ईडी आजकल सुर्खियों है. वजह है इसका कुछ राज्यों में रडार पर होना. कहीं भी जब केस मनी लॉन्ड्रिंग का होता है तो यही एजेंसी जांच करती है. इसी एक्शन के चक्कर में ये एजेंसी मुकदमे और विरोध वाला रिएक्शन भी झेल रही है. गुरुवार को दो वजह से इसकी चर्चा तेज रही. एक मामला तो बंगाल में हुई छापामारी से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा. दूसरा मामला झारखंड का है, जहां रांची के ईडी दफ्तर में पुलिस जांच के लिए पहुंच गई. ईडी के अफसरों पर पेयजल विभाग के कर्मचारी से मारपीट का आरोप है. आइए दोनों मसलों को एक-एक कर समझते हैं.
पहले चलते हैं सुप्रीम कोर्ट, जहां ममता बनर्जी बनाम ईडी मामले में तीखी बहस हुई. बंगाल सरकार की तरफ से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने मोर्चा संभाला तो सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जांच एजेंसी का पक्ष रखा. ये मामला जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ में सुना गया. सबसे पहले आपको सुनवाई के 5 बड़े पॉइंट बताते हैं.
- पहला- ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR पर रोक
- दूसरा- ईडी अफसरों के खिलाफ अगली सुनवाई तक कार्रवाई नहीं
- तीसरा- राज्य की एजेंसी या पुलिस को इस तरह काम में दखल देने की छूट नहीं. ये गंभीर मुद्दा है.
- चौथा- राज्य की एजेंसियों की आड़ में अपराधियों को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए.
- पांचवां- केंद्रीय एजेंसियों को किसी पार्टी के चुनावी कार्य में दखल देने का अधिकार नहीं.
सरकार और पुलिस को सभी सीसीटीवी, डिवाइस और दस्तावेज सुरक्षित रखने का आदेश दिया गया. साथ ही ममता बनर्जी, डीजीपी और राज्य के कुछ अफसरों को नोटिस जारी किया गया, जिसका जवाब दो हफ्ते में देना है. अगली सुनवाई 3 फरवरी को होगी. कुल मिलाकर देखें तो अदालत ने एजेंसियों के कामकाज में दखल पर गंभीर टिप्पणी की है, जिनमें राज्यों के लिए भी सुझाव है.





