अग्नि आलोक
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ग्रहण एक खगोलीय घटना है

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शशिकांत गुप्ते

सम्भवतः पहली बार,या वर्तमान में प्रचलित भाष में कहे तो अब की बार,दीपावली के पावन पर्व के तुरंत बाद सूर्य ग्रहण आया है। ग्रहण आता नहीं है, ग्रहण लगता है। सूर्य और चन्द्र को दो “राक्षस” ग्रहों के कारण ग्रहण लगता है।
राहु और केतु यह छाया ग्रह है। छाया ग्रह मतलब दिखते नहीं है, लेकिन उत्पाद मचाने में कोई कमी नहीं करते हैं।
राहु और केतु एक ही असुर के दो जिस्म है। राहु सिर और केतु धड़ है। ऐसा पौराणिक कथाओं में लिखा है। खगोलविद भलेही इसे ना माने, धार्मिक लोग मानतें हैं।
राहु के कारण चन्द्र को और केतु के कारण सूर्य को ग्रहण लगता है।
ग्रहण शब्द “क्रिया’ है। ग्रहण का शाब्दिक अर्थ होता है। ग्रहण करना,प्राप्त करना लेना,
स्वीकारना,और खाना
छाया ग्रह मतलब करेला और नीम चढ़ा। कारण यह दिखते नहीं है, और ग्रहण लगातें हैं। इसीलिए ये खातें ( ग्रहण करतें) हैं लेकिन दिखाई नहीं देता है?
ये दोनों ग्रह सूर्य और चंद्र को निश्चित अवधि तक ढाक देतें हैं। जबतक ग्रहण लगा रहता है तबतक सूर्य और चन्द्र के दर्शन दुर्लभ हो जातें हैं।
ग्रहण तो सूर्य और चन्द्र को लगता है लेकिन पृथ्वी का वातावरण दूषित हो जाता है।
राहु सिर का भाग है,सिर में दिमाग़ है या नहीं यह खोज का विषय है। इस पर मनोचिकित्सकों का मत है कि, दिमाग होगा तब भी निश्चित ही प्रवृत्ति तो दानवी ही होगी।
केतु धड़ है मतलब, कोई कुछ भी बोले, कितने भी सवाल करें,कोई कितना भी पीड़ित हो, कोई कितनी ही बड़ी समस्याओं से त्रस्त हो? केतु सुनता ही नहीं। केतु का धड़ है, हो सकता है धड़ में सीना भी हो सीने का नाप पचास+छः इंच का भी हो लेकिन सीना हृदयहीन ही होगा? राक्षस का हृदय कभी संवदेनशील हो ही नहीं सकता है। संवेदनहीन दिल मतलब ही दिल पत्थर दिल। पत्थर दिल है ये राहु केतु, जाने ना आमजन की समस्या।
ये दोनों ग्रह हमेशा उल्टे ही चलतें हैं। सीधे चलना इनकी प्रवृत्ति ही नहीं है। ये दोनों ग्रह एक दूसरे से 180 अंश पर ही होतें हैं,मतलब एक दूसरें के एकदम आमने सामने लेकिन इनकी फितरत एक सी होती है। इन दोनों के लिए यह कहावत सटीक है। “जो जैसा दिखता है,वो वैसा होता नहीं हैं
राहु और केतु के कारण ही “हीरा हीरे को काटता है” यह कहावत द्वापरयुग में ही चरितार्थ हुई है।
कौरवों के दामाद जयन्द्रथ नामक एक अजेय योद्धा का वध अर्जुन के हाथों ग्रहण के कारण ही हुआ था।
अंत में इतना ही कह सकतें हैं कि, दानव कभी भी मानव हो नहीं सकतें हैं।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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