इंदौर
शहर में सामाजिक सौहार्द का यह एक बेहतरीन नमूना है। शहर काज़ी डॉ. इशरत अली जिस एक मित्र की मदद से चांद देखकर हर साल ईद का एलान करते हैं, वे हैं जेल रोड निवासी 72 वर्षीय अभय जैन। काजी साहब 25 साल से आखिरी रोज़े पर अभयजी के घर जाते हैं और उनके खास टेलिस्कोप से चांद का दीदार करते हैं।
हालांकि लॉकडाउन के चलते यह सिलसिला दो साल से टूट गया है। काज़ी साहब कहते हैं कि अभयजी का टेलिस्कोप उम्दा है। उसमें बादलों में छिपा चांद भी साफ दिखाई दे जाता है। अभयजी साइंटिफिक तरीके से कैलकुलेट करके चांद की सटीक गति बताते हैं। दो वर्ष से चांद की जानकारी वह मुझे फोन पर दे रहे हैं। पहली कार खरीदने के रुपए जमा किए, लेकिन टेलिस्कोप ले आए अभय जैन पेशे से एस्ट्रोलॉजर हैं और शौकिया एस्ट्रोनॉमी भी करते हैं। शौक भी ऐसा कि 25 साल पहले जब पहली कार खरीदने के रुपए जमा हुए तो चार पहिए के बजाय न्यूजीलैंड से टेलिस्कोप ले आए। बताते हैं कि पुराना होने के बाद भी मेडे कंपनी का यह टेलिस्कोप नई तकनीक पर आधारित है। लंबे बैरल के बिना ही आप इससे चंद्रमा के गड्ढे गिन सकते हैं।
बृहस्पति और शनि के चंद्रमा व शनि की रिंग तक इससे दिखाई देती है। जो तकनीक हबल दूरबीन में है, वही इसमें है। ईद का चांद देखने के अलावा जब भी कोई सोलर इवेंट होता है, वे इसका उपयोग करते हैं, तब इसकी कीमत 1.5 लाख रुपए थी, आज यह बेशकीमत है।
चांद दिखाने की फीस, एक रोजा इफ्तार साथ होगा
वर्ष 1995-96 में एक कॉमन फ्रेंड ने डॉ. इशरत अली को अभयजी से यह कहकर मिलवाया था कि आप चांद का दीदार इनके टेलिस्कोप से किया करें। अभयजी ने काजी के सामने शर्त रखी कि आखिरी रोजा आप हमारे घर खोलेंगे। हम दोनों मिलकर चांद का दीदार करेंगे। काज़ी साहब ने हामी भर दी, तब से यह सिलसिला जारी रहा। दोनों का कहना है कि जल्द यह महामारी खत्म हो, लॉकडाउन खुले और हम एकसाथ फिर चांद का दीदार करें।





