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आसमान छू रही महंगाई से जनता और तबादला उद्योग में अफसरों की बेरुखी से नेता व दलाल परेशान?

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भोपाल। )। मध्यप्रदेश के इतिहास में वैसे जो जब-जब तबादला उद्योग चला तब-तक सत्ताधीशों राजनेताओं और तबादला उद्योग से जुड़े दलालों की चांदी ही रही, वैसे तो हमेशा तबादला उद्योग को लेकर हमेशा सड़क से लेकर सदन तक खूब हंगामा मचा तो एक समय ऐसा भी था जब प्रदेश में दिग्विजय सिंह की सरकार थी उस समय भाजपा के नेताओं ने दिग्विजय सिंह के शासनकाल में चले तबादला उद्योग के दौरान जारी हुई समाचार पत्रों में तबादला सूची की कतरनों को लेकर विधानसभा में भाजपा के विधायकों ने समाचार पत्रों के अखबरों की करतनें तक लहराई थीं? विगत दिनों कमलनाथ व दिग्विजय सिंह के पुत्र मोह के चलते १५ वर्षों से सत्ता का वनवास भोग रही कांग्रेस जब प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई तो उस दौरान इन दोनों मिनिस्टर और सुपर चीफ मिनिस्टर ने कमलनाथ के सत्ता पर काबिज होते ही जमकर तबादला उद्योग का खेल खेला जिसको लेकर राजधानी में इस तरह की स्थिति रही कि वल्लभ भवन की पांचवीं मंजिल तो दलाली का अड्डा तो बन गया था यही नहीं शायद ही वल्लभ भवन का कोई फ्लोर अछूता रहा हो जहां बैठे राजनेताओं के कमरे के आगे तबादला उद्योग से जुड़े लोगों की भीड़ देखी जाती थी तो वहीं राजधानी के तमाम होटलों में लोक निर्माण मंत्री सज्जनङ्क्षसह वर्मा के नाते-रिश्तेदारों ने दलाली का अड्डा बना रखा था,

उस दौरान यह चर्चा भी खूब चली कि लोक निर्माण विभाग का अधिकारी सज्जन वर्मा के रिश्तेदारों से तबादले की चर्चा करने जाते थे तो उनके मोबाइल वहां रखवा लिये जाते थे यही नहीं इसी दौरान तत्काल लोक निर्माण मंत्री सज्जन ङ्क्षसह वर्मा के रिश्तेदारों की तबादलों की दलाली करने की खबरें जब समाचार पत्रों की सुर्खियां बनीं तो उस दौरान वर्मा बीमारी का बहाना बनाकर एक निजी अस्पताल में भर्ती रहे लेकिन जितने दिनों वह उस अस्पताल में भर्ती रहे उस दौरान वह अस्पताल में तबादला चाहने वाले अधिकारियों ने उनसे संपर्क साधकर सौदेबाजी करके अपना मनचाही पदस्थपना पाने में सफलता हासिल की थी? पूर्व कमलनाथ सरकार के दौरान शायद ही कोई ऐसा कमाईवाला विभाग का पद रहा हो जिसमें मनमचाही पदस्थापना पाने के लिये अपने पद के अनुुसार मंत्रियों और उनके दलालों को मुंहमांगी रकम दी तो वहीं कमलनाथ की सरकार के कार्यकाल के दौरान यह चर्चा भी बड़ी जोरों पर रही कि लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री के स्थानान्तरण की बोली ३० से ३५ हजार रुपये तक तय होती थी अब यह तो कमलनाथ और उनके मंत्री ही बता सकते हैं कि उन्होंने कमलनाथ सरकार में चले तबादला उद्योग में किस पद के किस अधिकारी को मनचाही पदस्थापना की क्या दर निर्धारित थी, लेकिन कमलनाथ सरकार के दौरान लोगों को दिग्विजय सिंह के शासनकाल में जब छत्तीसगढ़ सहित संयुक्त मध्यप्रदेश होता था जब राजधानी के पांच सितारा होटल से