शशिकांत गुप्ते
राम भक्तों के राज्य में हनुमानजी के नाम पर बने दल के सदस्यों अर्थात भक्तों पर लाठियों का प्रहार।
नशे की पुड़ियों की अहर्निश उपलब्धता के विरोध में पिटाई?
पुलिस के द्वारा सत्ता के सहयोगियों की ही पिटाई से प्रदेश के मुखिया की निष्पक्षता प्रमाणित होती है।
मादक पदार्थों का सेवन करने से देश के भावी कर्णधार नशे में मदहोश हो रहे है। यह सिर्फ चिंताजनक ही नहीं,निंदनीय भी है।
मादक पदार्थो के उपभोक्ताओं के उपभोग के लिए, मादक पदार्थ की अहर्निश उपलब्धता को सहज, सुलभ बनाने के लिए Night Culture का, दोष बताया जा रहा है।
Night culture का हिंदी अनुवाद होता है,निशा संस्कृति। क्या संस्कार और संस्कृति की दुहाई देने वाले कभी भी रात्रि कालीन संस्कृति के पक्षधर होंगे? कतई नहीं।
क्या संस्कार और संस्कृति के साथ धार्मिक आस्था के समर्थक राजस्व की आय बढ़ाने मात्र के लिए अहर्निश मादक पदार्थों की उपलब्धता के दोषी हो सकते हैं? कतई नहीं।
जो भी हो मादक पदार्थो के विरोध में आवाज उठाने के लिए, बजरंग दल को सलाम।
मादक पदार्थ की उपलब्धता कैसे होती है? कौन जिम्मेदार? किसकी जवाबदेही? इन सभी प्रश्नों का कभी उत्तर मिलेगा?
काश प्रदेश में संस्कार और संस्कृति के समर्थको की सरकार नहीं होती तो,उग्र आंदोलनों के साथ सरकार पर गंभीर आरोपों का प्रहार होता?
नशा तो नशा होता है,वह चाहे पुड़ियों में मिलने वाले मादक रसायनिक पाउडर का हो,देशी या विदेशी का हो?
इन दिनों सत्ता भी एक तरह का नशा ही तो हो गई है।
जिस तरह मादक पदार्थों का नशा करने वाले मादक पदार्थो की बिक्री पर कितना ही कड़ा पहरा हो अपनी खुराक प्राप्त कर ही लेते हैं,चाहे उन्हे मादक पदार्थ ब्लैक में ही क्यों न क्रय करना पड़े? ठीक इसी तरह सत्ता के नशे में चूर लोग,बहुमत हो या न हो,मतदाताओं ने भले ही विरोध में मतदान किया हो,खरीद फरोख्त कर,बिकाऊ लोगों को ढूंढ कर सत्ता में विराजित हो ही जाते हैं।
हर तरह के नशे पर गीतकार शकील बदायुनी रचित गीत की कुछ पंक्तियों का स्मरण होता है।
किसी को नशा हैं, जहां में खुशी का
किसी को नशा हैं, गम-ए-जिंदगी का
कोई पी रहा हैं, लहू आदमी का
जमानें के यारों, चलन हैं निराले
यहा तन हैं उजले, मगर दिल हैं काले
अब निम्न तरह का स्लोगन प्रचारित होना चाहिए,ना तो नशा करूंगा ना ही करने दूंगा
नशे का समझ में आता है लेकिन ना खाऊंगा ना खाने दूंगा यह स्लोगन अन्य मूलभूत समस्याओं की तरह अनुत्तरित प्रश्न बन कर रह गया है।
इस स्लोगन में यह स्पष्ट नहीं होता है क्या,और कौनसा खाद्य पदार्थ खाने और खाने न देने के लिए कहा गया है?
राज को राज रहने दो
राज खुलने का तुम अंजाम सोच लो
शशिकांत गुप्ते इंदौर





