युवाओं को सेवा, श्रम और राष्ट्रभाव से जोड़ने वाले प्रख्यात गांधीवादी डॉ. एस.एन. सुब्बाराव ‘भाईजी’ का जीवन स्वयं एक चलता-फिरता संदेश था। सीमित साधनों में उन्होंने देशभर में युवा चेतना की मशाल जलाई और गांधी विचार को व्यवहार में उतारा। उनकी जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को जिम्मेदार नागरिकता की दिशा में प्रेरित करने का भी आह्वान है।
अशोक चौधरी
07 फरवरी को डा. एस. एन. सुब्बाराव जिन्हें प्यार से सभी ‘भाईजी’ कहकर संबोधित करते थे, उनकी जयंती है। 27 अक्टूबर, 2021 को सुब्बाराव जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन उनके काम व उनकी विचारधारा जिसके केन्द्र में सदैव युवा रहे हमें सदैव प्रेरणा देती रहेगी। हमारे भविष्य के लिए आज भी उनका बहुत महत्व है।
महात्मा गांधी द्वारा स्थापित और उनके बलिदान के पश्चात् गांधीजी के काम को विस्तार देने के लिए बहुत सी संस्थाए स्थापित की गई लेकिन उन्होनें जनता के मध्य उतनी लोकप्रियता व जनसर्मथन हासिल नहीं किया जितनी उम्मीद की गई थी। आज के गांधी युग में सुब्बराव जी एक अपवाद स्वरूप ही थे जिनके पास कोई बहुत बड़ी संस्था या ज्यादा संसाधन नहीं थे लेकिन उन्होंने देश के लाखों युवाओं को गांधी शिविरों के माध्यम से न केवल गांधी विचार से अवगत कराया बल्कि उन्हें प्रशिक्षित कर शांति, अहिंसा व रचनात्मक कार्यो में भी लगाया। महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’, सुब्बराव जी के जीवन में यह बात स्पष्ट झलकती थी। वे गांधी विचारों व रचनात्मक कार्यो की एक चलती फिरती पाठशाला व प्रयोगशाला थे।
विश्वविद्यालयों कालेजों व स्कूलों में संचालित राष्ट्रीय सेवा योजना, जिसे एन.एस.एस. के नाम से जानते है सुब्बराव जी की ही देन है। 1969 में गांधी जन्म शताब्दी वर्ष के दौरान एन.एस.एस. की स्थापना की गई जिसके मूल में देश के छात्र-छात्राओं तक गांधी विचारों के माध्यम से सेवा के संस्कार देना था। एन.एस.एस. के द्वारा देश के लाखों छात्र प्रतिवर्ष शिक्षा के साथ सामाजिक जिम्मेदारी का दायित्व भी निभाना सीखते है।
आज की पीढी के जितने युवा है और जिनकी रूचि महात्मा गांधी में है, उनमें सुब्बराव जी बहुत लोकप्रिय है। उनके द्वारा देश के कोने-कोने में लगाए गए हजारों युवा एकता शिविरों में भाग लेने वाले युवा एक नई दृष्टि और नई सोच के साथ वापस अपन घर लौटते थे हालांकि उनमें ज्यादातर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय नहीं होते परन्तु बहुत से लोग आज सुब्बराव जी की प्रेरणा से ही सेवा के क्षेत्र में काम कर रहे है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, जलपुरूष राजेन्द्र सिंह, पी.वी. राजगोपाल उन्हीं में से एक है।
सुब्बराव जी के युवा शिविरों की खासियत उनके द्वारा गाए जाने वाले युवा गीत व खेल थे। उन्होंने भारत की संतान नाम से एक भाषाई एकता का कार्यक्रम बनाया जब वे उसका मंचन करवाते थे तो विराट भारतीय संस्कृति जीवंत हो जाती थी। भारत देश में भाषाई विविधता बहुत है और आज देश के अधिकांश भागों से भाषाई आधार पर भेदभाव के समाचार सुनने को मिलते है, ऐसे में सुब्बराव जी ने भारत की एकता व अखंडता के लिए भारत की संतान भाषाई कार्यक्रम दिया जिनसे लोगों के मन में भारत की अन्य भाषाओं के प्रति स्नेह व प्रेम पैदा हुआ।
