डॉ. विकास मानव
वो कहती हैं, उन्हें एक मर्द चाहिए, लेकिन क्या उन्हें सच में पता है कि मर्द का मतलब क्या होता है?
आज के समय में, कई महिलाएं खुद को “एक असली मर्द” के काबिल मानती हैं। वे कहती हैं कि उन्हें ऐसा कोई चाहिए जो समग्रत: तृप्त करे, उन्हें संभाले, नेतृत्व करे, सुरक्षा दे, और साथ ही संवेदनशील भी हो।
सवाल ये है क्या वो तैयार हैं उस पुरुष के लिए, जो सच में एक उद्देश्य के साथ जीता है? जो केवल एक साथी नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व उठाने वाला, कंधों पर बोझ ढोने वाला, और विरासत रचने वाला पुरुष है?
दरअसल, बहुत सी महिलाएं मर्द नहीं चाहतीं उन्हें उसका प्रतीक चाहिए। कभी वो एक बैंक की तरह व्यवहार चाहती हैं, कभी भावनात्मक सहारा जैसे थेरेपिस्ट, और कभी एक सजावटी पहचान जिसे वो अपने सोशल मीडिया पर “राजा” कह सकें। लेकिन राजा के साथ रहना आसान नहीं होता। असली मर्द, शांति देता है और शांति के साथ आती है जिम्मेदारी। आत्म-मंथन। ये सब हर किसी के बस की बात नहीं।
कुछ महिलाएं उस पुरुष से तब डर जाती हैं, जब वो नेतृत्व करता है। क्योंकि उन्हें लगा था कि मर्दानगी का मतलब केवल कंधे चौड़े होना और आवाज भारी होना है। लेकिन जब वो देखती हैं कि नेतृत्व के साथ अनुशासन भी आता है, तब उनकी आज़ादी की परिभाषा कांपने लगती है।
कुछ महिलाएं बराबरी के नाम पर लड़ाई का मैदान बना देती हैं। उन्हें साथी नहीं, मुकाबला चाहिए। हर निर्णय पर सवाल, हर राह पर टकराव। और जब रिश्ता टूटता है, तो आरोप लगता है “तुम मुझे सहन नहीं कर पाए।” पर असल में, वो रिश्ता था ही नहीं वो तो मुकाबले का अखाड़ा बन गया था।
कुछ ऐसी भी होती हैं, जो बस चाहती हैं कि कोई उन्हें बचा ले। जैसे कोई राजकुमार आए, और उनके सारे दर्द, सारी ज़िम्मेदारियाँ खुद उठा ले। लेकिन जब वही राजकुमार थकता है, गिरता है, तो वो पूछती हैं “तुम बदल गए?” नहीं। वो बदला नहीं। वो बस थक गया दो जिंदगियाँ जीते-जीते। पर हर जगह ऐसी महिलाएं नहीं होतीं।
कुछ हैं कम बोलने वालीं, लेकिन बहुत कुछ समझने वालीं।
वो जो पुरुष को केवल प्रेमी नहीं, एक दायित्व समझती हैं।
जो जानती हैं कि नेतृत्व करना कोई शान की बात नहीं, बल्कि त्याग का रूप है। वो साथ देती हैं, पर पीछा नहीं करतीं। वो सवाल नहीं उठातीं, पर संकट में कंधे से कंधा मिलाती हैं।
उनके लिए मर्दानगी कोई तमाशा नहीं, एक पुकार है जिसे उन्होंने भी उतनी ही विनम्रता से स्वीकार किया है। वो दिखावे में नहीं होतीं, न सोशल मीडिया पर शोर मचाती हैं। जब कोई पुरुष अपने जीवन का मकसद लेकर चलता है तो वही महिला उसके जीवन की सबसे बड़ी ताक़त बनती है।
बात सीधी है :
बहुत सी महिलाएं असली मर्द की चाह रखती हैं, पर बहुत कम होती हैं जो ऐसे मर्द को समझती हैं। अक्सर महिलाएं सटिस्फैक्शन नहीं पाने का रोना रोती हैं, खुद की हॉटेस्ट बताकर, जिंदादिल बताकर, आग बताकर, सभी को नामर्द कहती हैं. जब ऐसी किसी से मैं कहता हूँ, “एक-एक घंटे के सात राउंड देने की केपेसिटी है. आधे घंटे से अधिक की मेहमान नहीं हो सकती आप. इसलिए अपनी जैसी चौदह के साथ आओ. एक बेड पर, एक ही रात में बेसुध होने तक तृप्त होओ. कई रात रेगुलर भी होती रह सकती हो.” तब वे पूछती हैं, हर रात के पैसे कितने दोगे?
तो देवी जी, कोठे पर बैठो ना. कइयों को लो, पैसे भी लो. बात सटिस्फाइड का रोना रोने की थी, अब चैलेंज मिला तो पैसा चाहिए. पैसे की मज़बूरी सच में है, दरिद्र हो तो अपनों के साथ आओ, पब्लिक प्लेस पर मिलो, मज़बूरी सावित करो. जितना जरूरी है लो और जाओ. इसकी कीमत मैं जिस्म से नहीं वसूल सकता. आपके जिस्म को मेरी जरूरत है, तो पैसा बीच में क्यों? पैसे देकर आपको यूज करने का मतलब है किसी भड़ुए द्वारा वेश्या को यूज करना. इतना नहीं गिर सकता मैं. आप भी मत गिरो.
मर्दानगी सिर्फ कमाई, सुरक्षा, या स्टाइल नहीं है। मर्दानगी एक बोझ है। एक ज़िम्मेदारी है। वो महिला, जो उस ज़िम्मेदारी को सम्मान के साथ थाम सके
वो ही असली साथी है। इसलिए अगली बार जब कोई कहे कि उसे “एक असली मर्द” चाहिए
तो बस मुस्कुराकर पूछिए : “क्या तुम जानती हो, उसके साथ जीने का मतलब क्या होता है?”





