संजय कनौजिया की कलम![]()
परमाणु बम के जन्म से पहले ही, परमाणु बम की काट ने “भारत” में जन्म ले लिया था और अपने अस्तित्व का प्रथम परिचय उसने साउथ अफ्रीका में, बेमिसाल शांतिपूर्ण रूप से किसी भी जान-माल को नुक्सान किये बिना..ऐसा धमाकेदार धमाका किया जिसकी गूँज की अनुगूंज पूरे विश्व में सुनाई दी गई..इस धमाके का नाम था, “मोहनदास करमचंद गांधी”..तभी वर्ष 1950 के दशक में, दार्शनिक नेता डॉ० लोहिया ने भविष्य वाणी की तर्ज़ पर कहा था कि 20वीं शताब्दी के अंत तक, गांधी मार्ग या परमाणु बम में किसी एक की विजय होगी..वर्तमान में जो इक्कीसवीं शताब्दी का शुरूआती दौर है, दुनियां उसी पायदान पर खड़ी हो चुकी है..बस देखना बांकी रह गया कि जीत गांधी मार्ग की होगी या परमाणु बम की..

दिनांक 28/2/2022 को रूस के पुतिन द्वारा पुनः ये बात दोहराई गई कि “जब रूस ही नहीं रहेगा तो दुनियां की क्या जरुरत, हमें परमाणु बम भी छोड़ना पड़ा तो छोड़ेंगे”..तब सबसे पहली प्रतिक्रिया ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने दी थी कि रूस सबसे पहला परमाणु बम ब्रिटेन पर छोड़ेगा..शायद ब्रिटेन ने अपने ढंग से ये व्याख्या सत्य के आधार पर ही की थी..क्योकिं ब्रिटेन ने मार्च 2018 में, 23 रूसी राजनयिकों को निकालने का फैसला किया और उस वक्त की “ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा-मे” ने UNO की आपातकालीन बैठक रूस के खिलाफ बुलाकर आरोप लगाए कि रूस ने रासायनिक हथियारों पर लगे प्रतिबंधों का उल्लंघन किया है..”अतः रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबन्ध लगाए जाए”..यह विवाद रूस के रिटायर्ड सैन्य अधिकारी स्क्रिपल और उनकी बेटी यूटियाँ, जो दक्षिण इंग्लैंड में बेहोश और गंभीर हालत में मिले थे और ब्रिटेन ने बताया कि इस हादसे को रूस में बने नर्व-एजेंट का इस्तेमाल रूस ने ही किया है..इसपर रूस ने सफाई देते हुए आरोपों को खारिज ही नहीं किया बल्कि सबूत पेश करने की बात रखी..इसके साथ ही थेरेसा-मे, ने रूसी विदेशमंत्री की फीफा विश्वकप के लिए भेजे निमंत्रण को भी खारिज कर दिया..थेरेसा ने कहा रूस में होने वाले फुटबॉल विश्वकप में शाही-परिवार शामिल नहीं होगा..”ब्लैक सी” को लेकर रूस और नाटो के सहयोगी देशों के बीच तनाव बढ़ता ही रहा..जून 2021 में ब्रिटिश जहाज़ HMS डिफेंडर, रूस की सीमा में 3 किलोमीटर अंदर तक घुस आया तब रूस ने गोलियां चलाई और ब्रिटिश जहाज़ पीछे गया, बाद में ब्रिटेन के रक्षामंत्रालय ने इसका खंडन किया, यह मामला भी बहुत विवादित रहा..कुल मिलाकर नाटो को सबसे अधिक उकसाने व यूक्रेन को भड़काने के काम में ब्रिटेन की भूमिका अग्रणी रही है..अब हमें मॉर्डन हिस्ट्री के कुछ पन्ने खोलकर प्रथम विश्वयुद्ध व दूसरे विश्वयुद्ध के कारणों को समझना होगा, तभी हम तीसरे विश्वयुद्ध के मायने निकाल पाएंगे..में फिर शुरुआत ब्रिटेन से करना चाहूंगा..यह वही ब्रिटेन है जिसके राज में सूरज नहीं डूबा करता था, और इसी तर्ज़ पर फ्रांस और पुर्तगाल भी अपने-अपने साम्राज्य के विस्तार में लग गए और शुरूआती दौर में भारत इनका उपनिवेश बन गया बाद में डच ने भी भारत के कुछ हिस्से को भोगा..

