंक्वायरी’ पत्रिका में वर्ष 2003 में प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्होंने फासीवाद के 14 लक्षणों का उल्लेख किया था। चूँकि फासीवाद तानाशाही का एक प्रमुख रूप माना जाता है तो उन्होंने विश्व-इतिहास की विभिन्न तानाशाहियों/फासीवादी सरकारों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए इन्हें सूत्रबद्ध किया था—
1- शक्तिशाली और निरंतर राष्ट्रवाद —फासीवादी शासन देशभक्ति के नारों, प्रतीकों, गीतों और झंडों का लगातार उपयोग करते हैं। झंडे हर जगह दिखाई देते हैं और सार्वजनिक प्रदर्शनों में इनका भरपूर इस्तेमाल होता है।
2-न्यायपालिका एवं विधि-व्यवस्था पर नियंत्रण —न्यायालयों में भ्रष्ट और अपने समर्थकों को जज नियुक्त किया जाता है जो सत्ताधारी वर्ग के नजरिए से फैसला करते हैं।
3- मानवाधिकारों की उपेक्षा —दुश्मनों के भय और सुरक्षा की आवश्यकता के कारण, लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि कुछ मामलों में मानवाधिकारों की अनदेखी की जा सकती है। यातनाएँ, हत्याएँ और लंबी कैद को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है।
4- शत्रुओं/बलि के बकरों की पहचान एक एकीकृत कारण के रूप में —लोगों को एक सामान्य खतरे (जैसे नस्लीय, धार्मिक अल्पसंख्यक, उदारवादी या आतंकवादी) को समाप्त करने के लिए एकजुट किया जाता है, जिससे देशभक्ति की उन्मादपूर्ण लहर पैदा होती है।
5- राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य सर्वोच्चता के प्रति जुनून —जनता में राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना भरने के लिए विदेशी शक्तियों के भय का उपयोग किया जाता है। राष्ट्रवाद की आड़ में घरेलू समस्याओं के बावजूद, सैन्य शक्ति को असमान रूप से अधिक धन आवंटित किया जाता है और घरेलू मुद्दों को नजरअंदाज किया जाता है। सैनिकों और सैन्य सेवा को गौरवान्वित किया जाता है।
6- नियंत्रित जनमीडिया —प्राय: मीडिया सीधे-सीधे सत्ता द्वारा नियंत्रित होता है लेकिन कभी-कभी अपना चेहरा उदार प्रदर्शित करने के लिए अप्रत्यक्ष प्रवक्ताओं को हल्की-फुल्की छूट दे दी जाती है। युद्धकाल में सेंसरशिप और गोपनीयता आम है।
7- व्यापक लिंगवाद —फासीवादी राष्ट्रों की सरकारें लगभग पूरी तरह पुरुष-प्रधान होती हैं। लिंग, नस्ल या अन्य सामाजिक समूहों पर आपराधिक नियंत्रण यानी लैंगिक/जातीय दमन किया जाता है।
8- धर्म और सरकार का अंतर्संबंध —सत्ता सबसे सामान्य धर्म का उपयोग जनमत को प्रभावित करने के लिए करती है। धार्मिक वाक्यांशों का इस्तेमाल आम है, भले ही वे नीतियों के विपरीत हों।
9- कॉर्पोरेट शक्ति की रक्षा —औद्योगिक और व्यापारिक अभिजात वर्ग ही अक्सर तानाशाह को सत्ता में लाते हैं, जिससे एक पारस्परिक लाभकारी व्यवस्था बनती है।
10- श्रम शक्ति का दमन —श्रमिक संगठनों को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाता है या कठोरता से दबाया जाता है, क्योंकि वे फासीवादी सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा होते हैं।
11- बुद्धिजीवियों और कला के प्रति तिरस्कार —बौद्धिकता, कला और शिक्षा पर आक्रमण, स्वतंत्र विमर्श का दमन। अकादमिक लोगों के प्रति शत्रुता को खुलेआम बढ़ावा दिया जाता है। प्रोफेसरों और बुद्धिजीवियों को सेंसर किया जाता है या गिरफ्तार किया जाता है। कला को वित्तीय सहायता से वंचित रखा जाता है।
12- अपराध और दंड के प्रति जुनून —पुलिस को कानून लागू करने के लिए लगभग असीमित शक्तियाँ दी जाती हैं। लोग पुलिस के दुरुपयोग को नजरअंदाज कर देते हैं और नागरिक स्वतंत्रताओं का त्याग कर देते हैं।
13- व्यापक भ्रष्टाचार और पक्षपात —फासीवादी शासन मित्रों और सहयोगियों के समूह द्वारा संचालित होते हैं, जो एक-दूसरे को पद देते हैं और सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग करते हैं।
14- धोखाधड़ीपूर्ण चुनाव —चुनाव प्रायः दिखावटी और विपक्षी उम्मीदवारों के खिलाफ बदनामी, हत्या, मीडिया हेरफेर या न्यायिक हस्तक्षेप से प्रभावित होते हैं।
तानाशाही विनाशकारी होती है क्योंकि यह नागरिक स्वतंत्रता, न्याय, समानता और विकास के मूल्यों का उल्लंघन करती है। तानाशाही राज्य में लोगों के अधिकारों की उपेक्षा की जाती है और समाज में अन्याय तथा असहिष्णुता की भावना फैलती है। इसके परिणामस्वरूप ऐसे राज्यों में अक्सर सामाजिक अस्थिरता, असंतोष, आतंकवाद और युद्धोन्माद फैल जाता है।
ये लक्षण लोकतांत्रिक संस्थाओं और जन-स्वराज्य के लिए प्रतिकूल और खतरनाक माने जाते हैं। अतः तानाशाही राजनीति का विनाशकारी प्रभाव होता है, जो समाज को आघात पहुँचाता है और उसे प्रगति तथा समृद्धि से वंचित करता है।
इस तरह तानाशाही अत्याचारों से प्रभावित और बर्बाद हो गए देशों के अनेक उदाहरण हैं।





