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शिक्षा मुनाफा कमाने का व्यापार नहीं हो सकती

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मुनेश त्यागी

       पुराने जमाने से ही मनुष्य ने शिक्षा को प्राथमिकता दी है, हालांकि मनुवादी सोच के अनुसार शिक्षा केवल ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य के लिए अलाउड थी और उसने शुद्रों, अछूतों, महिलाओं, किसानों, मजदूरों और तमाम मेहनतकश तबके को शिक्षा के क्षेत्र और दायरे से बाहर निकाल दिया था, इसीलिए भारत का किसान मजदूर और मेहनतकश वर्ग, ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पाया और उन्हें जानबूझकर एक शोषण और अन्याय की मानसिकता के तहत, अनपढ़ और निरक्षर रखा गया।

       पहले शिक्षा द्विज वर्ग के कुछ धनवान लोगों को ही दी जाती थी। मगर धीरे-धीरे समय बदला भारत आजाद हुआ और भारत के संविधान के अनुसार प्रत्येक भारतीय को शिक्षित करने की बात कही गई। हमारी आजादी के बाद नेहरू काल से ही शिक्षा को लगभग मुक्त रखा गया, निशुल्क रखा गया था। पहले जमाने में आजादी के बाद लोगों से शिक्षा देने के बदले फीस नहीं ली जाती थी। शिक्षा लगभग निशुल्क थी।

       उसी वजह से हमारा मुल्क दुनिया में आगे बढ़ा और समाजवादी देशों की कतार में शामिल हो गया क्योंकि समाजवादी देशों में ही सबसे पहले रूस चीन वियतनाम क्यूबा कोरिया और पूर्वी यूरोप आदि देशों में पूरी की पूरी जनता को शिक्षा निशुल्क दी जाती थी और सब को शिक्षा दी जाती थी। इसी फार्मूले को दुनिया भर के पूंजीवादी देशों समेत भारत में भी अपनाया गया और भारत में मुफ्त शिक्षा की बदौलत बहुत बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक, शिक्षक, डॉक्टर्स, नर्सिज वकील, इंजीनियर और तकनीशियन और पढे लिखे किसान और मजदूर पैदा हुए।

       भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में तमाम तरह की उन्नति की। शिक्षा की वजह से भारत का गरीब से गरीब वर्ग sc.st.obc किसान मजदूर के बच्चे पढ़ पाए और वे बेहतर भारतीय बने और इस सब की बदौलत भारत विकास के मार्ग पर आगे बढ़ा। उसने जिंदगी के कई क्षेत्रों में उन्नति की, प्रगति की। किसी शिक्षा नीति की वजह से भारत ने अनेक विश्व स्तर के वैज्ञानिक शिक्षक वकील जज डॉक्टर और तकनीशियन पैदा किए।

      मगर पिछले 30 साल से शिक्षा पर सरकारी आक्रमण शुरू हो गया और सरकार ने मुफ्त और सस्ती शिक्षा से अपने हाथ खींच लिए। उसने पश्चिमी देशों के प्रभाव में वैश्वीकरण, निजी करण और उदारीकरण की नीतियों का पालन शुरू कर दिया और शिक्षा के क्षेत्र में दी जाने वाली रियायत को खत्म कर दिया। सरकार की नई नीतियों की वजह से शिक्षा पर खर्च होने वाले बजट में बहुत बड़े पैमाने पर कटौती की गई और शिक्षा में केवल नाममात्र का निवेश किया गया।

      यही कारण है कि पिछले 30 सालों से कोई भी नया सरकारी स्कूल, कोलिज या विश्वविद्यालय देखने को नहीं मिला, क्योंकि सरकार ने शिक्षा में सरकारी निवेश से हाथ खींच लिए और सरकार ने निजी शिक्षा को प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया। आज हम देख रहे हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण की नीतियां जारी है और इस निजीकरण की नीतियों के कारण शिक्षा में पैसा निवेश करने वाले पूंजीपतियों और धन्नासेठों ने, शिक्षा को एक बहुत ही मंहगा बाजार बना दिया है, एक व्यवसाय बना दिया है, एक बिजनेस बना दिया है और शिक्षा को घनघोर मुनाफा कमाने का एक जरिया बना दिया है।

