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ये आँधी हमें बर्बाद न कर दे!

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आलोक कुमार मिश्रा

ऐसा नहीं है कि आज़ाद भारत में दंगे और उपद्रव पहली बार हो रहे हैं, लेकिन हाल फिलहाल में हुए ये दंगे अपनी आवृत्ति, तीव्रता और पैटर्न में बिल्कुल नये तरीके के हैं। त्योहार जो उल्लास और उमंग लेकर आते थे, अब आम जनमानस में भय का संचार कर रहे हैं। कारण यही है कि लंपटो और हुड़दंगियों का समूह त्योहार की ऊर्जा को हाइजैक करके इन्हें उपद्रव में बदल दे रहा है। भारत का हर धार्मिक समुदाय अलग-अलग अवसरों पर किसी न किसी तरह की शोभा यात्रा या जुलूस निकालता रहा है। उसमें शामिल लोग पवित्र भाव से अपने धार्मिक नारों और संदेशों को भी दुहराते रहे हैं। फिर चाहे सिखों का नगर-कीर्तन हो, हिंदुओं की रामनवमी आदि त्योहारों पर निकलने वाली शोभायात्रा हो या फिर ताजिए ले जा रहे मुस्लिम जनसमूह। इन यात्राओं में कमोबेश दूसरे समुदायों की सहभागिता भी देखने को मिलती रही है। पर अब इन आयोजनों की प्रकृति पूरी तरह बदली हुई दिख रही है। यह कहने में एक नागरिक के तौर पर हमें संकोच नहीं होना चाहिए कि इसका बहुत बड़ा कारण इसमें नफे-नुकसान के गणित को ध्यान में रखकर की जा रही राजनीतिक दख़लंदाजी भी है।
इस साल रामनवमी की शोभायात्रा में अलग-अलग स्थानों पर हुए उपद्रव एक काॅमन पैटर्न दिखाते हैं। जहाँ इनमें शामिल युवाओं का एक बड़ा समूह हथियार लहराते और भड़काऊ नारे लगाते दिखता है वहीं डीजे पर ऊँचे स्वर में ऐसे गाने भी बजाए जाते हैं जो दूसरे समुदायों के लिए अपमानजनक बोल से लैस होते हैं। करौली, राजस्थान सहित कुछ जगहों से आए वीडियो इसकी तस्दीक़ करते हैं। अल्पसंख्यक बहुल इलाकों या मस्जिदों के सामने यह हुड़दंगई और बढ़ जाती है। साफ़ तौर पर यह पुलिस की अक्षमता और विफलता है और ये कृत्य धार्मिक तो बिल्कुल भी नहीं है। प्रतिक्रिया में अल्पसंख्यक असुरक्षा की मनोग्रंथि से लैस दूसरा समुदाय भी उग्र होकर और पत्थरबाजी करके आग में घी डाल देता है। लेकिन यहाँ दोनों समुदायों की इस गैर-वाज़िब हरकत को बराबर मानकर मामले को संतुलित मानने की गलती नहीं की जानी चाहिए। यहाँ एक समुदाय सरकार जनित पक्षधरता के बल पर बहुत ज़्यादा आक्रामक दिख रहा है तो दूसरा बेगानेपन की असुरक्षा से लैस अति संगठित।
आज सत्ता में बैठे बहुत से लोग और इनके अनुषांगिक संगठन इस तरह का वातावरण पैदा करके धार्मिक गोलबंदी कर फायदा उठाने में लगे हैं। जिस तरह से इन कृत्यों को बढ़ावा दिया जाता है, दूसरे पक्ष को बढ़ा-चढ़ा कर ग़लत साबित किया जाता है और फिर पुलिसिया एक्शन में जानबूझकर दूसरे पक्ष की धर-पकड़ व बुलडोज़र वाली कार्यवाही की जाती है, वह इस असंतुलन को उजागर भी कर देता है। दरअसल अल्पसंख्यकों में पसर रहा पक्षपात जनित असुरक्षा का भाव मामले को और गंभीर ही कर रहा है। ये लोग भी ऐसे अवसरों पर उग्र प्रतिक्रिया देने के लिए मानसिक तौर पर तैयार होकर पत्थर-हथियार इकट्ठे किये हुए दिखते हैं। एकाएक होने वाली पत्थरबाजी की घटनाएँ इसे उजागर करती हैं।