1871 में जर्मनी एकीकरण के पश्चात राजा बिस्मार्क के नेतृत्व में जर्मन ने भी साम्राज्यवाद के विस्तार के लिए कदम बढ़ाये बस यहीं से यूरोपीय देशों का संतुलन बिगड़ने लगा..और ब्रिटेन तथा फ्रांस के लिए चुनौती बन गया..और तब शुरू हुआ मित्र राष्ट्रों का गठन जिसमे यही संधि होती थी कि आपस में युद्ध की स्थिति में एक दूसरे की मदद की जाए..16वीं शताब्दी में अपनी काबलियत के आधार पर सम्पदा से अमीर बने रूस ने इटली से संधि करी..1882 में पहली ट्रिपल संधि जर्मन-आस्ट्रिया+हंगरी और रूस से अलग हुए इटली, के मध्य हुई थी तो दूसरी ओर 1907 में फ्रांस-ब्रिटेन और रूस मित्र राष्ट्र बने..मिल्ट्रीजियम, औद्योगिकी और व्यापार में स्पर्धा, स्क्रेम्बल ऑफ़ अफ्रीका, धार्मिक एकीकरण, बाल्कन प्रदेश और तुर्की की आपसी स्वतंत्रता के मध्य रूस और हंगरी के बिगड़ते रिश्ते, मीडिया द्वारा अफवाहों को फैलाने और वातावरण को दूषित करना, यूनाइटेड नेशन जैसी संस्था का ना होना और 1910 में बर्लिन-बग़दाद रेलवे लाइन को ब्रिटेन द्वारा तहस-नहस कर देना, प्रथम विश्वयुद्ध का कारण बना..दूसरे विश्वयुद्ध का मूल कारण प्रथम विश्वयुद्ध का ठीकरा पूरी तरह जर्मन पर फोड़ना और वार्षाये-संधि के तहत जर्मन पर भयंकर प्रतिबन्ध लगाना, जर्मन के इसी प्रतिशोध ने हिटलर को जन्म दिया और दूसरा विश्वयुद्ध हुआ और युद्ध के अंत में अमरीका द्वारा जापान को परमाणु बम से सबक सिखाकर अमरीका विश्व के नक़्शे पर एक शक्तिशाली दादा बनकर उभरा..प्रथम विश्वयुद्ध से सबक लेकर UNO जैसे बिचौलिये संगठन और एक मिल्ट्री-अलाइंस नाटो का गठन हुआ..शुरूआती दौर में कुछ विकसित देश ही नाटो के सदस्य थे और इन सबके ऊपर था अमरीका..दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप दो विचारधाराओं में बंट गया डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, एक तरफ अमरीका तो दूसरी महाशक्ति सोवियत संघ..यूरोप के छोटे देश किसी रूप में अपने को बढ़ाने या क्रांति की अलख पैदा करते थे तब ये दोनों महाशक्ति अपने-अपने वर्चस्व अनुसार अपनी शक्ति दिखाकर उसे दबा देते रहे इसमें मुख्यता चेकोस्लोवाकिया हंगरी जैसे देश रहे, जिसमे सोवियत संघ की भूमिका अग्रणी थी..चूँकि यूरोप के विकसित मुल्कों ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप की जमीन को युद्ध में शामिल ना करने की सहमति बनाई थी अतः अब ये शक्तियां अफ्रीका और एशिया महाद्वीप के देशों की गतिविधयों पर नज़र गड़ाए रहते थे..एशिया महाद्वीप में भारत ने जहाँ महात्मा गांधी के नेतृत्व में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बिना लाठी-डंडे के बिना जंग जीती

महात्मा गांधी के नेतृत्व में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बिना लाठी-डंडे के बिना जंग जीती वहीँ जापान के शांत होने के बाद, अमरीका ने नार्थ-साउथ कोरिया, वियतनाम आदि और अन्य छोटे बड़े देश को तोडा और छोटे-छोटे देशो में विभाजित कर दिया वियतनाम जो कभी INDO-CHAINA के नाम से जाना जाता था उसके तीन देश लाओस-कम्बोडिया-वियतनाम कर डाला..नार्थ कोरिया ने जो रिपब्लिकन विचार धारा का रहा है उसने डेमोक्रेटिक साउथ कोरिया का 90% क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था 1948-49 में..लेकिन 5-6 बड़े देश का मिल्ट्री एलाइंस जो नाटो था अमरीका ने 21 देशों को नाटो में शामिल कर कोरिया पर हमला कर नार्थ कोरिया को अपनी पुरानी स्थिति में ला दिया था..लेकिन नार्थ कोरिया के लिए चीन उतर आया था और फिर एक बड़ी लड़ाई में अमरीका अमरीका+नाटो, ने चीन तथा नार्थ कोरिया को हरा कर LAC बिना किसी की राय लिए जिसमे नार्थ का हिस्सा साउथ में दे दिया गया..इसी नफरत को नार्थ कोरिया अमरीका के खिलाफ पाले हुए है और परमाणु शक्ति बनकर उचित वक्त के इंतज़ार में है..!
