सुधा सिंह
*वैदिक धर्मग्रंथ :*
हिन्दू धर्मग्रंथ : देशी और विदेशी शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के अनुसार संस्कृत में लिखे गए ‘ऋग्वेद’ को दुनिया की प्रथम और सबसे प्राचीन पुस्तक माना जाता है। हिन्दू धर्म इसी ग्रंथ पर आधारित है। इस ग्रंथ को इतिहास की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण रचना माना गया है। प्रोफेसर विंटरनिट्ज मानते हैं कि वैदिक साहित्य का रचनाकाल 2000-2500 ईसा पूर्व हुआ था।
लिखित रूप से पाया गया ऋग्वेद इतिहासकारों के अनुसार 1800 से 1500 ईस्वी पूर्व का है। इसका मतलब कि आज से 3 हजार 815 वर्ष पूर्व इसे लिखा गया था। हालांकि शोधकर्ता यह भी कहते हैं कि वेद वैदिककाल की वाचिक परंपरा की अनुपम कृति है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिछले 6-7 हजार ईस्वी पूर्व से चली आ रही है, क्योंकि इसमें उक्त काल के ग्रहों और मौसम की जानकारी से इसकी प्राचीनता सिद्ध होती है।
खैर, हम यह मान लें कि 3 हजार 815 वर्ष पूर्व लिखे गए अर्थात महाभारत काल के बहुत बाद में तब लिखे गए, जब ह. अब्राहम थे जिनको इस्लाम में इब्राहीम कहा जाता है। महान खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईसा पूर्व में हुआ यानी 5152 वर्ष पूर्व। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी।
शोधानुसार पता चलता है कि भगवान राम का जन्म आज से 7129 वर्ष पूर्व अर्थात 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था। चैत्र मास की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि वेदों का सार उपनिषद और उपनिषदों का सार गीता है। 18 पुराण, स्मृतियां, महाभारत और रामायण हिन्दू धर्मग्रंथ नहीं हैं। वेद, उपनिषद और गीता ही धर्मग्रंथ है।
जैन धर्म का मूल भारत की प्राचीन परंपराओं में रहा है। आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है।
जैन धर्म की प्राचीनता प्रामाणिक करने वाले अनेक उल्लेख वैदिक साहित्य में प्रचुर मात्रा में हैं। अर्हंतं, जिन, ऋषभदेव, अरिष्टनेमि आदि तीर्थंकरों का उल्लेख ऋग्वेदादि में बहुलता से मिलता है जिससे यह स्वतः सिद्ध होता है कि वेदों की रचना के पहले जैन-धर्म का अस्तित्व भारत में था।
*जैन धर्मग्रंथ और पुराण :*
महाभारतकाल में इस धर्म के प्रमुख नेमिनाथ थे। जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर अरिष्ट नेमिनाथ भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे। माना जाता है कि ईसा से 800 वर्ष पूर्व 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए जिनका जन्म काशी में हुआ था।
599 ईस्वी पूर्व अर्थात 2614 वर्ष पूर्व अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने तीर्थंकरों के धर्म और परंपरा को सुव्यवस्थित रूप दिया। कैवल्य का राजपथ निर्मित किया। संघ-व्यवस्था का निर्माण किया- मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका। यही उनका चतुर्विध संघ कहलाया। भगवान महावीर ने 72 वर्ष की आयु में देह त्याग किया।
*यहूदी धर्मग्रंथ :*
यहूदियों के धर्मग्रंथ ‘तनख’ के अनुसार यहूदी जाति का उद्भव पैगंबर हजरत अबराहम (इस्लाम में इब्राहीम, ईसाइयत में अब्राहम) से शुरू होता है।
आज से करीब 4,000 साल पुराना यहूदी धर्म वर्तमान में इसराइल का राजधर्म है।
दुनिया के प्राचीन धर्मों में से एक यहूदी धर्म से ही ईसाई और इस्लाम धर्म की उत्पत्ति हुई है। यहूदी धर्म की शुरुआत पैगंबर अब्राहम (अबराहम या इब्राहीम) से मानी जाती है, जो ईसा से लगभग 1800 वर्ष पूर्व हुए थे अर्थात आज से 3814 वर्ष पूर्व।
ईसा से लगभग 1,400 वर्ष पूर्व अबराहम के बाद यहूदी इतिहास में सबसे बड़ा नाम ‘पैगंबर मूसा’ का है। मूसा ही यहूदी जाति के प्रमुख व्यवस्थाकार हैं। मूसा को ही पहले से ही चली आ रही एक परंपरा को स्थापित करने के कारण यहूदी धर्म का संस्थापक माना जाता है।
यहूदी मान्यता के अनुसार यहोवा (ईश्वर) ने तौरात (तोराह व तनख) जो कि मूसा को प्रदान की, इससे पहले सहूफ़-ए-इब्राहीमी, जो कि इब्राहीम को प्रदान की गईं। यह किताब अब लुप्त हो चुकी है। इसके बाद ज़बूर, जो कि दाऊद को प्रदान की गई। फिर इसके बाद इंजील (बाइबल), जो कि ईसा मसीह को प्रदान की गई।
