जब मैं लोगों से पूँछता हूँ कि क्या आपने संविधान पढ़ा है? आपके पास संविधान की कोई पुस्तक है? तो अधिकतर लोग यही कहते हैं कि नहीं। परंतु इन्ही अधिकतर लोगों का भी मानना है कि बाबा साहब ने संविधान बनाया है l
संविधान का सच समझने के लिए मैं सभी लोगों से आवाहन करता हूं कि बाबा साहब का संविधान सभा का 17 दिसंबर 1946, 4 नवंबर 1948 और 25 नवंबर 1949 का भाषण समय निकालकर जरूर पढ़े ताकि बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने क्या कहा है संविधान के विषय में उन्हें सच मालूम हो जाएगा। बाबा साहब डॉ आंबेडकर की संविधान में क्या भूमिका थी संविधान के निर्माण में क्या योगदान था इसको जानने के लिए 8 नवंबर 1948 का अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर जो संविधान सभा में सदस्य भी थे और ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य थे, का भाषण अवश्य पढ़ ले, लिकं मैं दे रहा हूँ इससे स्पष्ट हो जाएगा बाबा साहब की भूमिका क्या थी। अगली क्रम में 4 नवंबर 1948 और 25 नवंबर 1949 का स्पीच और 8 नवंबर 1948 का अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर का स्पीच भी हिन्दी में शेयर करूंगा।
*अजय असुर*
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ( बंगाल : जनरल ): सभापति महोदय, आपके प्रति मैं अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करता हूं कि इस प्रस्ताव पर बोलने के लिये आपने मुझे आमंत्रित किया । मैं अवश्य ही यह स्वीकार करूंगा कि आपका आमंत्रण पाकर मैं आश्चर्यित हो गया । सूची में बीस – बाईस सदस्यों का नाम मुझ से ऊपर है और इसलिए मैं समझता था कि अगर बोलने का मौका मिले भी तो कल मिलेगा । मैं पसन्द भी यही करता कि कल बोलने का मौका मिलता क्योंकि आज मैं बिना किसी तैयारी के आया हूं । मैं चाहता था कि इस अवसर पर एक विस्तृत वक्तव्य दूं और उसके लिए मैं तैयारी कर लेना चाहता था । इसके अलावा आपने वक्ताओं के लिए 10 मिनट का समय निर्धारित कर दिया है । इन सब असुविधाओं के बीच मैं नहीं समझ पाता कि प्रस्तुतः प्रस्ताव पर समुचित रूप से किस तरह बोल पाऊंगा । अस्तु , जहाँ तक हो सकेगा …. संक्षेप में इस पर अपना मत व्यक्त करूंगा ।
सभापति जी , कल से जो बहस हो रही है उसे मद्देनजर रखते हुये इस प्रस्ताव के दो हिस्से किये जा सकते हैं । एक हिस्सा ऐसा है जिस पर कोई विवाद नहीं है और दूसरा विवादास्पद है । प्रस्ताव के उस भाग पर जिसमें 5 वां और 7 वां पैरा है कोई विवाद नहीं है । इन पैरों में देश के भावी विधान के लक्ष्यों पर प्रकाश डाला गया है । प्रस्ताव को पेश किया है पं . जवाहरलाल नेहरू ने जो एक समाजवादी की इस हैसियत से मशहूर है; परन्तु मैं अवश्य यह स्वीकार करूंगा कि मुझे इससे बड़ी से बड़ी निराशा हुई , यद्यपि यह विवाद – मूलक नहीं है ।