उसके कुछ समय तक यूरोपीय देशों का अत्यधिक विकसित होने की दौड़, अफ्रीकी देशों का गरीबी में जूझना और एशिया में 1962 का चीन भारत युद्ध, 1948 के बाद कश्मीर जद्दोजहद और 1971 में भारत-पाक युद्ध बांग्लादेश का उदय और लगातार भारत-चीन, भारत-पाक सीमा विवाद और इन तीनो देश का परमाणु संपन्न हो जाना, तरह तरह की अटकलों को पैदा होते रहने का क्रम वैसे तो आज भी जारी है..लेकिन भारत द्वारा किसी भी महाशक्ति का पिछलग्गू ना बनकर रहना तथा तीसरा उदार संगठन गुट-निरपेक्ष का गठन कर विश्व के नक़्शे में अपनी विशेष पहचान बनाना, व्यापारिक, सामरिक, सांस्कृतिक, सौहार्द व सद्भावना से निर्मित नीति-सिद्धांतों को लेकर पडोसी देशों के रिश्ते को और अधिक मधुर तथा प्रागढ़ करने का प्रयास के खुलते मार्गों को सरल कर शार्क संगठन का निर्माण कर उसे प्रभावशाली बनाने में भारत के लोकतंत्र की विश्व में सरहाना होने लगी..आधुनिकता के भौतिक व बुनयादी तथा क़्वालिटी की प्रतिस्पर्धा के व्यापारिक रिश्तों की होड़ में तेल (पैट्रोलियम) ने शीर्ष पर अपनी जगह बनाई..कुवैत और इराक का झगड़ा इसी तेल को लेकर शुरू हुआ..सोवियत संघ में गोर्बाचौफ़, डेमोक्रेटिक धारा को पनपाने के उद्देश्य में विफल रहने से सोवियत संघ, अपने ही गृह-युद्ध में अलग अलग टुकड़ों में बिखर रहा था..और इधर अमरीका अन्य पश्चिमी देशो सहित सद्दाम हुसैन को खत्म कर रहा था..अफगानिस्तान-लेबनान-सीरिया के आतंक को दबाने में रूस और अमरीका वर्चस्व को दिखाने में शक्ति लगाते आते रहे..औटोनॉमन देश अपने धार्मिक एजेंडो को बचाने हेतू एकता का परिचय दे रहे है तो वहीँ इज़राइल ने विश्व के नक़्शे पर अपनी योग्यता और काबलियत को प्रस्तुत किया है..!
वर्ष, 2014 में यूरोप और एशिया के एक-एक देश में आश्चर्यजनक घटना घटी रूस ने क्रीमिया को यूक्रेन से अलग कर दिखाया तो भारत की जनता ने देश में फासीवादी ताक़त को सत्ता सौंप दी..रूस-यूक्रेन विवाद आज युद्ध की विभीषिका झेल रहा है तो भारत के नागरिक अपने ही देश कि फासीवादी सत्ता से संविधान और लोकतंत्र को बचाने की जद्दोजहद कर रहे है, हर मामले में फेल फासीवादी सरकार की प्रभावहीन आर्थिक नीति ने देश को इतना खोखला कर दिया कि उस आर्थिक घाटे की भरपाई के लिए देश के बहुकीमती संसाधन ओने-पौने दाम में बेचे जा रहे है..आज जो दुनियां में युद्ध की स्थिति हो रखी है यदि इसने विकराल रूप ले लिया तो हमारा देश भारत शायद बिना लड़े ही किसी के आगे नतमष्तक हो जाएगा..आज भारत उस स्थिति पर है कि छोटे से छोटे देश से भी हम एक सप्ताह से अधिक युद्ध नहीं कर सकते..जब दुनियाँ विकास की और बढ़ रही थी तब भारत में फासीवादी सत्ताधारी वैमनष्य-तुस्टीकरण, हिन्दू-मुस्लिम, गाय तथा गाय मूत्र और गोबर के लाभ को महत्व दे रहे थे..आर्थिक मामलें हों, विकास के मामले हों, गुटनिरपेक्ष संगठन और शार्क के महत्व को गौण कर चुके थे, हमारा देश भारत कौन है किसके साथ है ना अमरीका पूछ रहा है ना ही रूस..फासीवादियों ने भारतीय लोकतंत्र की पहचान को खत्म ही कर दिया है..रूस तो यूक्रेन का सत्ता परिवर्तन कर बातचीत के रास्ते खोल सकता है, लेकिन जर्मन की वार्षाये संधि में लगे प्रतिबन्धों ने जैसे दूसरे विश्वयुद्ध की नीँव डाली थी..तो क्या रूस पर लगे प्रतिबन्ध तीसरे विश्वयुद्ध की नींव डाल चुकी है ? इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता..फासीवादी ताक़त और सत्ता वर्तमान में, गांधी मार्ग के अजर-अमर सिद्धांत के दिशा की रोज हत्या करती है, लेकिन फिर भी गांधी जिन्दा हैं..बस समझना होगा उस दार्शनिक नेता डॉ० लोहिया के सुझाए दर्शन को, कि गांधी और परमाणु में विजय किसकी होगी ? शायद परमाणु, गांधी से हार जाए..!!
(लेखक, राजनैतिक सामाजिक चिंतक है)





