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टोंक का प्रसिद्ध मोगरा खिलने से पहले ही अपने कारोबारियों के चेहरे पर उकेरने लगा है चिंता की लकीरें

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टोंक एम.असलम

गर्मी में तेजी के साथ ही मोगरे की महक दिलों-दिमाग को तरोताज़ा करने लगती है। लेकिन गत वर्ष कोरोना संक्रमण के कारण जहां लॉकडाउन की वजह से मोगरे की मालाओं का कारोबार बेहद कम हुआ। इसबार भी इंदौर, उज्जैन तक अपनी पहचान रखने वाला टोंक का मोगरा पूरी तरह खिला भी नहीं है कि इसके कारोबार करने वालों के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभरने लगी है।वर्तमान में इसका भाव गत वर्षों के मुकाबले बेहद कम हो गया है। मोगरे की मालाओं को बाहर भेजने वाले कई व्यवसायियों का कहना है कि इसबार मोगरे के भाव 60-70 रुपए किलो के करीब चल रहे हैं। जबकि पूर्व में 150 रुपए से भी अधिक के इसके भाव रह चुके हैं।

इसबार गर्मी में तेजी होने के कारण मोगरे की अच्छी खेती होने की संभावनाएं है। अभी से ही मोगरा खूब आने लगा है।लेकिन कोरोना संक्रमण का असर उसपर पूरी तरह नजर भी आने लगा है। वर्तमान में जयपुर ही इसकी मालाएं जा पा रही थी। लेकिन अब बंद के कारण पूरी तरह कारोबार ठप होने की स्थितियां बन गई है। जबकि पूर्व में उज्जैन, भोपाल, इंदौर सहित राज्य के कई जिलों में इसकी मांग रहती थी। मई-जून में इसका कारोबार परवान पर रहता है। टोंक का मोगरा विशेष किस्म का होने के कारण यहां पर इसक प्रतिदिन कारोबार करीब 5 लाख का हो जाया करता था। लेकिन इसबार भी ठेकेदार सहित मालाएं बेचने वालों के समक्ष संकट की स्थितियां आ गई है।

400 से 500 परिवार का आय का जरिया है मोगरे की खेती

मोगरे का कारोबार करने वाले जगदीश सेनी सहित कई लोगों ने बताया कि गत वर्ष लॉड डाउन के कारण एवं शादियां, दरगाहे, मंदिर आदि नहीं खुलने की वजह से मोगरे की मालाओं एवं फूलों का उपयोग नहीं हो सका। हालत ये रही कि जितने में फूल के बगीचे ठेके में लिए थे, उतना भी कमाना मुश्किल हो गया। अब भी ये संकोच बना हुआ है कि कहीं कोरोना के कारण लॉक डाउन लंबे समय तक ना लग जाए।

इस काम में रोज़ के रोज़ फूल तोड़े जाते हैं तथा रोज मालाएं बनती है। एक दिन भी ये नहीं रह पाता है। जिले में इस कार्य से गर्मियों में करीब 400-500 परिवार जुड़े रहते हैं। लेकिन अभी सबके चेहरों पर चिंताएं बनी हुई है। कोरोना से पहले स्थितियां ये थी कि प्रतिदिन 2 हजार किलो से अधिक की मालाएं राज्य व राज्य के बाहर जाती थी। गर्मियों में फूलो के सरताज गुलाब से भी अधिक मोगरे के भाव रहा करते हैं।

अन्य प्रजातियों से अधिक महक

टोंक में रायबेल नस्ल का मोगरा होता है जिसके फूल छोटे एवं महक अन्य प्रजातियों से अधिक होती है। जानकार बताते हैं कि मोगरा 250-300 किग्रा फूल प्रति एकड़ देता है। एक बार बोने पर व्यवसायिक उपज दो वर्ष बाद प्राप्त होती है जो पांचवे वर्ष तक बढ़ती है फिर घटनी शुरू हो जाती है। 10 वर्ष के बाद पौधों को उखाड़कर दुबारा नए पौधों का रोपण करना ही उचित होता है।

नॉलेज : कहां से हुई मोगरे की उत्पत्तिमोगरे की उत्पत्ति भारत और दक्षिण एशिया में मानी जाती है। यह फिलिपिंस का राष्ट्रीय पुष्प और इंडोनेशिया के तीन राष्ट्रीय पुष्पों में से एक है। इसे फिलीपीन्स की भाषा टैगलॉग में सम्पग्यिता कहते हैं जिसका अर्थ है, मैं तुमसे वायदा करता हूं, इसी कारण इसे पारस्परिक प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है। फारसी में इसे ‘यास्मीन’ कहते हैं जिसका अर्थ है सुगंधित फूल।

Ramswaroop Mantri

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