अब्राहम और मूसा के बाद दाऊद और उसके बेटे सुलेमान को यहूदी धर्म में अधिक आदरणीय माना जाता है। सुलेमान के समय दूसरे देशों के साथ इसराइल के व्यापार में खूब उन्नति हुई। सुलेमान का यहूदी जाति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 37 वर्ष के योग्य शासन के बाद सन् 937 ईपू में सुलेमान की मृत्यु हुई।
यहूदियों की धर्मभाषा ‘इब्रानी’ (हिब्रू) और यहूदी धर्मग्रंथ का नाम ‘तनख’ है, जो इब्रानी भाषा में लिखा गया है। इसे ‘तालमुद’ या ‘तोरा’ भी कहते हैं। असल में ईसाइयों की बाइबिल में इस धर्मग्रंथ को शामिल करके इसे ‘पुराना अहदनामा’ अर्थात ओल्ड टेस्टामेंट कहते हैं। तनख का रचनाकाल ईपू 444 से लेकर ईपू 100 के बीच का माना जाता है।
*पारसियों का धर्मग्रंथ ‘जेंद अवेस्ता‘ :*
पारसी धर्म या ‘जरथुस्त्र धर्म’ विश्व के अत्यंत प्राचीन धर्मों में से एक है जिसकी स्थापना आर्यों की ईरानी शाखा के एक प्रोफेट जरथुष्ट्र ने की थी। इसके धर्मावलंबियों को पारसी या जोराबियन कहा जाता है। यह धर्म एकेश्वरवादी धर्म है। ये ईश्वर को ‘आहुरा माज्दा’ कहते हैं।
‘आहुर’ शब्द ‘असुर’ शब्द से बना है। जरथुष्ट्र को ऋग्वेद के अंगिरा, बृहस्पति आदि ऋषियों का समकालिक माना जाता है। वे ईरानी आर्यों के स्पीतमा कुटुम्ब के पौरूषहस्प के पुत्र थे। उनकी माता का नाम दुधधोवा (दोग्दों) था, जो कुंवारी थी। 30 वर्ष की आयु में जरथुस्त्र को ज्ञान प्राप्त हुआ।
उनकी मृत्यु 77 वर्ष 11 दिन की आयु में हुई। महान दार्शनिक नीत्से ने एक किताब लिखी थी जिसका नाम ‘दि स्पेक ऑव जरथुस्त्र’ है। कई विद्वान मानते हैं कि जेंद अवेस्ता तो अथर्ववेद का भाष्यांतरण है।
फारस के शहंशाह विश्तास्प के शासनकाल में पैगंबर जरथुस्त्र ने दूर-दूर तक भ्रमण कर अपना संदेश दिया। इतिहासकारों का मत है कि जरथुस्त्र 1700-1500 ईपू के बीच हुए थे। यह लगभग वही काल था, जबकि हजरत इब्राहीम अपने धर्म का प्रचार-प्रसार कर रहे थे।
पारसियों का धर्मग्रंथ ‘जेंद अवेस्ता’ है, जो ऋग्वैदिक संस्कृत की ही एक पुरातन शाखा अवेस्ता भाषा में लिखा गया है। यही कारण है कि ऋग्वेद और अवेस्ता में बहुत से शब्दों की समानता है। ऋग्वेदिक काल में ईरान को पारस्य देश कहा जाता था। अफगानिस्तान के इलाके से आर्यों की एक शाखा ने ईरान का रुख किया, तो दूसरी ने भारत का। ईरान को प्राचीनकाल में पारस्य देश कहा जाता था। इसके निवासी अत्रि कुल के माने जाते हैं।
*बौद्ध धर्मग्रंथ :*
बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए, जो त्रिपिटकों में संकलित हैं। त्रिपिटक के 3 भाग हैं- विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक। उक्त पिटकों के अंतर्गत उपग्रंथों की विशाल श्रृंखलाएं हैं। सुत्तपिटक के 5 भागों में से एक खुद्दक निकाय की 15 रचनाओं में से एक है धम्मपद। धम्मपद ज्यादा प्रचलित है।
बौद्ध धर्म के मूल तत्व हैं- 4 आर्य सत्य, आष्टांगिक मार्ग, प्रतीत्यसमुत्पाद, अव्याकृत प्रश्नों पर बुद्ध का मौन, बुद्ध कथाएं, अनात्मवाद और निर्वाण। बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए, जो त्रिपिटकों में संकलित हैं। हालांकि धम्मपद पहले से ही विद्यमान था, लेकिन उसकी जो पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं, वे 300 ईसापूर्व की हैं।
भगवान बुद्ध के निर्वाण (देहांत) के बाद प्रथम संगीति राजगृह में 483 ईसा पूर्व हुई थी। दूसरी संगीति वैशाली में, तृतीय संगीति 249 ईसा पूर्व पाटलीपुत्र में हुई थी और चतुर्थ संगीति कश्मीर में हुई थी। माना जाता है कि चतुर्थ संगीति में ईसा मसीह भी शामिल हुए थे। माना जाता है कि तृतीय बौद्ध संगीति में त्रिपिटक को अंतिम रूप दिया गया था।
वैशाख माह की पूर्णिमा के दिन बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी में ईसा पूर्व 563 को हुआ। इसी दिन 528 ईसा पूर्व उन्होंने भारत के बोधगया में सत्य को जाना और इसी दिन वे 483 ईसा पूर्व को 80 वर्ष की उम्र में भारत के कुशीनगर में निर्वाण (मृत्यु) को उपलब्ध हुए।