मैं तो यह आशा करता था कि वह उससे कहीं आगे जायेंगे जितना कि वह प्रस्ताव के इस मार्ग में गये हैं । इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते मैं यह पसन्द करता कि यह भाग प्रस्ताव में शामिल ही न किया जाता । प्रस्ताव को पढ़ने से वह घोषणा याद आ जाती है जिसे फ्रांस की विधान परिषद् ने मानव अधिकार घोषणा के नाम से घोषित किया था । मैं समझता हूं कि मेरा यह कहना बिलकुल दुरुस्त है कि आज 450 वर्ष बीत जाने पर भी उक्त घोषणा और उसमें दिये हुए सिद्धान्त लोगों के दिमाग में बस गये हैं । मैं तो कहूंगा कि वह दुनिया के सभ्य मुल्कों के नई रोशनी वाले आदमियों के ही दिमाग में ही नहीं घर कर गये हैं बल्कि हिन्दुस्तान जैसे मुल्क में भी, जो विचार और सामाजिक जीवन में इतना कट्टर और पुरातनवादी है शायद ही कोई ऐसा मिलेगा जो इनकी उपयोगिता न मंजूर करता हो । इन बातों को दुहराना, जैसा कि प्रस्ताव में किया गया है, केवल पाण्डित्य – प्रदर्शन करना है । यह सिद्धान्त हमारी विचारधारा या दृष्टिकोण में व्याप्त है ।
अतः यह घोषित करना कि ये हमारे सिद्धांत के अंग हैं नितान्त अनावश्यक है । इस प्रस्ताव में और भी कई त्रुटियां हैं । मैं देखता हूं कि प्रस्ताव के इस भाग में यद्यपि अधिकारों की चर्चा की गई है पर उनकी सुरक्षा का कोई उपचार नहीं दिया गया है । हम सभी इस बात को जानते हैं कि अधिकारों का कोई महत्त्व नहीं यदि उनकी रक्षा की व्यवस्था न हो ताकि अधिकारों पर जब कुठाराघात हो तो लोग उनका बचाव कर सकें । ऐसे उपचारों का इस प्रस्ताव में बिलकुल अभाव है । इस सामान्य सिद्धान्त का भी इसमें उल्लेख नहीं कि किसी नागरिक के जीवन और सम्पत्ति का तब तक अपहरण नहीं किया जायेगा जब तक कि कानून खूब जांच – पड़ताल कर इसकी आज्ञा न दे दे । प्रस्ताव में उल्लिखित मौलिक अधिकारों को भी कानून और सदाचार के आधीन रख दिया गया है, निश्चय ही कानून और सदाचार क्या है इस बात का निर्णय जमाने का शासन – प्रबंध ( Executive ) करेगा, किसी प्रबंध का एक फैसला हो सकता है और दूसरे का दूसरा । हम निश्चय रूप से यह नहीं जानते कि इन मौलिक अधिकारों की स्थिति क्या होगी अगर ये शासन प्रबन्ध की मर्जी पर छोड़ दिये जाते हैं । प्रस्ताव में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक, न्याय की व्यवस्था भी रखी गयी है । यदि प्रस्ताव में कोई वास्तविकता है, इसमें कोई सच्चाई है और इसकी सच्चाई पर मुझे जरा भी शक नहीं है क्योंकि उसे उपस्थित किया है माननीय पंडित जवाहरलाल नेहरू ने, तो मैं यह उम्मीद करता कि इसमें कुछ ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए थी जिससे राज्य के लिए यह सम्भव हो जाता है कि वह सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान कर सकता । और इसी विचार से में इस बात की आशा करता कि प्रस्ताव साफ – साफ शब्दों में कहता, कि ताकि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान किया जा सके । देश में उद्योग – धंधों का और भूमि का राष्ट्रीयकरण किया जायेगा । मेरी समझ में नहीं आता कि जब तक देश की अर्थ – नीति समाजवादी नहीं होती किसी भी भावी हुकूमत के लिए यह कैसे सम्भव होगा कि वह सामाजिक , आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान कर सके । अतः यद्यपि व्यक्तिगत रूप से मुझे इन सिद्धान्तों के सन्निहित किये जाने पर कोई आपत्ति नहीं है । फिर भी प्रस्ताव मेरे लिए निराशाप्रद ही है । अस्तु इतना कह देने के बाद इस विषय को मैं यहीं समाप्त कर देता हूँ ।
