शशिकांत गुप्ते
बे-मौसम बरसात और आंधी तूफान देखकर मौसम विशेषज्ञ हैरान यह खबर पढ़कर सीतारामजी को बिलकुल भी हैरानी नही हुई।
सीतारामजी का कहना है,जब राजनीति से धर्म,साहित्य,समाज,
और सांस्कृतिक क्षेत्र भी अछूता
नहीं रहा तो मौसम कैसे राजनीति से वंचित रह जाएगा?
ऋतुओं का परिवर्तन भी अपने क्रम से भटक गया है।
शरद ऋतु तो भौगोलिक स्थिति के अनुसार अपना असर दिखाता है। शरद ऋतु को अमेरिका में पतझड़ का मौसम कहते है सी।
इनदिनों सियासत में शरद ऋतु की बहुत चर्चा है।
जिस तरह मौसम विशेषज्ञ मौसम की भविष्यवाणी करने में असमर्थ है,वैसे ही राजनैतिक विश्लेषक भी राजनैतिक भविष्यवाणी करने स्वयं को असहज महसूस कर रहें हैं।
इनदिनों सारा राष्ट्र “महा”राष्ट्र के शरद ऋतु को लेकर इस प्रश्न वाचक कहावत को चरितार्थ होते देख रहा हैं,ऊंट किस करवट बैठेगा?
राजनैतिक ऊंट किसी भी करवट बैठे? लेकिन उक्त मुद्दे पर इस कहावत का स्मरण स्वाभाविक ही हो जाता है,कबर में पांव लटकना
वर्तमान राजनीति के लिए निम्न शेर प्रासंगिक है।
दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था
इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था
इस शेर के शायर है क़तील शिफ़ाई
राजनीति में जो भी हो लेकिन आमजन की मानसिक स्थिति सन 1962 प्रदर्शित फिल्म झूला के गीत के इन पंक्तियों जैसे ही है। गीतकार राजेंद्र कृष्णजी है।
एक समय पर दो बरसातें
बादल के संग आँख भी बरसे
चारों ओर है जल-थल जल-थल
फिर भी प्यासा मनवा तरसे
शशिकांत गुप्ते इंदौर





