पुष्पा गुप्ता
एक उत्तरभारतीय नेट्वीटर पर लिख दिया कि जब वह मुम्बई के लोगों से तुम सुनता है तो आहत हो जाता है। उसको उत्तरभारत में आप कह-सुनकर इज्जत पाने-देने की आदत है! इसपर उत्तरभारत बनाम महाराष्ट्र की बहस चल पड़ी। जाहिर है कि बहस क्षेत्रवाद की टकराट में तब्दील हो गयी लेकिन इस बहस से यह भी पता चलत है कि उत्तरभारतीय शिक्षित तबका अपनी जड़ों से कितना कट चुका है।
उत्तरभारत में ऐसा वर्ग तैयार हो चुका है जिसे तुम सुनना अपमानजनक लगता है क्योंकि वो खुद को आप समझता है। गोया आप कोई ‘सामंत’ हो!
यहाँ तक कोई दिक्कत नहीं थी। जिसका जो मन वो चाहे। तुर्रा ये कि इन्होंने यह घोषित कर दिया कि उत्तरभारतीय आप कहता-सुनता है तुम/तू नहीं। जाहिर है कि जब कोई ऐसा कहता है तो इससे साफ होता है कि वह अपनी जमीन से कट चुका है।
मेरठ में प्रवेश करते ही आपको पता चल जाएगा कि वहाँ तू चलती है या आप। बनारस की बनारसी, अवधी की अवधी, बघेली, पंजाबी इत्यादि की स्थानीय बोली और प्राचीन साहित्य की पड़ताल करके देख सकते हैं कि इंग्लिश के यू की तरह इन बोलियों में तू बड़े छोटे दोनों के लिए इस्तेमाल होता है।
उत्तरभारत की जितनी बोलियों पर मेरी नजर जाती है उनमें केवल भोजपुर की भोजपुरी ही ऐसी है जिसमें बड़े के लिए रउआ और छोटे के लिए तोरा चलता है। यानी भोजपुरी में भी आप नहीं चलता। अब बात करते हैं भारत की कुछ क्लासिक भाषाओं की।
संस्कृत में आप का प्रयोग है या नहीं पता नहीं लेकिन वैदिक मंत्र “त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।” सबने पढ़ा सुना होगा। आप देख सकते हैं कि ईश आराधना में भी त्वम रूप का प्रयोग किया गया है।
वेदों से आगे बढ़ते हुए महाभारत, रामायण, गीता, कालिदास, भवभूति, भ्रतृहरि इत्यादि के साहित्य में भी तुम-आप की पड़ताल की जा सकती है।
संस्कृत के अलावा बुद्ध की मागधी और महावीर की अर्धमागधी में तो इस पड़ताल का ज्यादा मतलब नहीं है क्योंकि दोनों ने आमजन द्वारा बोली जाने वाली जबान (भाषा) का इस्तेमाल किया और ऊपर दिखाया जा चुका है कि बुद्ध और महावीर जहाँ के थे वहाँ के आमजन की स्थानीय भाषा में आप है ही नहीं।
आधुनिक हिन्दी में आप का चलन कैसे और कब शुरू हुआ यह नहीं पता लेकिन यह विशुद्ध मानक हिन्दी की प्रवृत्ति है न कि उत्तरभारत की। उत्तरभारत में भगवान को भी तू कहते रहे हैं। कबीर कहते हैं- तू तू कहता तू भया, मुझमें रहा न मैं.
नानक कहते हैं – नानक जी कहते हैं- तू सुणि हरणा कालिआ, की वाड़ीए राता राम। इस सिलसिले को जहाँ तक चाहें वहाँ तक बढ़ा सकते हैं। अतः यह साफ है कि हिन्दी में तुम और आप आधुनिक चलन है।
मैं भी हिन्दी बोलते समय अपने से बड़ों के लिए आप बोलती हूँ लेकिन बनारसी बोलते समय बड़ों को भी तू ही बोलती हूँ। जैसे- पापा तू खाना खइबा? बब्बा- तू घरे जइबा?
जो भी अपनी स्थानीन बोली में बात करते होंगे उनमें से ज्यादातर को इसका अहसास होगा तो वो इस तरह की बहस नहीं चलाएँगे कि मुम्बई के लोग तुम बोलते हैं और हम आप बोलते हैं!