अब मैं प्रस्ताव के पहले हिस्से पर आता हूं, जिसमें प्रथम चार पैरा शामिल हैं । सभा के वाद – विवाद को देखकर मैंने कहा था कि यह प्रसंग विवादास्पद हो गया है । सारा विवाद ‘रिपब्लिक’ शब्द पर केन्द्रित है ।
पैराग्राफ चार के इस वाक्य पर “सारी शक्ति, सारे अधिकार जनता से प्राप्त होंगे'” सारा विवाद है, अत : डॉक्टर जयकर ने कल जो यह बात कही कि मुस्लिम लीग की गैरहाजिरी में यह उचित न होगा कि सभा इस प्रस्ताव पर विचार करे, उसी पर सारा विवाद है । आगे चलकर इस देश क्या विकास होगा और उसका सामाजिक , आर्थिक और राजनैतिक ढांचा क्या होगा इस बात को लेकर मेरे मन में जरा भी संदेह नहीं है । मैं जानता हूं कि आज हम राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक सभी दृष्टियों से विभक्त है । आज हमारा देश कई लड़ाकू दलों में बंट गया है । और मैं तो यहां तक मंजूर करूंगा कि ऐसे ही एक लड़ाकू दल के नेताओं में शायद मैं भी एक हूं । परन्तु सभापति महोदय, इन सब बातों के बावजूद भी मुझे इस बात का पक्का विश्वास है कि समय और परिस्थिति अनुकूल होने पर दुनिया की कोई भी ताकत इस मुल्क को एक होने से रोक नहीं सकती । ( हर्ष – ध्वनि ) जाति और धर्म की इसमें मुझे जरा भिन्नता के बावजूद भी हम किसी न किसी रूप में एक होंगे, इसमे मुझे जरा भी शक नहीं है । ( हर्ष – ध्वनि ) यह कहने में मुझे रंच मात्र भी संकोच नहीं है कि यद्यपि मुस्लिम लीग आज भारत के विभाजन के लिये भयानक आंदोलन कर रही है पर एक न एक दिन स्वयं मुसलमानों में बुद्धि आयेगी और वे समझने लगेंगे कि उनके लिए भी संयुक्त भारत ही अधिक कल्याणकर है । ( तुमुल – ध्वनि )
इसलिए जहां तक हमारे लक्ष्य का सम्बन्ध है, हममें से किसी को भी कोई आशंका नहीं होनी चाहिए कोई संदेह न होना चाहिए । हमारी कठिनाई यह नहीं है कि हमारा भविष्य क्या होगा ? हमारी कठिनाई तो यह है कि अपनी आज की इस विशाल, पर बेमेल आबादी को किस तरह इस बात पर आमादा करें कि वह मिल – जुलकर एक फैसला करें और ऐसा पथ ग्रहण करें कि हम सब एक हो जायें । हमारी कठिनाई इति को लेकर नहीं अथ को लेकर है । हमारा लक्ष्य क्या है . यह तो साफ है । पर परेशानी यह है कि काम शुरू कैसे करें । इसलिए सभापति महोदय, मैं तो समझता हूँ कि सभी को रजामंद करने के लिए, हमारे देश के प्रत्येक वर्ग को इस बात पर आमादा करने के लिए कि हम सब एक राह पर चलें, बहुमत वाले दल की यह बड़ी से बड़ी राजनीतिज्ञता होगी कि वह उन लोगों की बद्धमूल और गलत धारणा को दूर करने के लिए कुछ रियायतें दे दें जो आज हमारे साथ चलने में दुविधा बोध कर रहे हैं । इसी भावना से प्रेरित होकर मैं यह अलाप कर रहा हूं । हम ऐसे नारे लगाने बन्द कर दें जिनसे लोगों को भय होता हो । अपने विरोधियों की बद्धमूल धारणा को, पक्षपातपूर्ण धरणा को दूर करने के लिए उन्हें कुछ रियायतें दें, ताकि वह स्वेच्छा से हमारे साथ उस पथ पर चलें जिस पर कुछ दूर चलने के बाद हम अपनी एकता की मंजिल पर पहुँच जायेंगे । अगर मैं यहां डॉक्टर जयकर के संशोधन का समर्थन कर रहा हूं तो केवल इसी उद्देश्य से कि हम सभी यह समझें कि यह कानूनी