लेकर छोटे होटलों तक के कमरे स्थानान्तरण कराने वाले दलालों व अधिकारियों से भरे रहते थे, उसकी याद दिला दी, कमलनाथ की सरकार में यह भी इतिहास के पन्ने में लिखा गया कि पूर्व शासन में भले ही किसी तरह का लेनदेन हुआ हो लेकिन कभी भी वल्लभ भवन की पांचवीं मंजिल को दलाली का अड्डा बनाने का आरोप किसी मुख्यमंत्री पर नहीं लगा यह अलग है कि पांचवीं मंजिल पर बैठे सत्ताधीशों के विभागों से जुड़ी दलाली या तो शिवराज सरकार में हमेशा चर्चाओं में रही सत्ता की अदृश्य देवी ने तबादला उद्योग का खेल खेला हो या फिर सत्ता के दलालों ने लेकिन जिस तरह का आरोप शिवराज सिंह के द्वारा कमलनाथ पर पांचवीं मंजिल को दलाली का अड्डा बनाने का आरोप लगाया गया इस तरह का आरोप किसी भी शासनकाल में नहीं लगा आज भले ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के श्रीमुख से की गई घोषणा के अनुसार एक जुलाई से ३१ जुलाई तक इस प्रदेश में तबादला उद्योग महाभियान का दौर जारी हो लेकिन तबादला उद्योग की स्थिति यह है कि कोरोना महामारी के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सारे विभागों ही नहीं बल्कि जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा निधि तक की राशि कोरोना महामारी के नाम पर खर्च कर डाली तो वहीं ऐसी ही स्थिति में बड़वानी कलेक्टर शिवराज सिंह वर्मा जो कभी मलाईदार विभाग में अपनी पदस्थापना के दौरान लोगों को नोटिस जारी करने के नाम का इतिहास बनाकर भजकलदारम् का खेल खेल चुके हैं उन्हीं शिवराज सिंह वर्मा को जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सिंधिया व उनके समर्थकों के द्वारा दिये गये उधार के सिंदूर से मुख्यमंत्री बनने के बाद जो खेल कोरोना महामारी के नाम पर खेला गया, शिवराज सिंह के शासनकाल में संपन्न हुए सिंहस्थ की तर्ज पर बड़वानी के कलेक्टर शिवराज सिंह वर्मा ने कोविड-१९ के बचाव के समय खरीदे गये ऑक्सीजन कंस्ट्रेटर की पोल उनके ही जिले में पदस्थ अपर कलेक्टर लोकेश कुमार जांगिड़ ने जो पोल खोलकर रखी थी उसके बाद जो हंगामा प्रशासनिक स्तर पर हुआ था लेकिन मजे की बात यह है कि बड़वानी के कलेक्टर शिवराज सिंह वर्मा का कुछ मुख्यमंत्री कुछ भी नहीं बिगाड़ सके सूत्रों के अनुसार वर्मा भी शिवराज सिंह की किरार जाति के होने को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों में यह चर्चा जोरों पर है कि मुख्यमंत्री के समाज के होने की वजह से उनका मुख्यमंत्री कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं वैसे भी प्रशासनिक स्तर में और जहां किरार बाहुल्य जाति ग्रामों में लोकोक्ति भी चर्चा में है कि ”किरार कहे करतार से दे दो मुझको दो बैल, पहले जोतूं मरघटा बाद में जोतूं गेलÓÓ हालांकि किरार समाज में चर्चित इस किवदंती को लेकर किरार समाज के लोगों का कहना है कि यह किवदंती तो हमारे बुजुर्गों के संबंध में हुआ करती होगी लेकिन जब इस तरह की चर्चा किरार समाज के लोग किसी से करते हैं तो लोग यह कहते नहीं चूकते कि आपकी रगों में आखिर खून तो उन्हीं बुजुर्गों का है जो करतार