फैल रहे नफ़रत और प्रोपेगेन्डा के असर में आकर अब बहुत से पढ़े लिखे व्यक्ति भी भारत में सदियों से रही मिली-जुली गंगा-जमुनी तहज़ीब के अस्तित्व पर शंका व्यक्त करने लगे हैं। दरअसल यह फैल रहे साम्प्रदायिक वातावरण का ही प्रभाव है। इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव आपसी विश्वास पर ही तो पड़ता है। आख़िरकार अपने अस्सी-नब्बे के दशक के बचपन को याद करते हुए मैं दावे से कह सकता हूँ कि हमारी समावेशी संस्कृति का अस्तित्व कोई झूठ नहीं है।
अच्छी-खासी अल्पसंख्यक आबादी वाले अपने पूर्वांचली गाँव में बीते बचपन में यह सब मैंने जिया है। मुहर्रम सिर्फ़ मुस्लिम त्योहार है ये मुझे दसवीं की पढ़ाई के बाद दिल्ली आकर पता चला। हममें से बहुतेरे ताजियों के पीछे गम मनाते हुए चलते थे। हमारे घरों में ताजिए बनवाने की मान्यताएँ मानी जाती थीं। उन पर अनाज-पानी का सीधा चढ़ाया जाता था। गाँव में हो रही हर कथा-भागवत में मुसलमान बढ़-चढ़कर भाग लेते थे और प्रसाद ग्रहण करते थे। दोनों समुदाय एक-दूसरे की दुश्वारियों में हमराह थे। मुझे ऐसे कुछ किस्से याद हैं। हिंदुओं में पीपल काटना सही नहीं माना जाता था। जब हमारे घर की कच्ची दीवार पर पीपल का पेड़ बड़ा होने लगा और दीवार गिरने का खतरा पैदा हो गया तो तो दादाजी ने मुस्लिम पड़ोसी से उसे कटवाया। माना गया कि वे तो ऐसा कर सकते हैं। इसी तरह एक मुस्लिम पड़ोसी के घर आपसी सहमति से हुए तलाक में तलाकनामा लिखने को कुफ़्र मानकर कोई मुसलमान आगे नहीं आ रहा था तो मेरे पिताजी ने उसे लिखकर इस संकट को ख़त्म किया। बचपन के दिनों मैंने दोनों समुदायों को दूध-पानी सा मिला हुआ ही पाया। किसी एक व्यक्ति की गलती को कभी पूरे समुदाय की गलती कभी नहीं कहा जाता था तब।
इस मिली-जुली संस्कृति के दुश्मनों ने बड़े धैर्य और मेहनत से वर्षों अपना झूठा और नफ़रती एजेंडा चलाकर इसे कमज़ोर किया है।इतिहास से लेकर संस्कृति तक एक अपसंस्कृति फैला दी गई है। हमारी वर्तमान पीढ़ी उनके झूठे एजेंडे और निर्मित भय और सपनों के वशीभूत हो चुकी है। उसमें सच का सामना करने का माद्दा ही ख़त्म कर दिया गया है। रोजी-रोटी, रोजगार की दुश्वारियों के प्रश्न गौण बना दिए गये हैं। इसका सामना भी इसी तरह के धैर्य, लगन और लंबे संघर्ष से करना होगा। देश की हितैषी शक्तियों को एकजुट होकर सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर सक्रिय होकर अपने इस महान विविधतापूर्ण देश को बचाना होगा। धार्मिक राज्य के जंजाल में फंसकर हमने अपने बहुत से पड़ोसी देशों को बर्बाद होते देखा है। महान संस्कृति और परंपरा वाले हम लोग उस नरक के उत्तराधिकारी नहीं हैं। यही बात अपने सभी लोगों को हमें समझाना होगा। सेकुलर राज्य और सर्व-धर्म समभाव वाला समाज ही हमारा ध्येय है और यही हमारे संविधान का संकल्प है। नहीं संभले तो ये आँधी हमें बर्बाद कर देगी।