प्रश्न नहीं है । हम सही है या गलत, जो रास्ता हम ग्रहण कर रहे हैं वह हमारे कानूनी अधिकारों से संगत हैं या नहीं, वह 16 मई या 6 दिसम्बर के वक्तव्य के अनुकूल है या नहीं, इन सब बातों को छोड़ दीजिये । हमारी समस्या इतनी गहन है कि कानूनी अधिकारों से उसका समाधान न होगा । यह कानूनी समस्या है ही नहीं । हमें कानूनी ख्याल को छोड़कर कुछ ऐसा प्रयत्न करना चाहिए जिससे वे लोग जो नहीं शामिल हैं, शामिल हो जायें । हम उनका यहां आना संभव बनायें, यही मेरी प्रार्थना है ।
बहस – मुबाहिसे के दौरान में दो ऐसे प्रश्न उठाये गये थे जो मुझे इतने खटके कि मैंने उन्हें कागज पर नोट कर लिया है । एक प्रश्न मेरा ख्याल है, कि मेरे मित्र बिहार के प्रधानमंत्री ने उठाया था जिन्होंने कल सभा में वक्तृता दी थी । आपने कहा था भला यह प्रस्ताव मुस्लिम – लीग को विधान परिषद् में सम्मिलित होने से कैसे रोक सकता है ? आज मेरे मित्र डॉ . श्यामाप्रसाद मुकर्जी ने एक दूसरा प्रश्न उपस्थित किया कि क्या यह प्रस्ताव मंत्रिप्रतिनिधिमंडल की योजना के विपरीत है ? मैं समझता हूँ कि ये बड़े गंभीर प्रश्न हैं और इनका उत्तर और स्पष्ट उत्तर आवश्यक है । यह प्रस्ताव चाहे खूब सोच – समझ कर शान्त चित्त से प्रस्तुत किया गया हो या केवल संयोगवशात बन गया हो, पर मैं तो यही मानता हूं कि इसका यह परिणाम होगा कि मुस्लिम लीग बाहर ही रह जायेगी, भले ही यह प्रस्ताव इस परिणाम के अभिप्राय से न बनाया गया हो । इस सम्बन्ध में मैं आपका ध्यान प्रस्ताव के पैरा 3 की ओर आकृष्ट करूंगा जो मेरी समझ में बहुत महत्त्वपूर्ण और आवश्यक है । इस पैरा में भारत के भावी विधान की तस्वीर है । मैं नहीं जानता कि प्रस्तावक महोदय का क्या अभिप्राय है । पर मैं मानता हूं कि पास हो जाने पर विधान परिषद् के लिए यह प्रस्ताव एक तरह से आदेश – मूलक हो जायेगा कि वह इसके पैरा 3 के अनुसार ही विधान बनाये । पैरा 3 क्या कहता है ? यह कहता है कि इस देश में दो भिन्न – भिन्न राज्य पद्धतियां होंगी एक तो उन खुद मुख्तार प्रान्तों, रियासतों या अन्य प्रदेशों के लिए जो भारतीय संघ में शामिल होना चाहते हैं । इन खुद मुख्तार प्रदेशों को सारे अधिकार प्राप्त होंगे । इन्हें अवशिष्ट अधिकार भी प्राप्त रहेंगे । उन खुद मुख्तार प्रदेशों के ऊपर एक संघ सरकार होगी जिसके अधिकार में कुछ विषय होंगे, जिन पर कानून बनाने का, शासन चलाने का संघ सरकार को ही अधिकार होगा । प्रस्ताव के इस हिस्से में गुटबन्दी का कहीं जिक्र नहीं है । यह गुट संघ सरकार और घटकों के बीच एक मध्यवर्ती संगठन है । कैबिनेट मिशन के वक्तव्य को दृष्टि में रखते हुए या कांग्रेस के वर्धा वाले प्रस्ताव को भी देखते हुए मैं स्वीकार करता हूं कि स्वयं मुझे बड़ा आश्चर्य है कि प्रस्ताव में गुटबन्दी की कल्पना का कहीं जिक्र भी नहीं है । व्यक्तिगत रूप से मैं प्रान्तों की गुटबंदी के विचार को नहीं पसन्द करता । ( हर्ष – ध्वनि ) मैं एक दृढ़ और संयुक्त केन्द्र चाहता हूं उससे भी ज्यादा मजबूत केन्द्र जो सन् 1935 के एक्ट के मुताबिक बना है । ( हर्ष – ध्वनि ) पर सभापति महोदय, इन इच्छाओं का, रायों का