       सरकार की इन्हीं नीतियों के कारण, आज की परिस्थितियों में शिक्षा अधिकांश भारतीयों की पहुंच से बाहर हो गई है। करोड़ों किसान, मजदूर, sc-st और ओबीसी के लोग शिक्षा के क्षेत्र और दायरे से बाहर हो सके हैं। आज शिक्षा इतनी महंगी है कि भारत के 100 करोड़ से ज्यादा लोग और जो गरीबी की रेखा के नीचे हैं, जिनको सरकार गरीब मानती है, वे अपने बच्चों को पर्याप्त और समुचित शिक्षा नहीं दिलवा पा रहे हैं।

      आज हम देख रहे हैं कि डॉक्टर, इंजीनियर, जज, वकील और शिक्षक बनने के लिए, बहुत बड़े पैमाने पर, फीस के नाम पर, बहुत मोटा पैसा वसूला जा रहा है। अभी सरकार की इन्हीं नीतियों का फायदा उठाकर, स्कूल मालिक पूंजीपतियों ने, प्राइवेट मैनेजमेंट ने, व्यवसायिक क्षेत्रों में, शिक्षा की फीस 7 गुनी कर दी है जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद जोरदार आपत्ति जताई है। सर्वोच्च न्यायालय ने अभी फिलहाल में दिए गए अपने निर्णय में कहा गया है कि शिक्षा को व्यापार या बिजनेस नहीं बनाया जा सकता और शिक्षा को व्यापार या बिजनेस बनाकर, अकूत मुनाफा नहीं कमाया जा सकता।

      सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ट्यूशन फीस  इतनी ही होनी चाहिए कि जिसे गरीब लोग अदा कर सकें, और जो उनकी पहुंच में हो। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि भारत की जो गरीब जनता है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोग हैं, उनको फीस में भारी छूट दी जानी चाहिए। वर्तमान समस्त परिस्थितियों को देखकर यह आसानी से कहा जा सकता है कि आज शिक्षा भारत के लगभग 100 करोड़ लोगों की पहुंच से बाहर हो गई है। वे अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा नहीं दे सकते दिला सकते क्योंकि  जब उनके पास खाने और पेट भरने के लिए ही पैसे नहीं हैं तो वे अपने बच्चों को शिक्षा देने में, दिलाने में पैसे कहां से खर्च करेंगे?

          हम यहां पर कहेंगे कि सरकार को शिक्षा के निजीकरण को तत्काल खत्म कर देना चाहिए और भारत के संविधानिक प्रावधानों के अनुसार भारत की सारी जनता को निशुल्क, अनिवार्य और आधुनिक शिक्षा दी जानी चाहिए, ताकि भारत में गरीबों, पीड़ितों, वंचितों और अभावग्रस्तों के बच्चे भी भारत के विकास में, भारत के आधुनिक निर्माण में अपना हाथ बढ़ा सकें, अपना सहयोग दे सकें और वे भारत के विकास में अपने भागीदारी की अधिकार से वंचित न हो सकें।

       उपरोक्त हालात में हम पक्के तौर पर कह सकते हैं कि जब तक सरकार शिक्षा में बजट नहीं बढ़ाएगी, सरकारी स्कूलों की संख्या में वृद्धि नहीं करेगी, विद्यार्थियों के अनुपात में शिक्षकों की नियुक्तियां नहीं करेगी, नए-नए विद्यालय स्कूल और विश्वविद्यालय नहीं खोलेगी और शिक्षा में शिक्षा को बिजनेस बनाने से नहीं रोकेगी और शिक्षा को बिजनेस बनाकर अकूत मुनाफा कमाने पर रोक नहीं लगाएगी, तब तक इस देश के 100 करोड़ से ज्यादा किसानों मजदूरों मेहनतकशों के बच्चों को वर्तमान और आधुनिक शिक्षा नहीं मिल सकती और भारत एक आधुनिक, विकसित और सबल राष्ट्र नहीं बन सकता।

      क्योंकि जब तक इस देश की जनता शिक्षित नहीं होगी, अपने पैरों पर खड़ी नहीं होगी, तब तक हमारा देश कभी भी विश्व गुरु नहीं बन सकता। अतः विश्व गुरु बनने के लिए जरूरी है कि हमारी सरकार शिक्षा में पर्याप्त बजट यानी पैसा खर्च करें, सरकारी अस्पतालों का, सरकारी विद्यालयों का, स्कूलों का और विश्वविद्यालयों का निर्माण करें और छात्रों के अनुपात में प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति करें और ऐसी शिक्षा नीति अमल में लाए जिससे कि भारत के तमाम नागरिकों को आधुनिक, अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा मिल सके और और शिक्षा को मुनाफा कमाने का माध्यम, व्यापार या बिजनेस न बनाया जा सके।

Ramswaroop Mantri

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