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द्रौपदी मुर्मु का राष्ट्रपति होना !

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सुसंस्कृति परिहार

बहुत जल्द ही राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है। राष्ट्र पति को संवैधानिक दृष्टि से जितना बड़ा सम्मान दिया जाता है ,उतने अधिकार उसके पास नहीं।यह कहा जाए तो व्यवस्थापिका का एक तरह का गुलाम ही है।पहले राष्ट्रपति देश में एक बड़ा सम्मानित व्यक्तित्व चुना जाता था जिससे देश गौरवांवित महसूस करता था डा राजेंद्र प्रसाद, सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन , जाकिर हुसैन,वैज्ञानिक अब्दुल कलाम के नाम ऐसे ही हैं।

जबसे पार्टी से जुड़े व्यक्ति इस पद पर आने लगे हैं तब से राष्ट्रपति पद राजनैतिक हो गया अब तो राष्ट्रपति का इस्तेमाल वोटों के लिए भी होने लगा है।यह काम पिछले राष्ट्रपति चुनाव से ज्यादा बढ़ा है। वर्तमान राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविंद को जो दलित समुदाय से आते हैं तब बनाया गया जब दक्षिण में दलित आंदोलन बहुत मुखर रुप से चल रहा था।मरे जानवर ना उठाने के संकल्प ने बस्तियों को बदबू से भर दिया था।दूसरी ओर हैदराबाद सेंट्रल विश्वविद्यालय के शोधकर्ता छात्र रोहित वेमुला के साथ हुए अमानवीय कृत्य ने उसे आत्महत्या करने प्रेरित किया।जिसका जबरदस्त विरोध जारी था।तब दलितों की ख़ुशी के लिए रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया गया।जबकि उनके कार्यकाल में दलित उद्धार के निमित्त लेशमात्र भी काम नहीं हुआ।इतना ही नहीं हाथरस कांड और सुनीता के हाथ से भोजन ना ग्रहण करने वालों बच्चों को उकसाने वालों पर दो शब्द भी महामहिम नहीं बोले।उल्टे दलित उत्पीड़न बढ़ा ही है।राष्ट्रपति जी ने सिर्फ अपनी गरिमा बचाते हुए लगभग कठपुतली की तरह ही काम किया है ।वे पहले राष्ट्रपति हुए जिन्होंने संवेधानिक नियमों को तार तार कर प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष को झुकझुक सलाम किया।वे प्रधानमंत्रीजी के साथ लाल कारपेट पर नीचे चलते हमेशा नज़र आए।वे 22जुलाई को सेवानिवृत्त हो जायेंगे।उनका कार्यकाल कतई अच्छा नहीं कहा जा सकता । इस बीच दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन याद आते हैं जिन्होंने कम से कम अटल सरकार की फाईल लौटाने का साहस दिखाया था।उन्होंने राष्ट्रपति के रूप में अपनी विवेकाधीन शक्तियों का इस्तेमाल किया और कई स्थितियों में परंपरा और मिसाल से विचलित हो गए, जिसमें – लेकिन इतनी ही सीमित नहीं है – एक त्रिशंकु संसद में प्रधान मंत्री की नियुक्ति, एक राज्य सरकार को बर्खास्त करने और राष्ट्रपति शासन लगाने मेंवहाँ केंद्रीय मंत्रिमंडल के सुझाव पर और कारगिल संघर्ष के दौरान उनका हस्तक्षेप महत्वपूर्ण रहा।

बहरहाल, कोविंद के बाद पूरी संभावना है कि उड़ीसा में जन्मी झारखंड की पूर्व राज्यपाल एवं पूर्व मंत्री द्रौपदी मुर्मू पहली महिला आदिवासी राष्ट्रपति बन रही हैं किन्तु जैसा कि कहा जा रहा है वे भी कोविंद की तरह ही भाजपा के इशारों पर काम करेंगी तो उनके राष्ट्रपति बनने का कोई मतलब नहीं।वे अगर जुझारू,कर्मठ और आदिवासी समाज की मुखिया की हैसियत से यह जिम्मेदारी संभालती हैं तो उनका
प्रथमत: ध्यान आदिवासियों के जल,जंगल,जमीन और जमीर की रक्षा हेतु होना चाहिए। आदिवासी समाज को वनवासी कहने पर पाबंदी लगवानी होगी। सिर्फ आपकी खुशहाली और महामहिम बन जाने का तभी महत्त्व होगा जब देश के लिए कुछ नया कीर्तिमान बनाया जाए।आज देश में साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वाले खुलकर सरकार के संरक्षण में काम करते हैं उन पर लगाम ज़रुरी है। बेरोजगार युवाओं के साथ जिनमें बहुसंख्यक,दलित और पिछड़े जाति के बच्चे हैं उन्हें जो अग्निपथ का रास्ता दिखाया गया है उस पर आपत्ति दर्ज़ कराने आगे आएं।देश इस समय बहुत गंभीर संकटापन्न स्थिति में है उस पर आपकी प्रतिक्रिया मायने रखेगी।आपके साथ देश की जनता है जो अप्रत्यक्ष तौर एकल संक्रमणीय मतदान से आपको चुनेगी उनका ख्याल रखना आपका कर्तव्य होगा।
उम्मीद है इस विजय के बाद आप सिर्फ अपने कर्तव्य और अधिकारों पर अडिग रहेंगी।पूरे पांच साल आपको मिलेंगे।राष्ट्रपति भारत में राज्य का प्रमुख होता है। उन्हें देश का प्रथम नागरिक माना जाता है. यह देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 52 में कहा गया है कि भारत का एक राष्ट्रपति होगा और अनुच्छेद 53 के अनुसार, संघ की सभी कार्यकारी शक्तियाँ उसके द्वारा या तो सीधे या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से निष्पादित की जाएंगी। हो सकता है सरकार को आपसे दिक्कत आए पर आपके ये कदम भारतीय राष्ट्रपति की गिरती गरिमा की साख बचाएगी। अमूनन आपके तमाम अधिकार सरकार के हाथ में होते हैं उसे उनके इशारों पर चलना होता है किन्तु ग़लत का विरोध और अपनी इच्छाओं को सामने रखना आपकी जिम्मेदारी होगी। इससे राष्ट्रपति का सम्मान देश दुनिया में बढ़ेगा।एक आदिवासी महिला राष्ट्रपति यदि विरल इतिहास रचेगी तो देश के लिए गर्व का विषय होगा वरना जी हुजुरी करने वालों की परिपाटी में यह देखा जा सकता है उनकी समाज में कोई कद्र नहीं होती।किसी ने क्या ख़ूब कहा है—
आजकल मौका परस्ती भी अकीदत बन गई,
फायदा जिससे हुआ उसको ख़ुदा कहने लगे।

Ramswaroop Mantri

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