स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ने का । हम बहुत आगे बढ़ चुके हैं । मैं तो कहूंगा कि कांग्रेस स्वयं दृढ़ केन्द्र को विघटित करने पर राजी हो गई, ऐसे दृढ़ केन्द्र को विघटित करने पर जो 150 वर्षों के लंबे शासन के बाद बना था और जो, मैं कह सकता हूं कि मेरे लिए एक प्रशंसा, सम्मान और कल्याण की चीज थी । पर जब हमने उस स्थिति को त्याग दिया है, जब हमने स्वयं स्वीकार कर किया है कि हम मजबूत केन्द्र नहीं चाहते, जब हमने मंजूर कर लिया है कि संघ सरकार और प्रान्तों के बीच उपसंघ की – सी एक मध्यवर्ती राज्य पद्धति होनी चहिए, मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि प्रस्ताव के पैरा 3 में गुटबन्दी का जिक्र क्यों नहीं किया गया है ? मैं जानता हूं कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सम्राट की सरकार तीनों ही योजना की गुटबन्दी सम्बन्धी धारा के अर्थ पर मतभेद रखते हैं । परन्तु मैं तो हमेशा से यही समझता हूं कि कांग्रेस ने यह मंजूर कर लिया है कि यदि भिन्न – भिन्न गुटों के प्रान्त अपना उपसंघ बनाने पर राजी हों तो कांग्रेस को इस व्यवस्था पर कोई आपत्ति नहीं है । अगर कोई मुझे बता दे कि मेरा ऐसा समझना गलत है तो मैं अपनी भूल स्वीकार कर लूंगा । मेरा विश्वास है कि कांग्रेस दल की विचारधारा समझने में मैं सही हूं । मैं यह पूछना चाहता हूं कि प्रस्तावक और उनके दल ने जिस विनां पर प्रान्तों की गुटबन्दी या उनके उपसंघ बनाने की कल्पना को स्वीकार किया था उसका उस प्रस्ताव में आखिर प्रस्तावक ने हवाला क्यों नहीं दिया है ? इस प्रस्ताव में मध्यवर्ती संघ का जिक्र दूर ही क्यों रखा गया है ? मुझे कोई भी उत्तर नहीं मिलता इसलिए बिहार के प्रधानमंत्री ने और डॉ . श्यामाप्रसाद मुकर्जी ने जो सभा से प्रश्न किया है कि भला यह प्रस्ताव 16 मई के वक्तव्य के विपरीत कैसे है और यह लीग को विधान परिषद् में आने से कैसे रोकता है, उसके उत्तर में मैं कहूंगा कि आपके इस प्रस्ताव के तीसरे पैरे से मुस्लिम लीग अवश्य लाभ उठायेगी और अपनी अनुपस्थिति का औचित्य दिखायेगी । सभापति जी, कल मेरे मित्र डॉ. जयकर ने इस प्रश्न पर बहस मुल्तवी रखने के लिए अपने पक्ष का प्रतिपादन कुछ कानूनी ढंग पर किया उनकी दलील का यह आधार था कि आयां हमें इस प्रस्ताव को पास करने का अधिकार भी है । उन्होंने मंत्रिप्रतिनिधिमंडल के वक्तव्य का कुछ भाग पढ़कर सुनाया जो इस परिषद् की कार्य – विधि से सम्बन्ध रखता है । उनका मन्तव्य यह था कि इस प्रस्ताव पर तुरन्त निर्णय करने की जो पद्धति परिषद् अपना रही है वह योजना में दी हुई पद्धति के प्रतिकूल है । मैं इस बात को दूसरी तरह से सभा के सामने रखना चाहता हूं । मैं आपसे यह नहीं पूछना चाहता कि आपको यह प्रस्ताव जल्दीबाजी में पास कर देने का हक है या नहीं । हो सकता है कि आपको यह अधिकार हो । पर जो बात मैं आपसे पूछना चाहता हूँ, वह यह है कि क्या इस प्रस्ताव को पास करना आपके लिए बुद्धिमानी और नीतिज्ञता की बात होगी ? अधिकार एक बात है और बुद्धिमत्ता दूसरी । मैं चाहता हूं कि सभा इस बात पर दूसरे ही दृष्टिकोण से विचार करे । वह इस दृष्टिकोण से इस पर