से दो बैल मांगा करते थे, लेकिन उन बैलों का उपयोग वह अपने खेतों में खेतीबाड़ी के लिये नहीं बल्कि मरघटा और गेल जोतने में रुचि रखते थे, हालांकि किरार समाज की इस किवदंती को लेकर शिवराज सरकार की कार्यशैली को भांपते हुए भी कुछ भाजपाई नेता यही कहते नजर आते हैं कि शिवराज सरकार की कार्यशैली भी ठीक उसी तरह से चल रही है जैसा कि उनके समाज के बारे में किवदंती चर्चित है, यदि उन भाजपाई नेताओं की बातों पर भरोसा करें तो इस प्रदेश की जनता ने शिवराज सिंह के पहले १५ साल और अभी ज्योतिरादित्य सिंधिया व उनके समर्थकों के उधार के सिंदूर से बने चौथी बार के मुख्यमंत्री के समय की कार्यशैली को देखकर तो यह किवदंती प्रमाणित होती नजर आ रही है और कोरोना जैसे महामारी के काल में भी इस प्रदेश के हर वर्ग ने शिवराज सिंह के श्रीमुख से निकली घोषणाओं और उनके अमल को लेकर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि वह एक शोमेन की तरह लोगों को गुमराह और भ्रमित करने का ढिंढोरा पीटते हैं लेकिन हकीकत में जो वह कहते हैं वह होता नहीं है यही स्थिति प्रदेश में विकास की है? लेकिन यही स्थिति देख ली जाए तो शिवराज के शासनकाल में किरार समाज के बारे में चर्चित किवंदती के अनुरूप ही इस प्रदेश की सरकार चलाकर शिवराज ने इस प्रदेश की जनता को भ्रमित और गुमराह करने का काम जमकर समाचार पत्रों व मीडिया में विज्ञापन देकर अपनी वाहवाही लूटी लेकिन जमीनी स्तर पर जो शिवराज और उनके मंत्रिमण्डल के सदस्य विकास का दावा करते हैं वह कहीं नजर नहीं आता, हां यह जरूर है कि विकास के नाम पर गुणवत्ता विहीन भेरूबाबा तो जरूर खड़े हुए हैं तो विद्युतीकरण के नाम पर लगाये गये झुकते बिजली के खंभे इस सरकार के भ्रष्टाचार की गवाही देते नजर आते पूरे प्रदेश में नजर आते हैं तो कहीं-कहीं तो यह स्थिति बनती है तो जो निर्माण कार्य किया जाता है वह एक लात मारने से भरभराकर गिर जाती है, इसका प्रमाण तो राज्य के ऊर्मा मंत्री प्रद्मुन सिंह तोमर के द्वारा ग्वालियर में एक निर्माणाधीन भवन के मामले में उजागर कर सके हैं, तो वहीं २०२१-२२ के बजट को लेकर शिवराज सरकार ने सबसे अधिक बजट होने का खूब ढिंढोरा पीटा, लेकिन वह बजट भी कोविड-१९ कोरोना संक्रमण महामारी के दौर की भेंट चढ़ गया यही वह सब कारण हैं जिनकी बदौलत आज प्रदेश में एक से ३१ जुलाई तक चल रहे तबादला उद्योग महाभियान में अधिकारियों की रुचि नहीं है और उसे देखते हुए जहां सत्ताधीश, राजनेता और सत्ता के दलाल परेशान हैं तो वहीं कई मंत्री और उनका स्टाफ भी परेशान है जहां स्थानान्तरण कराकर मनचाहा पद पाने वाले अधिकारियों की भीड़ कम ही नजर आ रही है और इसे देखकर अब पूर्व कमलनाथ सरकार में तबादला उद्योग के बढ़े दाम भी नीचे आ गये हैं? लेकिन उसके बाद भी तबादला कराने में अधिकारी रुचि नहीं ले रहे हैं? कई मंत्रियों की स्थिति तो यह हो गई कि वह इस महाअभियान के दौरान वन मंत्री विजय शाह जैसे मंत्री तो अपने भ्रमण के दौरान अधिकारियों से यह तक पूछते हैं कि तुम्हें यहां कितने वर्षों से पदस्थ हो तो कोई दो, तीन, चार