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डगमगाते डगों से नपती नहीं डगर

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अंदर की बात : कोरोना संक्रमण में सैनिटाइजर के उपयोग की सलाह ने ‘पीने वालों’ को बड़ा बहाना दे दिया। वे शरीर को बाहर से ही नहीं, अंदर से भी सैनिटाइज करने में ऐसे जुटे कि उबर ही नहीं पा रहे हैं। बात संस्थाओं के चुनाव से जुड़े एक अधिकारी की हो रही है। साहब सालभर से दफ्तर नहीं पहुंचे और कारण है डगमगाते कदम। दरअसल, साहब पूरे समय ‘सैनिटाइज’ रहते हैं। इसलिए चलना मुश्किल होता है। ऐसा भी नहीं कि साहब कभी दफ्तर गए ही नहीं। उन्होंने दो-चार बार दफ्तर जाने की कोशिश की है, पर लड़खड़ाते कदमों ने दूसरे माले तक ले जाने से इन्कार कर दिया। फिर क्या करते, कोरोना काल में जान बचाना ज्यादा जरूरी है। ऐसे में साहब ने सैर की बजाय दफ्तर के ही हाथ जोड़ लिए। अब साहब की मजबूरी कोई थोड़े ही समझता है। उनकी बात निकलते ही, उन्हीं के दफ्तर के लोग छींटाकशी शुरू कर देते हैं।

बॉस से आगे चल रही परछाई एक अधिकारी की परछाई (बेटे) ने सरकारी कामकाज में दखल देकर कर्मचारियों को नाराज कर रखा है। बात प्रदेश के एक टाइगर रिजर्व की हो रही है, जिसमें पिता के साथ रहता बेटा उनका साया बनकर अलग से सत्ता चलाने की कोशिश कर रहा है। बॉस के दुलारे बेटे ने दो गाड़ियों पर कब्जा कर लिया है, जिन्हें लेकर वह कभी भी-कहीं भी निकल पड़ता है। अब पार्क में निकलेगा, तो कर्मचारियों को निर्देश भी देगा और नहीं मानने वालों पर वज्रपात भी होगा। इस परिस्थिति ने पार्क के कर्मचारियों को तो नाराज किया है, आसपास के कुछ होटल संचालक भी नाराज नजर आ रहे हैं और बॉस हैं कि पुत्र मोह में उनके खिलाफ अंदर ही अंदर उबल रहे लावा को महसूस नहीं कर पा रहे हैं। खैर, परिणाम का वक्त भी अब ज्यादा दूर नहीं है। लावा किसी भी दिन बाहर आ जाएगा और बॉस को नुकसान सहना पड़ेगा।

आदतें ऐसी हैं कि जाती नहीं

लंबे समय मैदानी पदस्थापना में रहे एक अधिकारी को लॉन में बैठकर गप मारने की ऐसी आदत पड़ी है कि बदली परिस्थितियों में भी नहीं जा रही है। अधिकारी पदोन्‍नत होकर राजधानी स्थित अपने मुख्यालय आ गए हैं। अब मुख्यालय में उतनी सुविधाएं तो मिलने से रहीं, जो जिले में रहकर मिल जाया करती हैं। यहां तो उनसे वरिष्ठ बैठे हैं। इसलिए चपरासी भी कम ही भाव देता है। अधिकारी ने भी आदत बदलने की भरपूर कोशिश की, पर आदत नहीं बदली, तो अपने कक्ष की खिड़की तोड़कर भवन की छत पर ही आर्टिफिशियल लॉन तैयार कर लिया। अब सर्दियों में तो अधिकारी और उनके दोस्त अधिकारियों ने इस लॉन में बैठकर खूब चाय की चुस्कियां ली हैं, पर गर्मी ने एक बार फिर जिलों में मिले लॉन की याद दिला दी। जनाब, छत पर लॉन तो बना सकते हो, पर पेड़ों की छांव और चिड़ियों का कलरव कहां से लाओगे।

जंगल में ‘सैन्य विद्रोह’

मनमानी हमेशा नहीं चलती है। कभी-कभी झुकना भी पड़ता है और जो झुकते नहीं हैं, उन्हें कड़े विद्रोह का सामना करना पड़ता है। इन्हीं हालातों से इन दिनों शहडोल वन वृत्त गुजर रहा है। यहां एक वरिष्ठ वन अधिकारी की मनमानी के खिलाफ वनरक्षकों ने विद्रोह कर दिया है। शिकवा-शिकायतों से जब काम नहीं चला तो कर्मचारी असहयोग आंदोलन पर उतर आए हैं और ताल ठोंककर अधिकारी को बता दिया है कि मनमानी नहीं चलेगी। फिर भी अधिकारी नहीं माने, तो एक कर्मचारी ने आत्मदाह की चेतावनी दे डाली। धीरे-धीरे हाथ से निकलती स्थिति को संभालने की सारी कोशिशें बेकार हो चुकी हैं। वैसे जिस अधिकारी को लेकर यह बखेड़ा खड़ा हुआ है, वे तानाशाही के लिए पहले से बदनाम हैं। वरिष्ठ अधिकारी भी उनके बारे में अच्छी राय नहीं रखते। अब देखना है कि जंगल में शुरू हुए ‘सैन्य विद्रोह’ के मामले में आला अफसर किसके साथ खड़े होते हैं।

Ramswaroop Mantri

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