विचार न करे कि उसे इस प्रस्ताव को पास करने का हक है या नहीं । वरन् इस ख्याल से कि क्या इसे अभी पास करना बुद्धि – संगत होगा, नीतिज्ञता की बात होगी ? मेरा कहना है कि ऐसा करना बुद्धिमत्ता और नीतिज्ञता से विपरीत है । मेरा सुझाव है कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के झगड़े को सुलझाने के लिए एक और प्रयास करना चाहिए । यह मामला इतना संगीन है, इतना महत्त्वपूर्ण है कि इसका फैसला एक या दूसरे दल की प्रतिष्ठा के ख्याल से ही नहीं किया जा सकता । यहां राष्ट्र के भाग्य का फैसला करने का प्रश्न हो, वहां नेताओं, दलों तथा सम्प्रदायों की शान का कोई मूल्य नहीं होना चाहिए । वहां तो राष्ट्र के भाग्य को ही सर्वोपरि रखना चाहिए । मैं केवल इस बिना पर ही डॉ. जयकर के संशोधन का समर्थन नहीं कर रहा हूं कि इससे विधान परिषद् सुसंगठित रूप से अपना काम करेगी और कार्यारम्भ के पहले मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया को जान लेगी, बल्कि इसलिए भी कि हमें यह अच्छी तरह जान लेना चाहिए कि अगर हम जल्दीबाजी से काम लेंगे तो हमारे भविष्य का क्या फैसला होगा । मुझे नहीं मालूम कि कांग्रेस के दिमाग में, जिसका इस सभा में प्रबल बहुमत है, क्या नक्शा है । मुझमें यह दैवी शक्ति नहीं है कि इस बात को जान जाऊ कि वे क्या सोच रहे हैं ? उनको युक्ति और युद्ध कौशल क्या है इसे मैं नहीं जानता । परन्तु इस उपस्थित मसले पर बहैसियत एक बाहरी आदमी के जब मैं अपना दिमाग लगाता हूं तो मुझे तीन ही रास्ते दिखाई देते हैं, जिनसे हम अपने भविष्य का निर्णय कर सकें । एक रास्ता तो यह है कि एक दल दूसरे दल की इच्छा के सामने आत्म – समर्पण कर दे । दूसरा रास्ता यह है कि हम आपस में विचार – विनिमय कर समझौता कर लें और तीसरा रास्ता है कि खुलकर लड़ाई की जाये । सभापति जी, परिषद् के कुछ सदस्यों की ओर से मैं यह भी सुनता आ रहा हूं कि वे युद्ध के लिए तैयार हैं । मैं अवश्य यह स्वीकार करूंगा । मैं इस कल्पना से ही कांप उठता हूं कि इस देश का कोई भी व्यक्ति यह सोचे कि युद्ध द्वारा वह देश की राजनैतिक समस्या हल कर लेगा । मुझे नहीं मालूम कि देश के कितने लोग इस विचार का समर्थन करते हैं । बहुत से लोग इस विचार का समर्थन करते हैं और मेरी समझ में बहुत से लोग तो इसलिए समर्थन करते हैं कि उनका विश्वास है कि उनका यह युद्ध अंग्रेजों के साथ होगा । अगर यह युद्ध जो लोगों के दिमाग में है, परिमित दायरे में होता और सिर्फ अंग्रेजों तक ही सीमित रहता तो मुझे इस कौशल पर, इस युक्ति पर कोई आपत्ति न होती । परंतु क्या आप समझते हैं कि यह युद्ध सिर्फ अंग्रेजों के ही विरुद्ध होगा ? मुझे यह कहने में रंचमात्र भी दुविधा नहीं है और सभा के सामने मैं साफ शब्दों में कहना चाहता हूँ कि अगर देश में युद्ध हुआ और उसका सम्बन्ध हमारी आज की समस्या से रहा तो फिर यह युद्ध अंग्रेजों के साथ न होगा, यह होगा मुसलमानों के साथ । बल्कि यह उससे भी बुरा होगा और यह युद्ध होगा मुसलमानों और अंग्रेजों की सम्मिलित शक्ति के साथ । मैं नहीं समझ पाता कि यह सम्भावित युद्ध किस तरह उससे भिन्न होगा, जिसकी विभीषिका की कल्पना