ऐसा नहीं है कि आज़ाद भारत में दंगे और उपद्रव पहली बार हो रहे हैं, लेकिन हाल फिलहाल में हुए ये दंगे अपनी आवृत्ति, तीव्रता और पैटर्न में बिल्कुल नये तरीके के हैं। त्योहार जो उल्लास और उमंग लेकर आते थे, अब आम जनमानस में भय का संचार कर रहे हैं। कारण यही है कि लंपटो और हुड़दंगियों का समूह त्योहार की ऊर्जा को हाइजैक करके इन्हें उपद्रव में बदल दे रहा है। भारत का हर धार्मिक समुदाय अलग-अलग अवसरों पर किसी न किसी तरह की शोभा यात्रा या जुलूस निकालता रहा है। उसमें शामिल लोग पवित्र भाव से अपने धार्मिक नारों और संदेशों को भी दुहराते रहे हैं। फिर चाहे सिखों का नगर-कीर्तन हो, हिंदुओं की रामनवमी आदि त्योहारों पर निकलने वाली शोभायात्रा हो या फिर ताजिए ले जा रहे मुस्लिम जनसमूह। इन यात्राओं में कमोबेश दूसरे समुदायों की सहभागिता भी देखने को मिलती रही है। पर अब इन आयोजनों की प्रकृति पूरी तरह बदली हुई दिख रही है। यह कहने में एक नागरिक के तौर पर हमें संकोच नहीं होना चाहिए कि इसका बहुत बड़ा कारण इसमें नफे-नुकसान के गणित को ध्यान में रखकर की जा रही राजनीतिक दख़लंदाजी भी है।
इस साल रामनवमी की शोभायात्रा में अलग-अलग स्थानों पर हुए उपद्रव एक काॅमन पैटर्न दिखाते हैं। जहाँ इनमें शामिल युवाओं का एक बड़ा समूह हथियार लहराते और भड़काऊ नारे लगाते दिखता है वहीं डीजे पर ऊँचे स्वर में ऐसे गाने भी बजाए जाते हैं जो दूसरे समुदायों के लिए अपमानजनक बोल से लैस होते हैं। करौली, राजस्थान सहित कुछ जगहों से आए वीडियो इसकी तस्दीक़ करते हैं। अल्पसंख्यक बहुल इलाकों या मस्जिदों के सामने यह हुड़दंगई और बढ़ जाती है। साफ़ तौर पर यह पुलिस की अक्षमता और विफलता है और ये कृत्य धार्मिक तो बिल्कुल भी नहीं है। प्रतिक्रिया में अल्पसंख्यक असुरक्षा की मनोग्रंथि से लैस दूसरा समुदाय भी उग्र होकर और पत्थरबाजी करके आग में घी डाल देता है। लेकिन यहाँ दोनों समुदायों की इस गैर-वाज़िब हरकत को बराबर मानकर मामले को संतुलित मानने की गलती नहीं की जानी चाहिए। यहाँ एक समुदाय सरकार जनित पक्षधरता के बल पर बहुत ज़्यादा आक्रामक दिख रहा है तो दूसरा बेगानेपन की असुरक्षा से लैस अति संगठित।
आज सत्ता में बैठे बहुत से लोग और इनके अनुषांगिक संगठन इस तरह का वातावरण पैदा करके धार्मिक गोलबंदी कर फायदा उठाने में लगे हैं। जिस तरह से इन कृत्यों को बढ़ावा दिया जाता है, दूसरे पक्ष को बढ़ा-चढ़ा कर ग़लत साबित किया जाता है और फिर पुलिसिया एक्शन में जानबूझकर दूसरे पक्ष की धर-पकड़ व बुलडोज़र वाली कार्यवाही की जाती है, वह इस असंतुलन को उजागर भी कर देता है। दरअसल अल्पसंख्यकों में पसर रहा पक्षपात जनित असुरक्षा का भाव मामले को और गंभीर ही कर रहा है। ये लोग भी ऐसे अवसरों पर उग्र प्रतिक्रिया देने के लिए मानसिक तौर पर तैयार होकर पत्थर-हथियार इकट्ठे किये हुए दिखते हैं। एकाएक होने वाली पत्थरबाजी की घटनाएँ इसे उजागर करती हैं।