सुब्बराव जी देश में जहां कहीं भी जाते थे वहां वो प्रेरणादायक युवा गीत गाते थे जिससे युवा न केवल उनकी तरफ आकर्षित होते बल्कि उनसे जुड़ते थे। भारत भर में लगाए गए युवा शिविरों के कारण ही आज लाखों युवा गांधी विचार में अग्रसर है।
देश में एक तरफ बहुत से बड़े-बड़े गांधीवादी संस्थान है, जिनके क्षेत्रीय केन्द्र व शाखाएं भी संचालित है। जहां पुस्तकालय वाचनालय सहित बहुत से संसाधन है लेकिन वहां आने वाले युवाओं की संख्या बहुत कम है। दूसरी तरफ सुब्बराव जी नई दिल्ली के दीन दयाल उपाध्याय मार्ग स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक कमरे में स्वयं रहते भी थे और उनके द्वारा स्थापित नेशनल यूथ प्रोजेक्ट अर्थात एनवाईपी के कार्यालय को भी संचालित करते थे। नेशनल यूथ प्रोजेक्ट भारत का सबसे सक्रिय व युवाओं में लोकप्रिय ख्याति प्राप्त गांधीवादी संस्थान था।
सुब्बराव जी ने देश के सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के लिए एक मिसाल भी कायम की है कि यदि मन मे लगन व मिशन हो तो बिना अधिक संसाधनों, भवनों के भी रचनात्मक कार्य निरंतरता से किए जा सकते है।
सुब्बराव जी ने अपने युवा एकता शिविरों में श्रमदान को श्रम संस्कार के रूप में प्रचारित किया। उन्होंने एक घंटा देश को व एक घंटा देह को का नारा दिया जिसने सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त की। उनका पूरा जीवन यायावरी अर्थात् यात्राओं में बिता। पूरा देश ही उनका परिवार था। हर शहर में उनके चाहने वाले गांधीवादी कार्यकर्ता व लोग थे जो सुब्बराव जी के लिए तत्पर रहते थे। वो जिस शहर में भी जाते थे वंहा के स्कूलों में अवश्य जाते थे और छोटे बच्चों को गुब्बारे फुलाकर देते थे तो बच्चे उन्हें अपना प्रियजन मानते थे। ये सहज स्नेह व प्रेम सुब्बाराव जी का देश के बच्चों के प्रति था।
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महात्मा गांधी ने सत्य के प्रयोग किए, संत विनोबा भावे ने क्रान्ति आरोहण एवं जयप्रकाश नारायण ने क्रान्ति शोधन की बात कही उसी प्रकार सुब्बराव जी ने श्रम संस्कार, युवा प्रशिक्षण के माध्यम से देश में अहिंसा दर्शन को मजबूत किया। शायद जयप्रकाश नारायण के बाद सुब्बराव जी ही थे जो गांधी सर्वोदय के क्षेत्र में शीर्ष पर थे लेकिन वो कभी किसी बड़े गांधीवादी संस्थान के मुखिया नहीं रहे उन्होंने स्वयं के स्तर पर जो काम किया वे आने वाली सदियों तक भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक बुनियाद को मजबूत करेगा।
बदलाव केवल भाषण से नहीं बल्कि सहभागिता से आता है सुब्बराव जी ने युवाओं के साथ मिलकर काम किया, पसीना बहाया उनके द्वारा स्थापित महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा उनके कार्यो की रचनात्मक प्रस्तुति है। आज 21वीं सदी के युवा के रूप में सुब्बराव जी हमें श्रमसंस्कार, सेवा, आत्मखोज, नैतिकता व मानवीय मूल्यों की प्रेरणा देते है।






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