या पांच वर्ष तो उनका जवाब होता है कि तुम्हें कहीं जाना नही है विजय शाह की इस तरह की विभाग के अधिकारियों से पूछताछ को लेकर यह चर्चा जोरों पर है कि शायद विजय शाह के पास वन विभाग के अधिकारी स्थानान्तरण कराने के लिये नहीं जा रहे हैं उसे लेकर वह परेशान हैं विजय शाह जैसी स्थिति इस प्रदेश के कई मंत्रियों की है तो वहीं शिवराज सरकार व उनके शासनकाल में दखलंदाजी के लिये चर्चित सत्ता की अदृश्य देवी के दलालों की मेहरबानी से यदि शिवराज मंत्रिमंडल में वह तमाम राज्यमंत्री इसलिये परेशान हैं कि उनके पास तबादला उद्योग की बहती गंगा में डुबकी लगाने के लिये कोई अधिकार नहीं है और वह केवल झंडे, डंडे और गाड़ी के फेर में मंत्री बने बैठे हैं कुल मिलाकर तबादला उद्योग के इस दौर में कमाई वाले विभाग आबकारी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के इमरती देवी के चुनाव हारने से त्यागपत्र देने के बाद महिला विभाग के प्रमुख सचिव अशोक शाह भी जमकर भजकलदारम् का खेल खेल रहे हैं शायद इसी की वजह से विभाग की स्वाति मीना नायक के अवकाश पर चले जाने की चर्चा भी जोरों पर है तो वहीं आबकारी विभाग के मंत्री जगदीश देवड़ा हैं लेकिन विभागीय अधिकारियों की मानें तो इस विभाग में दखलंदाजी तो शिवराज सरकार में शुरुआत से चर्चित सत्ता की अदृश्य देवी की जमकर चल रही है और उनके दलालों से सम्पर्क कर आबकारी विभाग के तमाम अधिकारी आज चैन की छान रहे हैं तो वहीं जिन माफियओं को शिवराज दस फीट अंदर जमीन में गाडऩे की चेतावनी देते हैं तो वह माफिया सत्ता की अदृश्य देवी का आशीर्वाद पाकर वह अवैध शराब के कारोबारी अपनी मनचाहे अधिकारियों की पदस्थापना कराने में सफलता प्राप्त कर रहे हैं यही स्थिति रेत के अवैध खनन के कारोबारियों की है जहां धड़ल्ले से मंत्री ही नहीं प्रशासनिक अधिकारियों की नजरों के सामने धड़ल्ले से अवैध उत्खनन की रेत ले जाने वाले डम्पर फर्राटे भरते नजर आ रहे हैं कुल मिलाकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा दो बार तबादला उद्योग को टालने के बाद एक से ३१ जुलाई तक जो तबादला महाकुंभ प्रारंभ जिस उद्देश्य से किया था उसकी पूर्ति की असफलता को देखते हुए कई मंत्री और उनके स्टाफ परेशान है तो वहीं तबादला उद्योग में रुचि लेने वाले राजनेता ही नहीं बल्कि तबादला उद्योग से जुड़े सत्ता के दलाल भी इन दिनों काफी परेशान हैं, इसका अंदाजा वन मंत्री विजय शाह के द्वारा अपने जिलों के प्रवास के दौरान अधिकारियों से तुम कबसे यहां पर जमे हो यह पूछने से उजागर हो जाता है? कुल मिलाकर जहां इस प्रदेश की जनता एक ओर बढ़ती महंगाई की मार से बेहाल है तो वहीं कोविड-१९ कोराना महामारी के दौरान प्रदेश के किसी भी विभाग से बजट नहंी होने से खाली हाथ बैठे अधिकारियों द्वारा भी तबादला उद्योग में रुचि नहीं दिखाने से तबादला उद्योग के भाव जमीन पर आ गये हैं यही वजह है कि वन मंत्री विजय शाह अधिकारियों से कबसे पदस्थ होने की चर्चा करते नजर आ रहे हैं?

Ramswaroop Mantri

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