मैंने की है । महामना ब्रूक की उस प्रसिद्ध वक्तृता का एक अंश मैं सभा को पढ़कर सुना देना चाहता हूँ जो उन्होंने पार्लियामेंट में अमेरिका से मेल – मिलाप करने के सम्बन्ध में दी थी । मेरा विश्वास है कि शायद सभा के उद्देश्य पर इसका कुछ असर पड़ सकता है । आप जानते हैं कि अंग्रेज अमेरिका के विद्रोही उपनिवेशों को जीत कर उनकी मर्जी के खिलाफ उन्हें अपने आधीन रखने की कोशिश कर रहे थे । उन उपनिवेशों को जीतने का विचार परित्याग करने के सम्बन्ध में ब्रूक ने यों कहा थाः
“सभापति महोदय, प्रथम तो मुझे यह कहने की अनुमति दें कि केवल बल प्रयोग कभी स्थायी नहीं होता । उससे कुछ देर के लिए किसी को दबाया जा सकता है पर उससे पुनः दबाने की आवश्यकता दूर नहीं की जा सकती । उस जाति पर कभी शासन नहीं किया जा सकता जिसे हमेशा ही जीतने की जरूरत पड़े ।”
“मेरी दूसरी आपत्ति यह है कि बल – प्रयोग का परिणाम अनिश्चित होता है । बल प्रयोग से सदा आतंक ही नहीं पैदा होता । अगर हम सदा शस्त्र ही उठाये रहे तो फिर यह विजय कैसी ? बलप्रयोग में अगर आप असफल होते हैं तो फिर कोई साधन आपके पास नहीं रह जाता । अगर आप मीठे तरीके से सुलह करने में असफल होते हैं तो बल प्रयोग का साधन आपके हाथ में रहता है पर बलप्रयोग में अगर आप हारे तो फिर समझौते की कोई और गुंजाइश नहीं रहती । दया दिखाने से अधिकार और शक्ति तो कभी – कभी प्राप्त हो जाते हैं पर बल प्रयोग में पराजित होने पर आप अधिकार की भीख नहीं मांग सकते ।”
“बल प्रयोग के विरुद्ध मेरी और आपत्ति यह कि इसके द्वारा लक्ष्य प्राप्ति के प्रयास में आप अपने लक्ष्य को ही क्षीण और दुर्बल बना देते हैं । बल प्रयोग में विजयी होने पर आपको क्या मिलता है ? जो भी आप पाते हैं, वह युद्ध के सिलसिले में प्रायः मूल्यहीन, जर्जरित और बर्बाद हो चुका रहता है । निश्चय ही आप से पाने के लिए युद्ध नहीं करते हैं ।”
यह मेरी गम्भीर चेतावनी है और इसकी उपेक्षा करना खतरनाक होगा । अगर किसी के दिमाग में यह ख्याल हो कि बल – प्रयोग द्वारा, युद्ध द्वारा, क्योंकि बल – प्रयोग ही युद्ध है…. हिंदू – मुस्लिम समस्या का समाधान किया जाये ताकि मुसलमानों को दबाकर उनसे वह विधान मनवा लिया जाये जो उनकी रजामंदी से नहीं बना है, तो इससे देश ऐसी स्थिति में फंस जायेगा कि उसे मुसलमानों को जीतने में सदा लगा रहना पड़ेगा । एक बार जीतने से ही जीत का काम समाप्त न हो जायेगा । मैं आपका और अधिक समय नहीं लेना चाहता । पुनः एक बार वर्क के कथन का हवाला देकर मैं अपना भाषण समाप्त कर देता हूं । वर्क ने कहीं पर कहा है कि “शक्ति देना तो आसान है पर बुद्धि देना कठिन है ।” आइये, हम अपने आचरण से यह प्रमाणित कर दें कि अगर इस परिषद् ने सर्वोच्च सत्ता जबर्दस्ती अन्यायपूर्वक ले ली है तो वह उस सत्ता का प्रयोग बुद्धिमानी से करेगी । यही एक मात्र रास्ता है जिसके जरिये हम देश के सभी वर्गों को साथ लेकर चल सकते हैं । और कोई मार्ग नहीं है जिस पर चलकर हम एकता पा सकें । इस बात के सम्बन्ध में हम लोगों को कोई सन्देह न होना चाहिए ।
*-डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ( बंगाल: जनरल )*