फैल रहे नफ़रत और प्रोपेगेन्डा के असर में आकर अब बहुत से पढ़े लिखे व्यक्ति भी भारत में सदियों से रही मिली-जुली गंगा-जमुनी तहज़ीब के अस्तित्व पर शंका व्यक्त करने लगे हैं। दरअसल यह फैल रहे साम्प्रदायिक वातावरण का ही प्रभाव है। इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव आपसी विश्वास पर ही तो पड़ता है। आख़िरकार अपने अस्सी-नब्बे के दशक के बचपन को याद करते हुए मैं दावे से कह सकता हूँ कि हमारी समावेशी संस्कृति का अस्तित्व कोई झूठ नहीं है।
अच्छी-खासी अल्पसंख्यक आबादी वाले अपने पूर्वांचली गाँव में बीते बचपन में यह सब मैंने जिया है। मुहर्रम सिर्फ़ मुस्लिम त्योहार है ये मुझे दसवीं की पढ़ाई के बाद दिल्ली आकर पता चला। हममें से बहुतेरे ताजियों के पीछे गम मनाते हुए चलते थे। हमारे घरों में ताजिए बनवाने की मान्यताएँ मानी जाती थीं। उन पर अनाज-पानी का सीधा चढ़ाया जाता था। गाँव में हो रही हर कथा-भागवत में मुसलमान बढ़-चढ़कर भाग लेते थे और प्रसाद ग्रहण करते थे। दोनों समुदाय एक-दूसरे की दुश्वारियों में हमराह थे। मुझे ऐसे कुछ किस्से याद हैं। हिंदुओं में पीपल काटना सही नहीं माना जाता था। जब हमारे घर की कच्ची दीवार पर पीपल का पेड़ बड़ा होने लगा और दीवार गिरने का खतरा पैदा हो गया तो तो दादाजी ने मुस्लिम पड़ोसी से उसे कटवाया। माना गया कि वे तो ऐसा कर सकते हैं। इसी तरह एक मुस्लिम पड़ोसी के घर आपसी सहमति से हुए तलाक में तलाकनामा लिखने को कुफ़्र मानकर कोई मुसलमान आगे नहीं आ रहा था तो मेरे पिताजी ने उसे लिखकर इस संकट को ख़त्म किया। बचपन के दिनों मैंने दोनों समुदायों को दूध-पानी सा मिला हुआ ही पाया। किसी एक व्यक्ति की गलती को कभी पूरे समुदाय की गलती कभी नहीं कहा जाता था तब।
इस मिली-जुली संस्कृति के दुश्मनों ने बड़े धैर्य और मेहनत से वर्षों अपना झूठा और नफ़रती एजेंडा चलाकर इसे कमज़ोर किया है।इतिहास से लेकर संस्कृति तक एक अपसंस्कृति फैला दी गई है। हमारी वर्तमान पीढ़ी उनके झूठे एजेंडे और निर्मित भय और सपनों के वशीभूत हो चुकी है। उसमें सच का सामना करने का माद्दा ही ख़त्म कर दिया गया है। रोजी-रोटी, रोजगार की दुश्वारियों के प्रश्न गौण बना दिए गये हैं। इसका सामना भी इसी तरह के धैर्य, लगन और लंबे संघर्ष से करना होगा। देश की हितैषी शक्तियों को एकजुट होकर सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर सक्रिय होकर अपने इस महान विविधतापूर्ण देश को बचाना होगा। धार्मिक राज्य के जंजाल में फंसकर हमने अपने बहुत से पड़ोसी देशों को बर्बाद होते देखा है। महान संस्कृति और परंपरा वाले हम लोग उस नरक के उत्तराधिकारी नहीं हैं। यही बात अपने सभी लोगों को हमें समझाना होगा। सेकुलर राज्य और सर्व-धर्म समभाव वाला समाज ही हमारा ध्येय है और यही हमारे संविधान का संकल्प है। नहीं संभले तो ये आँधी हमें बर्बाद कर देगी।

  • आलोक कुमार मिश्रा

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