~ राजेंद्र शुक्ला (मुंबई)
किताबों, भाषणों, प्रवचनों, गूगल-बाबाओं आदि से सूचनाओं के कचरे का बोझ मिलता है, वास्तविक ज्ञान नहीं.
वास्तविक ज्ञान के आठ सोपान हैं :
(1)सुनना (2) पूछना (3) प्रेरणा (4) विस्तारण (5) विचारण (6) आत्म-निरीक्षण (7) निर्माण (8) आत्मसंदेश युक्त सृजन।

सुनना ज्ञान प्राप्ति का प्रथम द्वार है। व्याख्यान सुनना, शास्त्र सुनना आदि भी तप है। जानने की इच्छा से नई-नई बातें दूसरों से पूछना भी ज्ञान चर्चा है। इस तप के लिए निष्पक्षता और जिज्ञासा जरूरी है।
परीक्षा लेने के लिए पूछना नाम का तप नहीं है। पूछना पढ़ने का एक अंग है। सुनना साधारण है, पर पूछने का बहुत महत्व है। जिसे पूछना नहीं आया, समझ लो कि उसे ज्ञान नहीं मिला। पूछने से पता चलता है कि किसी न किसी चीज को अच्छी तरह समझा है या नहीं।
ज्ञान प्राप्ति के लिए पठन-पाठन, स्वाध्याय तप के समान है। विस्तारण तप है। कोई बात पढ़कर सुनना, लिखना, फैलाना आदि विस्तारण के अन्तर्गत है। महात्माओं के उपदेशों का संग्रह करना भी विस्तारण तप है, पर विस्तारण निरर्थक न हो।
नाम के पिस्ट प्रेषण ( कापी-पेस्ट) आदि करके कागज काला किया गया हो, तो यह तप नहीं है। विचारण, चिन्तन करना, पाए हुए ज्ञान का अनुभव और तर्क द्वारा परीक्षण करना आदि भी तप है। इसके द्वारा ज्ञान अन्तर्मुख होता है।
चिन्तन द्वारा ज्ञान अपनी चीज बन जाता है। पाए हुए ज्ञान के आधार पर अपने को देखना, निष्पक्षता से अपने गुण दोष का विचार करना आत्म-निरीक्षण है।
आत्म-निरीक्षण के बाद आत्मबोध होता है. यह बोध जो दिखाता है, उसे आत्मसंदेश कहते हैं. इससे जगहित् के लिए रचना की जाती है। यह निर्माण तप है। अपने अनुभव और आत्म-शुद्धि के आधार पर संसार को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा करना आत्मसंदेश का उपदेश है। (चेतना विकास मिशन).




